Ayodhya-Singh

Ayodhya Singh Upadhyay ” Hariaudh” Biography

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध ‘

पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय का जन्म सन्‌ 1965 में तमसा नदी के किमरे निज़ामाबाद, जिला आज़मगढ़ में हुआ । ये जाति के सनाढय ब्राह्मण थे । इनके पूर्वज प॑० काशीनाथ उपाध्याय जहाँगीर के शासन-काल में दिल्ली में रहते थे । राजकोप के भाजन किसी व्यक्ति को संरक्षण देने के कारण अशुभ परिणाम की आशंका से भागकर वे बदायूं आ गए। 


वहाँ से ठपाध्याय-परिवार किसी समय निज़ामाबाद में आ बसा | इसके ठपरांत इनके वंश में गुरूदयाल उपाध्याय ने सिख धर्म स्वीकार कर लिया। इनके नाम के आगे ‘सिंह’ ठसी स्मृति का सूचक है । इनके पिता का नाम पं० भोलासिंह उपाध्याय और माँ का रुक्मिणी देवी था। इनके चाचा ब्रह्मासिंह प्रसिद्ध ज्योतिषी होने के अतिरिक्त पंडिताई का काम भी करते थे। 


इनकी प्रारंभिक शिक्षा उन्हीं की देखरेख में हुई। सन्‌ 1879 में निज़ामाबाद के तहसीली स्कूल से इन्होंने मिडिल पास किया और सन्‌ 1884 में ये उसी स्कूल में अध्यापन का काम करने लगे। नार्मल परीक्षा इन्होंने सन्‌ 1887 में पास की । 


सन्‌ 1889 में कानूनगोई की परीक्षा में उत्तीर्ण हो, ये कानूनगो हो गए और इसके उपरांत रजिस्ट्रार पुन, सदरनायब कानूनगो, मिरदावर कानूनगो और फिर सदर कानूनगो के पद वर्ष तक कार्य करते हुए सरकारी नौकरी में रिटायर हुए | 


अवकाश प्राप्त करने पर सन्‌ 1923 में प॑० मदनमोहत मालवीय के अनुरोध से ये काशी विश्वविद्यालय के हिंदी-विभाग में आ गए, जहाँ सन्‌ 1941 तक इन्होंने अवैतनिक रूप से काम किया । यहाँ ये बाबू श्यामसुन्ददास और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सम्पर्क में आए । दोनों ही विद्वानों ने हिंदी साहित्य के इतिहासों में अपनी-अपनी प्रतिक्रिया के अनुसार उपाध्याय जी के काव्य का मूल्यांकन किया है ।

‘हरिऔध जी का विवाह  सन 1882 मैं  हुआ. उनकी  पत्नी  का  नाम  अन॑तकुमारी था। इनसे एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ । इनके पुत्र का नाम सूर्यनगारायण और पौत्रों का केशवदेव तथा मुकुंददेव है। उपाध्याय जी धार्मिक वृत्ति के चरित्नरवान व्यक्ति थे | 

स्वभाव से सरल, सहनशील और ठदार थे । नौकरी के दिनों में वे अपनी कर्मशीलता और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध रहे । दाढ़ी और साफा जीवन भर उनके व्यक्तिव के अंग बने रहे ।हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत, फारसी, उर्दू, गुरुमुखी ओर बँगला का ज्ञान उन्होंने स्वाध्याय से प्राप्त किया । 


अंग्रेजी से इन्होंने मर्थेट ऑव वेनिस (वेनिस का बाँका), फारसी से गुलजार दबिस्तों (विनोद वाटिका) और बँगला से कृष्णकांतेर बिल (कृष्णकांत का दान-पतन्र) हिंदी में अनुवाद किया । पहले ये ब्रजभाषा में रचना किया करते थे । ‘कृष्ण-शतक’ (सन्‌ 1882) नामक इनकी पहली रचना ब्रजभाषा में ही लिखी गयी । इस भाषा में इनका दूसरा प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रस-कलस’” है| 

इनका उपनाम ‘हरिऔध’ ब्रजभाषा काव्य-काल का ही है जो सिंह का ‘हरि’ और अयोध्या का “औध’ करके बनाया गया है । ब्रजभाषा के उपरांत इनका झुकाव खड़ी बोली की ओर हुआ । खड़ी बोली के महाकाव्यों में उपाध्याय जी के ‘प्रिय-प्रवास’ का अपना विशिष्ट स्थान हैं| इस ग्रंथ पर इन्हें सन्‌ 1936 में मंगलाप्रसाद परितोषिक प्राप्त हुआ । 6 मार्च सन्‌ 1947 को ठपाध्याय जी की मृत्यु हो गयी ।

उपन्यास, नाटक, रीडर, बाल-साहित्य, अनुवादित और संपादित ग्रंथों को मिलाकर उपाध्याय जी की कृतियों की संख्या पचास के आस-पास पहुँचती है । इनके प्रमुख काव्य-अंथों की सूखी इस प्रकार है-प्रिय-प्रवास (1914), रस-कलस (1931), वेदेही-वनवास (1940) | बोलचार, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, पद्य-प्रसून, पारिजात । प्रमांबु-वारिधि, प्रेमांबु-प्रसलवण, प्रमांबु-प्रवाह और प्रेम-प्रपंच ।

कृष्ण-चरित्र का मुख्य-आधार श्रीमद्भागवत का दशम स्कंध है। इस महासमुद्र में से अगणित कवियों ने अनंत भाज-मणियों का संचय किया । निश्चय ही इन मणियों पर तराश सबकी अपनी है, अत: चमक अपनी-अपनी है । ‘प्रिय-प्रवास’ राधा-कृष्ण-प्रेम की परंपरा को अनूठे ढंग से पुष्ट करने वाला खड़ी बोली का एक प्रसिद्ध महाकाव्य है। ब्रजवासियों के प्राण कृष्ण कंस के निमंत्रण पर अकूर के साथ मथुरा चले जाते हैं और फिर लौटकर नहीं आते । 

उनके इस प्रवास का वर्णन ही इस ब्ंथ का विषय है, अतः इसका नाम ‘प्रिय-प्रवास’ रखा गया है । कृष्ण से मधुरतर पुरुष व्यक्तित्व की कल्पना संभवतः संसार के साहित्य में कहीं नहीं हुई सभी कवियों की भाँति उपाध्याय जी के कृष्ण भी परम सुन्दर, सुकुमार, कला-प्रिय, सरस-हृदय और गुणवान व्यक्ति है। 

वे महापुरुष है। क्या नंद, क्‍या यशोदा, क्या गोप, क्या आभीर और क्‍या गोपियों सब उन्हें उनके गुणों के कारण स्मरण करते हैं। इस महापुरुष का हृदय भी पीड़ित है । कृष्ण के हृदय में गोकुल की ममता है, माता-पिता की चिंता है, गोपियों की निर्मल स्मृति है, सखाओ की प्रीति है और राधा के लिए अजश्न ऑँसुओं का निर्झर है ।

रूप-गुण-सम्पन्न राधा इस काव्य की नायिका है | वह कृष्ण की प्रेमिका हैं। पवन-दूत में राधा के अंतर की पीड़ा, मर्यादा और सहृदयता तीनों पूरी-पूरी व्यक्त हुई है । उद्धव के सामने अपनी शिष्टता, सौम्यता, संयम और स्नेह का परिचय राधा ने बड़े उपयुक्त ढंग से दिया है । प्रेम की पीड़ा उसके व्यक्तित्व को दबा नहीं पांती, यह उसके व्यक्तित्व की विशेषता है । 

प्यार और लोकहित-भावना के दोनों कूलों का स्पर्श करती हुई राधा की भावधारा बही है ।प्रिय-प्रवास में करुणा की जो सरिता बही है, ठसमें सबसे पृथुल धारा यशोदा के शोक की है । यशोदा के दुःख का समकक्षी ही नंद का दुःख है । प्राकृतिक छटाओं का विभाजन उपाध्याय जी ने कुछ इस ढंग से किया है कि बह एकदम स्पष्ट हो उठा है । प्रथम सर्ग ‘संध्यापटी” पर अंकित है | द्वितीय सर्ग का प्रारम्भ जब होता है | तब ‘द्विघटी निशा’ गत हो चुकी थी । 

वृक्ष-लताओं, पशु-पक्षियों और पुष्यों का वर्णन यद्यपि कहीं-कहीं अनावश्यक और कृत्रिम-सा लगता है, फिर भी एक स्थल ऐसा है जहाँ उपाध्याय जी ने प्रकृति का हृदय पहचाना है ।  तृतीय सर्ग “अर्द्ध रात्रि को लेकर चलता है। चतुर्थ, रात के “अंतिम प्रहर” में समाप्त होता है। पंचम में स्वभावत: ‘छा गयी व्योग लाली ।’ इसी प्रकार एकादश सर्ग में निदाघ का, द्वादश में वर्षा का, चतुर्दश में शरद और षोडस सर्ग में मधुमास का वर्णन है । 

प्रकृति के अंतर में सहानुभूति की स्थापना उपाध्याय जी ने पवन को लेकर उसी प्रकार की, जिस प्रकार कालिदास ने मेघ को लेकर । कालिदास की भाँति ही उपाध्याय जी ने अपने दूत का पथ-निर्देश किया, स्थान- परिचय कराया और साथ ही संकेतों से ठसे दशा-निवेदन का काम सौंपा । 

‘पवन दूत’ की कुछ मार्मिक पंक्तियों देखिए-…_

लाके फूले कमल-दल को श्याम के सामने ही,

थोड़ा-थोड़ा बिपूुल जल में व्यग्र हो-हो डुबाना,

यों देना ऐ भग्रेनि जतला एक अभोजनेत्रा,

आँखों को हो विरह-वि्धुरा वारि में बोरती है ।

सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो,

तो प्रॉवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना,

यो सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो,

मेरा होगा अति मलिन आ, सूखते नित्य जाना ।

उपाध्याय जी स्वयं ही “प्रिय-प्रवास’ को ‘भिन्नतुकांत कविता का महाकाव्य’ मानते हैं । राधाकृष्ण इसके नायक-नायिका है, सन्रह सर्गों में यह समाप्त हुआ है, शरृंगाग और करुण रस की इसमें प्रधानता है | यह काव्य संस्कृत के वर्ण-वृत्तों में लिखा गया है। इसमें उन्होंने सात छंदों-मालिनी, मंदाक्रांता, वंशस्थ, वसंततिलका, हुत-बविलंजित, शार्ट्ल-विक्रीड़ित तथा शिखारिणी-का प्रयोग किया है । 


भिन्न तुकांत होने पर भी किसी तुकांत ग्रंथ से इसका माधुर्य कम नहीं है। भाषा इसकी संस्कृत-गर्भित है, साथ ही ब्रजभावा के अनेक शब्दों के प्रयोग से इसे वांछित कोमलता प्रदान की गयी है ।’प्रिय-प्रवास’ प्रेम के वियोग-पक्ष का करुण निदर्शन है। इसमें प्रेम की, आदर, सख्य, स्नेह, वात्सल्य, भक्ति और प्रणव, सभी वृत्तियों का चित्रण पूर्ण तल्लीनता  से हुआ है, जिसमें लीन होने पर हृदय बार-बार यही सोचता रह जाता…

यदि विरह विधाता ने सृजा विश्व में था,

तब स्मृति रचने में कौन-सी चातुरी थी?

वैदेही-वनवास’ इनका दूसरा प्रबंध-काव्य है जिसमें सीता-परित्याग की कथा कही गयी है । उपाध्याय जी ने लोक में प्रचलित धोबी की कहानी को ज्थों का त्यों ग्रहण कर लिया है। राम लोक-निंदा से चिंतित हो पहले भाइयों से मंत्रणा करते हैं, फिर गुरु से | वशिष्ठ सीता को वाल्भीकि के आश्रम में भेजने का परामर्श देते है । राम इस रहस्य को सीता से छिपाते नहीं । 


जानकी गर्भवती होते हुए भी पति की इच्छा-पूर्ति के लिए यात्रा करना स्वीकार करती हैं और सास तथा बहिनों से विदा लेकर वन को चली जाती हैं। वशिष्ट इस संबंध में पत्र द्वारा वाल्मीकि को पहले ही सूचित कर चुके हैं। इस प्रकार यह कथानक अत्यन्त सरल ढंग से विकसित होता है। 


अन्य प्रबंध-काव्यों की भाँति इसकी मार्मिकका घटनाओं के उतार-चढ़ाव से अधिक वर्णन की सरलता में निहित है । पंचम सर्ग में राम-सीता के बीच जो संवाद चला है, उसमें कोई विशेषता नहीं है, फिर भी वह पाठक के मन को विषाद-मग्न कर जाता है-

यह अपवाद लगाया जाता है मुझ्नको उत्तेजित कर,

द्रोह-विक्श दनुओजं का नाश कराने में डर हो. तत्पर ।

इसी सूत्र से कतिपय कुत्साओं की हे कल्पना हुई,

अविवेकी जनता के मुख से निंदनीय जल्पना हुई ।

इच्छा है कुछ काल के लिए तुमको स्थानानतरित करूँ।

इस ग्रकार उपज प्रतीति, मैं प्रजा-पुंज की श्रांति ह।

क्यों दूसरे पसे, संकट में पड़, बहु दुख परोगते रहें?

क्यों न लोक-हित के निमित्त जो सह पायें हम स्वयं सहें?

जनक-नंदिनी ने दृग में आते आंसू को रोक कहा,

प्रणणाथ सब तो सह झूँगी, क्‍यों जायेगा विरह सहा?

सदा आपका क.द्रान अकलोके ही में जीती हूँ।

रूप-माधुरी-सुथधा तृकति क्‍न क्‍कोरिका-सम प्रीती हूँ।

आश्रम में लव-कुश का जन्म होता है | वे जब बारह वर्ष के हो जाते हैं, तय एक दिन सूचना मिलती है कि भगवान राम ने अयोध्या में अश्वमेघ यज्ञ का विधान किया है। सीता उसमें आमंत्रित हैं। आश्रम के निवासियों के साथ जानकी और लव-कुश को लेकर वाल्मीकि उस आयोजन में सम्मिलित होते हैं। 


अयोध्या की समस्त प्रजा सीता को देखने के लिए ठत्कंठित है । मंडप में वैदेही के पहुंचते ही राम उनका स्वागत करने के लिए आगे बढ़ते हैं। पति-पत्नी का सामना एक बार फिर होता है। सीता पति का चरण स्पर्श करने के लिए झुकती ही हैं कि हर्बातिरेक से उनके प्राण निकल जाते हैं-

ज्यों ही प्रति-प्रणा ने प्रति-पद प्रद्च का

स्पर्श किया, निजीव मूर्ति सी बन गई,

और हुए अतिरेक चित्त उल्लास का,

दिग्य ज्योति में परिणत वे फल में हुई ।

‘प्रिय-प्रवास’ के उपरान्त “वैदेही-वनवास’ उपाध्याय जी का दूसरा प्रबंध- काव्य है। उसमें राधाकृष्ण के वियोग का वर्णन है, इसमें राम-सीता के । वह सत्रह सर्गों में समाप्त हुआ है, यह अठारह सर्गों में । वह संस्कृत के वर्ण-यृत्तों में है, यह हिंदी के छंदों में । उसकी भाषा प्रौढ़ है, इसकी सरल । यों दोनों ही में आदर्श प्रेम का वर्णन है, दोनों ही में उदात भावनाओं का चित्रण है, दोनों ही का झुकाव लौकिकता से अधिक आध्यात्मिक मूल्यों की ओर है, दोनों ही में करुण- रस की प्रधानता है। पर जहाँ तक साहित्यिक सफलता का संबंध है, दोनों में धरती आकाश का अंतर है ।

‘प्रिय-प्रवास’ की गणना इस युग के श्रेष्ठटम काव्य- ग्रंथों में होती है, जबकि “वैदेही-वनवास’ को वैसा सौभाग्य कभी प्राप्त नहीं हुआ । “वैदेही-वनवास’ में ‘प्रिय-प्रवास  की गरिमा और मौलिकता की खोज करना व्यर्थ होगा । ठसमें तो एक सरल-सी कहानी सीधे ढंग से कह दी गयी है । 

‘प्रिय-प्रवास’ की रचना के उपरान्त उपाध्याय जी ऐसा मानने लगे थे कि हिंदी तद्धव शब्दों से बनी है, इसी से उनका झुकाव न केवल वैसे शब्दों की बहुलता की ओर हुआ, वरन कोमल कांत पदाकली कौ खोज में ब्रज के प्रचलित शब्दों की अधिक से अधिक ग्रहण करने के साथ भाषा में चमत्कार उत्पन्न करने की धुन में मुहावरों के प्रयोग के पक्ष में भी वे हो गए । 

स्वभावतः इसकी कला में भी ‘प्रिय-प्रवास’ की सी गरिमा के दर्शन नहीं होते।इस अभावों के होते हुए भी “वैदेही-वनवास’ एक मार्मिक काव्य-कथा है । सीता-परित्याग का तो प्रसंग ही ऐसा है कि वह प्राणी के हृदय को द्रवीभूत कर देता है। 

इस ग्रंथ में कवि ने आर्य-संस्कृति के उज्जवलतम पक्ष को उभार कर हमारे मानस को राम-सीता के दिव्य चरित्र की आभा से आलोकित कर दिया है । सच बात तो यह है कि जिस सरलता की प्रवृत्ति ने ‘वैदेही-वनवास’ को एक साधारण  कृति बना  दिया  है. यह  सरलता  ही  इससे  आकर्षक  और  पठनीय  भी  बनाती है । 

इसके आकर्षण का मूल कारण कथानक, शिल्प और आदर्श की आडंबर-श््पता ही है कौन नहीं जानता कि अत्यधिक सरलता में भी आँखों को खींचने हृदय को प्रभावित करने की एक शक्ति होती है?रस-कलस’ रस का विस्तृत विवेषन करने वाला एक रीति-ग्रन्थ है । युग की परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार नायिका-भेद के अंतर्गत इन्होंने कुछ नवीन ढंग की नायिकाओं-देश-प्रेमिका, लोक-प्रेमिका, जाति-प्रेमिका, परिवार-प्रेमिका-की करुपना की है। 

ऐसी नायिकाओं के उदाहरण अधिकतर उपाध्याय जी की रचनाओं में ही मिलते हैं। नायिका-भेद की रुढ़िबद्ध पद्धति को विकसित करने की दृष्टि से इनका यह काम महत्वपूर्ण अवश्य कहा जायगा। पर आधुनिक युग में हमारे कवि रस और नायिका-भेद पर दृष्टि रखकर रचना करते ही नहीं, इसी से इनका यह अ्न्थ न तो अधिक प्रसिद्ध हो पाया और न इनकी नवीन उद्धावनाओं को व्यापक मान्यता ही प्राप्त हो सकी । 

ग्रन्थ में उद्धरण ब्रजभाषा में दिये गये हैं जिनमें इन्होने अपने ‘हरिऔध’ ठपनाम का प्रयोग भी किया है। इनके काव्य में मर्यादा और संयम का सूत्र बराबर विद्यमान रहता है, इसी से इनके कवित्त-सवैये रीतिकालीन-कवियों की अश्लीलता से तो अछूते रहे, पर आत्मा इनकी वही है । वाणी का विलास और चमत्कार इनमें ठसी कोटि का पाया जाता है। 


उदाहरण लीजिए–

(1)

अमल धवल चारू चांदनी सरद वारी।

आनन उजास आगे लागति  कपट-सी॥

आतप की थाए हूँ ते तन कुम्हिलान लागे।

देखि छवि नीकी जाति रति हूँ रफ्ट-सी॥

हरिऔँथ’ कोमलता ऐसी कामिनी की अही।

एलुरी गुलाब गात  आवति उपट-सी॥

खून असून लौ सुरंग. अंग-अंग.. दीखौ।

कड़त सरीर सो सुगंध की लफ्ट-सी॥

(2)

बाते सरोस कबाँ कहिकै हित सो कबहूं समझाइवों तेरों ।

मेरे घने अफ़राधन को बहु व्योत बनाह दुराइबो तेरों ।

कोह किए कपटी हरिआऔध’ के रंघक हू त रिसाइबो तेरो ।

मारियो प कौ न सालत है, पर सालत बचहनयो तेरों ॥

प्रबन्ध-काव्यकार और आचार्य के अतिरिक्त उपाध्याय जी का एक रूप वह है जहाँ वे भाषाविद्‌ के रूप में हमारे सामने आते हैं। ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों के मर्म के वे पूर्ण ज्ञाता थे | संस्कृतनिष्ठ और सरल-भाषा लिखने में वे समान रूप से पटु थे। उनकी काव्य-साधना में एक ऐसा काल भी उपस्थित हुआ जब उनके जीवन के अनेक वर्ष एक साधारण से प्रयोग के पीछे व्यतीत हो गए । 


यह प्रयोग था हिंदी में मुहावरों से युक्त चतुष्पदियाँ (रुबाइयों) लिखने का । उपाध्याय जी इन्हें ‘बोलचाल की रचना’ कहते हैं। इनकी प्रेरणा के सम्बन्ध में उन्होंने एक स्थान पर स्वयं लिखा है- “उन दिनों आज़मगढ़ में मुशायरों की धूम थी । बन्दोबस्त वहाँ हो रहा था । अहलकारों की भरमार थी। उनका अधिकांश उर्दू प्रेमी था। प्रायः हिंदी-भाषा पर आवाजें कसी जाती, उसकी खिलली उड़ाई जाती, कहा जाता-हिंदी वालों को बोलचाल की फड़कती भाषा लिखना ही नहीं आता | 


वे मुहाविरे लिख ही नहीं सकते । इन बातों से मेरा हृदय चोट खाता था। कभी-कभी मैं तिलमिला उठता था । उर्दू-संसार के एक प्रतिष्ठित मौलवी साहब जो मेरे मित्र थे और आज़मगढ़ के ही रहने वाले थे, जब मिलते, इस विषय में हिंदी की कुत्सा करते, व्यंग्य बोलते ।

अतएव मेरी सहिष्णुता की भी हद हो गई । मैंने बोलचाल की मुहावरेदार-भाषा में हिंदी-कविता करने के लिए कमर कसी । इसमें पाँच-सात बरस लग गये और “बबोलचाल’, “चुभते चौपदे” और “चोखे चौपदे” नामक ग्रंथों की रचना मैंने की ।” पर इनकी रचनाओं के अध्ययन से पाठक के मन पर जो प्रतिक्रिया होती है,वह भिन्न प्रकार की है ।

ऐसा लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में कोरे आवेश से काम नहीं चलता और ऊँचे से ऊँचा उद्देश्य भी अपने में कुछ नहीं है। मुख्य बात है क्षमता और संभावना की । उपाध्याय जी ने तो चौपदों का ढेर लगा दिया, पर उससे सिद्ध क्‍या हुआ? हुआ यही कि हिंदी में गजलों और सोनेटों के समान रुबाइयाँ लिखने का काम भी सफल नहीं हो पाया। 


मुहावरों का एक प्रयोग होता है। सहज और अनायास, एक होता है प्रयत्मज-जैसे-तैसे किसी पंक्ति में उन्हें खपा देना । प्रयोग दोनों हैं, पर पहला स्वाभाविक है, दूसरे से कृत्रिमता झलकती हैं उपाध्याय जी ने अनेक प्रकार के बंधनों के साथ जिस सीमित क्षेत्र में प्रवेश किया, उसमें भावना की गंभीरता, विचारों की उत्कृष्टता और कल्पना की उड़ान के लिए वांछित भूमि की कमी स्पष्ट झलकती है । 


उदात्त भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए उदात्त भाषा और शैली की आवश्यकता पड़ती ही है | चौपदों में लिखी कविताओं का हल्कापन तो उनके शीर्षकों से ही सिद्ध हो जाता है। शीर्षक हैं-कसक कसाले, बावले की बड़, चाहत के चोचले आदि | यह और बात है कि निरंतर अभ्यास के कारण इन चौपदों में कहीं-कहीं चमक आ गयी है । 


सच बात यह है कि उपाध्याय जी को यह चैलेंज स्वीकार करना ही नहीं था | हिंदी के विरोधियों ने हमारी भाषा के सम्बन्ध में कब, क्‍या नहीं कहा? उनके मुंह लगने की आवश्यकता नहीं है । 

कुछ अच्छे चौपदे देखिए-

(1)

लगी जलने सारी दुनिया,

आग जी में लग जाने से,

हवा हो गया हमारा सुख,

घटा दुख की पघिर आने से।

(2)

.प्या वाली बहु आँखों में,

बहुत ही खिलते हैं आँ,

एक दिन ऐसा आता हैं,

धूल में मिलते हैं आय ।

(3)

चेत आया अचेत होकर,

चित्त खो चेतनता आई,

राह मिल गई राह भूले

सब गंवा सारी सिधि प्राई

अयोध्वासिंह उपाध्याय द्विवेदी-युग के प्रमुख कवियों में से हैं । ‘प्रिय-प्रवास’ की रचना के कारण उनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में अमर रहेगा । उनका सादा जीवन जाति, धर्म, देश और संस्कृति की चिंता में व्यतीत हुआ। राष्ट्रीयता और विश्व-बंधुत्व दोनों की भावनाओं से उनका कोमल इृदय ओत-प्रोत था । 


उनकी लोक-संग्रह की भावना को देखकर यह बात निस्‍संकोच भाव से कही जा सकती है कि अपने युग में उनकी चेतना किसी से कम विकसित नहीं थी |

READ ALSO:

About admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*