Balkrishan Bhatt

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बालकृष्ण भटट (1884-1914)

भारतेन्दु के समसामयिक निबन्ध-लेखकों में सच्चे अर्थ में दो ही निबन्धकार थे– प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भटूट | दोनों के व्यक्तित्व में सादृश्य की अपेक्षा विसादृश्य अधिक है। मिश्र जी का व्यक्तित्व ग्राम्य था तो भट्ट जी का नागर। पहले में सरलता और मनमीजीपन था तो दूसरे में परिष्कृत और परिपक्वता। मिश्र जी कम पढ़े लिखे थे। पर भट्टजी संस्कृत के प्रकांड पण्डित थे। उन्हें अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था। अनेक प्रकार के

आर्थिक-सामाजिकर संकटों के कारण उनकी वाणी में तल्‍्खी आ गई थी। मिश्र जी में धार्मिक कड्टरता के कारण रूढ़िवादिता भी मिलती है पर भट्ट जी रुढ़ियों के जानी दुश्मन थे | 


भटट जी का पहला निवन्ध कालिराज सभा १८७२ में “कवि वचन सुधा” में छपा।,१६८७७ में उन्होंने हिन्दी प्रदीप का संपादन आरम्भ किया । प्रदीप के मुखपृष्ठ पर छपा रहता था–‘शुभ सरस देश सनेह पूरित प्रगट है आनन्द भरे।’ इससे पत्र की नीति और भट्टजी के व्यक्तित्व दोनों का पता लगता है। अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करते हुए वे तैंतीस वर्षों तक उसे निरन्तर निकालते रहे ।

भारतेन्दु और प्रतापनारायण मिश्र राजनीतिक मान्यताओं में उदारबादी या लिवरल कहे जा सकते हैं। वे देशभक्ति और राजभक्ति दोनों को एक साथ लेकर चलना चाहते थे किन्तु भइजी को यह खिचड़ी नहीं पसन्द थी। हिन्दी लेखकों में वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इस नीति का स्पष्ट और तीखा विरोध किया। वे देशभक्ति और राजभक्ति को एक दूसरे का विरोधी मानते थे। उन्होंने लिखा है– ‘हमारा कथन है कि राजभक्ति और प्रजा का हित दोनों का साथ कैसे निभ सकता है? जिसे हँसना और गाल का फुलाना, बहुरी चवाना और

शहनाई बजाना एक संग नहीं हो सकता ऐसा ही यह भी असम्भव और दुर्घट है।’ राजनीति में वे लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे। अंग्रेजों को इतनी खरी खोटी न तो भारतेन्दु सुना सके थे और न तो प्रतापनारायण मिश्र। ‘सॉंप बन के काटना, और ओझा बन झारना यह हिकमत भार लोगों को ही मालूम हैं। अंग्रेज बाहर से भले भले लगें, हैं कुटिलता की खान। अंग्रेजी शासन की कटु आलोचना करने के ताथ ही भइजी ने विदेशी शासन की विकृतियों को अपेक्षाकृत गहराई में बैठकर देखा। वे अपने युग के साहित्यकारों में सर्वाधिक व्यापक और गहन दृष्टि रखनेवाले व्यक्ति थे, सरकारी पिट्ठुओं के कट्टर शत्रु होने के कारण राजा शिवप्रसाद और सर सैयद अहमद खाँ को उन्होंने आड़े हाथों लिया। जहाँ तक साहित्यिक निबन्धों का प्रश्न है उनमें विविधता अधिक है। एक ओर वे मिश्रजी के टक्कर का व्यंग्य-विनोद प्रधान निबन्ध लिख सकते हैं तो दूसरी ओर गम्भीर

विश्लेषणामक निवन्ध। ‘चलता है” निबन्ध का एक उद्धरण देखिये– 

“चलता है रांड का चरखा, वो भटियारिन का मुँह, बस जो चला काहे को रुकता है, कर्कशा लड़ाकिन मेहरियों की जुबान, एक मुँह में सौ-सी गाली, जवान क्या कतरनी हो गई, आँघी हो गई, रेल का इंजन हो गई — किसी का मुँह चला तो किसी का हाथ चल निकला। दे तमाचा गालों में, चट दोनों झोंटि-झोटि करते गटपट लड़ते-लड़ते लस्त हो गई पर जवान न रुकी वाह रे चलने का जोश ।” 

फिर भी इसमें एक तरह की सुसंबद्धता और विश्लेषणामक आ गई है। भय और समुचितादर, दृढ़ता, आत्मनिर्भरता, प्रेम और भक्ति, ज्ञान, भक्ति, स्पर्धा, प्रीति आदि उनके विश्लेषणालक और मनोवैज्ञानिक निवन्ध हैं जो आगे चलकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्यामसुन्दरदास द्वारा विकसित हुए और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल में पूर्णता की उपलब्धि की। गद्यकाव्य के आधाचार्य भी वे ही हैं। ‘चन्द्रोदय’” निबन्ध गद्य-काव्य का पहला नमूना है।

भाषा पर भट्ट जी का पूरा अधिकार था। विषय के अनुरूप भाषा का प्रयोग उनके सामर्थ्य का द्योतक है। उनके निबन्धों के प्रतिपादन का ढंग भी इतना सरस है कि पढ़ने में कथाओं-सा आनन्द आता है। विनोद और व्यंग्य तो उनकी लेखन-शैली के अभिन्न अंग हैं। उनके व्यंग्य प्रतापनारायण मिश्र की अपेक्षा अधिक चुटीले और कर्कश होते हैं। उर्दू के शब्दों का प्रयोग करने में इन्हें किसी प्रकार का संकोच नहीं होता। नहूसत, बदजायका, हिर्स, आदि सैकड़ों शब्दों के प्रयोग मिलेंगे। कहीं-कहीं तो अनुच्छेद के अनुच्छेद उर्दू शब्दावली से गुथे रहते हैं।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि अर्थ-बोध की सुगमता के लिए ये कोष्ट में अंग्रेजी के शब्द जैसे ‘फीलिंग,’ ‘परसेशशन’ रख देते हैं। कहीं-कहीं अंग्रेजी के शीर्षक तक रखे हुए हैं। इस प्रकार की शब्दावली का व्यवहार वे केवल मौज में आकर नहीं करते थे, प्रद्युत इसके पीछे तत्कालीन आवश्यकता की प्रेरणा थी। उत्त समय अंग्रेजी पढ़ेलिखे लोगों के लिए हिन्दी शद्धावली अपरिधित-सी थी। विशेष अर्थ-गर्म शब्दों के स्पष्टीकरण के लिए

उनका अंग्रेजी पर्याय देना आवश्यक था। कुछ विशेष लेखकों की बात जाने दीजिए जो अंग्रेजी शब्दों का व्यवहार केवल इसलिए करते हैं कि लोग जान लें अंग्रेजी में उनकी भी गति है।

भटजी की भाषा सम्बन्धी देन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, किन्तु खड़ीबोली के आदर्श स्वरूप का निर्माण वे न कर सके। भाषा में पूर्वीपन का प्रयोग सर्वत्र मिलता है। उठाकर के स्थान पर उठाय, बैठाकर की जगह बैठाय प्रायः लिखा करते ये। कहीं-कहीं लिंग सम्बन्धी अशुद्धियाँ भी मिलती हैं जैसे ‘हमारी समाज” आदि। पर मुहावरों के प्रयोग में भट्टजी बड़े निपुण थे। इनके तभी लेखों में मुहावरों के प्रयोग से एक प्रकार की सजीवता आ गई है।

इन्होंने अपने संस्कृत-ज्ञान का पूरा-पूरा उपयोग किया है। निवन्धों के बीच-यीच में संस्कृत के श्लोक उद्धृत कर अपने विचारों को शास्त्र तथा पुराने विद्वानों के विचारों के मेल में रख कर उनकी पुष्टि करते जाते हैं। यथास्थान हिन्दी के दोहे और चौपाइयों का उद्धरण भी दे देते हैं। अरबी-फारसी के शेर और मिसरे रखने में भी उन्हें किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं प्रतीत होती।

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