मध्यकालीनता से आधुनिकता की ओर

आधुनिक हिंदी का इतिहास

यद्यपि अंग्रेजों ने इस देश में नयी अर्थ-व्यवस्था, औद्योगिकता, संचार-सुविधा, प्रेस आदि को अपने निजी स्वायों के लिए स्थापित किया फिर भी इससे इस देश का हित हुआ। एक स्थिर व्यवस्था से छूटकर देश को नूतन गत्यात्मकता का अनुभव हुआ। परम्पराएँ टूटने लगीं। नए परिवेश में, ऐतिहासिक माँग के फलस्वरूप, लोग अपने को नए ढंग से ढालने – लगे। आधुनिक काल में जिस पुनर्जागरण का उल्लेख किया जाता है उसके मूल में भी ये बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं।
इसके पूर्व धर्म मुख्यतः पारलीकिक आकांक्षाओं से सम्बद्ध था, किन्तु आधुनिक काल में वह इहलीकिक आकांक्षाओं का भी वाहक बना। पूँजीवादी समाज की भीतिकता के फलस्वरूप धर्म-सुधारकों को इस तरह का वाना धारण करना पड़ा था या कहिए कि इसके लिए उन्हें बाध्य होना पड़ा |

भारतीय धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में अंग्रेज प्रशासकों को ईसाई मिशनरियों के आक्रामक रुख के कारण धर्म-सुधारकों को धारदार मार्ग से गुजरना आवश्यक हो गया। एक ओर उन्हें विदेशियों के समक्ष अपनी धर्म-संस्कृति की वकालत करनी पड़ी और दूसरी ओर देशवासियों के सामने धर्म का नया अर्थापन करना पड़ा। इस प्रकार हर बात को तर्क-संगत (रैशनल) बनाने की दिशा में जो पहल की गई वह बहुत फलदायक सिद्ध हुई।

इस संक्रान्तिकाल में धर्म का पल्‍ला पकड़ना बहुत जरूरी था, क्योंकि धर्म अनिवार्यतः समाज-सुधार के साथ जुड़ा हुआ था। पुराणपन्थी और सुधारक दोनों ने अपने-अपने मत के साहापक प्रचारार्थ धर्मशाख्रों की शरण ली। इस युग में राजा राममोहन राय अकेले व्यक्ति थे जिन्हें शुद्ध बुद्धिवादी कहा जा सकता है। सती प्रथा को उन्मूलित करने के लिए उन्हें भी धर्मशाख्त्रो की गवाही की आवश्यकता हुई। विद्यासागर ने सिद्ध किया कि धर्मशात्रों में वैधव्य का कोई विधान नहीं है। दयानन्द सरस्वती सामाजिक सुधारों को बैधता देने के लिए वेदों की ओर उन्मुख हुए और उन्होंने अपने मत के पुष्टयर्थ वेदों का नया अर्थ भी किया।

धीरे-धीरे तर्क की संगति पर विशेष बल दिया जाने लगा। इससे रूढ़ियों को उच्छिन्न करने में सुविधा हुई। परम्परावादी और धर्मसुधारक दोनों ही अतीत के गौरव को जागृत करने में सफल हुए। इससे भारतीयों को आत्म-सम्मान का बोध हुआ और बराबरी के स्तर पर पश्चिम का सामना करने तथा स्वतन्त्रता की माँग करने का आत्म-विश्वास प्राप्त हुआ। यद्यपि वे परम्पराबादी धर्म-सुधार में बहुत आस्था नहीं रखते थे फिर भी राष्ट्रीयता पर उन्होंने अत्यधिक बल दिया।
उनका कहना था कि राष्ट्रीयता में सभी सुधार समाविष्ट हैं।

वस्तुतः जिन्हें परम्परावादी कहा जाता है और जिस अर्थ में कहा जाता है उस अर्थ में वे परम्परावादी नहीं थे। रैडिकल भी पूरे तौर पर रेडिकल नहीं थे। परम्परा के नैरन्तर्य को देखते हुए समस्या केवल चुनाव को लेकर खड़ी होती है। परम्परा की निरंतरता में कुछ अंश नए युग के प्रसंग में सार्थक होते हैं ओर कुछ अर्थहीन। परम्परा की प्रासंगिकता किस तत्व में है और किस में नहीं–इसका विवेधन और चुनाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। तथाकथित परम्परावादी और रैडिकल दोनों के मूलभूत दृष्टिकोण में कोई अन्तर नहीं था, फिर भी दोनों के अभिगम अलग-अलग थे। पाश्यात्य शिक्षा-प्रणाली में दोनों ने विश्वास व्यक्त किया और नई शिक्षा-संस्थाएँ खोलीं। शिक्षा-संस्थाएँ तो पहले भी थीं पर इन शिक्षा-संस्थाओं का रूप एकदम बदल गया। इनका उद्देश्य पश्षिचमी ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराना था।

नए अर्थ-तन्त्र, शिक्षा-प्रणाली, संचार-जाल आदि के कारण पश्चिमीकरण की प्रक्रिया का आरम्भ होता है। बहुत से लोग इसे पश्चिमीकरण न कहकर आधुनिकीकरण कहते हैं। पश्चिमीकरण शब्द का प्रयोग बहुत संगत नहीं है क्योंकि स्वयं पश्चिम को बहुत-सी बातें पूर्व से मालूम हुई हैं जैसे मुद्रण-यन्त्र का आविष्कार सबसे पहले चीन देश में हुआ। पश्चिमीकरण से भ्रम होता कि पश्चिमी रीति-नीति, आचार-व्यवहार, वेश-भूषा आदि का अंधानुकरण। आधुनिकीकरण एक दृष्टिकोण है जो वैज्ञानिक विचारधारा से बनता है और वह मूलतः इस लोक से ही सम्बद्ध होता है।

एम० एन० श्रीनिवास ने “आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन’ पुस्तक में लिखा है भारतीयों को केवल स्याहीसोख का दर्जा देना तो स्पष्ट ही वाहियात है। यह कहना ठीक नहीं कि जिस किसी बात के संपर्क में वे आए वह सब उन्होंने आलसात्‌ किया उसे दूसरों तक संप्रेषित कर दिया–यद्यपि कुछ एक व्यक्तियों के साथ निस्संदेह ऐसा हुआ। वास्तव में पश्चिम से कुछ बातें ग्रहण की गई और ग्रहण की गईं बातों में भी रूपान्तर हुआ। “

रूपान्तरण की इस प्रक्रिया में पश्चिमी विचारकों में मिल, बेंथम, काम्ते आदि से बहुत कुछ प्रेरणा ली गई। किन्तु इसके लिए शात्तरों के साथ-साथ मध्यकालीन संतों की बानियों का भी सहारा लिया गया। छूआछूत, जाति-प्रथा, खी-पुरुष के भेद आदि का विरोध और स्वतन्त्रता-समानता आदि का समर्थन इस तथ्य का सूचक है कि इस समय तक नवीन मानवतावाद का आविर्भव हो चुका था।
संस्कृत के शाख्रों और मध्यकालीन संतों-भक्तों की बानियों में भी एक प्रकार का मानवतावाद मिलता है पर वह मानवतावाद सर्वत्र ईश्वरवाद से संदर्भित है। कयीर हिन्दू-मुसलमान के भेद पर यह कहकर प्रहार करते हैं कि वे सभी ईश्वर की सन्‍्तान हैं। कर्मकाण्ड की निन्दा वे इसलिए करते हैं कि वह ईश्वर प्राप्ति में बाधक है। भक्तों में तुलसी की स्पष्टोक्ति है “नाते सब रामके मानियत।” पर आधुनिक युग में मनुष्य-मनुष्य की समता, स्वतन्त्रता आदि को सामाजिक न्याय के आधार पर समर्थित किया गया।

पर इन आन्दोलनों में से अधिकांश में एक अन्तर्विरोध दिखाई पड़ता है। इनके आदर्शों और व्यवहारों में सर्वत्र एकरूपता नहीं मिलती । टैगोर परिवार ब्राह्म था। ब्रह्मसमाज में मूर्तिपूजा के लिए कोई स्थान नहीं है पर टैगोर परिवार खूब धूमधाम के साथ दुर्गोत्सव मनाता था। आर्यस्माज में वर्णव्यवस्था जन्मना नहीं कर्मणा मानी जाती थी। लेकिन आर्य-समाजियों में ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जो जाति के बाहर विवाह-सम्बन्ध स्थापित करने में संकोच का अनुभव न करते रहे हों। दूसरा अन्तर्विरोध यह था कि राजा राम मोहन राय, रानाडे आदि बहुत से लोग अंग्रेजी राज्य को देश के लिए वरदान समझते थे लेकिन उनके दोहन, शोषण आदि का विरोध करते थे। समाज में एक ओर संस्कृतीकरण यढ़ रहा था दूसरी ओर लीकिकीकरण। इस अन्तर्विरोध से गुजर करके आधुनिक काल का स्वरूप निखरा।

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