Bhartendu Harishchandra

Bhartendu Harishchandra

भारतेन्दु हरिश्चंद्र

भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में 9 सितम्बर सन्‌ 1850 को हुआ । जाति के ये अग्रवाल वैश्य थे । इनके पिता का नाम गोपालचंद्र ठर्फ गिरिधर दास था और माँ का पार्वती । गोकुलचंद्र नाम के इनके एक छोटे भाई थे । हरिश्चंद्र इतिहास-प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के वंशज थे ।

बचपन में इन्हें हिंदी की शिक्षा पं० ईश्वरदत्त, उर्दू की मौलवी ताजअली और अंग्रेजी की शिवप्रसाद सितारेहिंद से मिली | कुछ दिन ये क्वींस कालेज के भी विद्यार्थी रहे । भारतेन्दु ने अल्प आयु में ही एक दोहे की रचना कर अपने कवि पिता को चकित किया था। सन्‌ 1864 में इन्होंने अपने परिवार के साथ जगम्नाथपुरी की यात्रा की और इसके उपरांत इनका विद्यार्थी-जीवन समाप्त हो गया ।

जब ये पाँच वर्ष के थे तो इनकी मां का तथा जब दस वर्ष के हुए तो पिता का देहान्त हो गया | सन्‌ 1883 में इनका विवाह हुआ । पत्नी  का नाम मन्ना देवी था जिससे ये कुछ खिंचे-खिंचे से रहते थे । भारतेन्दु की विद्यावती नाम की एक पुत्री थी जिसके पुत्र बाबू ब्रजरलदास हुए।

माधवी और मल्लिका नाम की हरिश्चंद्र की दो प्रेमिकाएँ थीं। माधवी एक क्षत्री की लड़की थी जो मुसलमान हो गयी थी। उसे शुद्ध कराकर इन्होने अपने साथ रखा | मल्लिका इनके पड़ोस में रहने वाली एक बंगाली कवयित्री थी। इनके अतिरिक्त नृत्य-गान के लिए काशी की वेश्याएं भी आती रहती थीं। भारतेन्दु रसिक जीव थे ।

भारतेन्दु ने समाज और साहित्य दोनों के लिए बहुत कुछ किया । उन्होंने तीन पत्रिकाएँ निकालीं-सन्‌ 1868 में “कवि-वचन-सुधा’, सन्‌ 1873 में हरिश्चंद्र मैगेजीन जिसका नाम आगे चलकर “हरिश्चथंद्र चंद्रिका’ हो गया और सन्‌ 1674 में “बाला बोधिनी । 

इसके अतिरिक्त इन्होंने अपने चारों ओर लेखकों का एक मंडल तैयार कर लिया था जिसमें उस युग के प्रसिद्ध साहित्यकारों में हम पं० बदरीनारायण चौधरी “प्रेमघन’ पं० प्रतापनारायण मिश्र, पं० बालकृष्ण भट्ट, पं० अंबिकादत्त व्यास, पं० राधाकृष्ण गोस्वामी, डॉ० जगमोहनसिंह और लाला श्रीनिवासदास के नाम ले सकते हैं।

इनमें से प्रतापनारायण मिश्र ने “ब्राह्मण’, उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ने “आनन्द कादंबिनी! और बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी अ्रदीप’ का स्वतंत्र रूप से संपादन किया ।

सन्‌ 1873 में भारतेन्दु ने ‘पेनी रीडिंग’ नाम से एक गोष्ठी स्थापित कीं उसी वर्ष ‘तदीय समाज’ नाम की एक सभा की नींव डाली ।

शिक्षा प्रसार के लिए इन्होंने एक स्‍कूल खोला ओ “चौखंभा स्कूल’ के नाम से जाना जाता था| वही

स्कूल अब उन्नति करते-करते “हरिश्चंद्र डिग्री कालेज” हो गया है ।

भारतेन्दु ने कलकत्ता, लाहौर, मंसूरी, बुलंदशहर और अजमेर आदि दूर-दूर स्थानों की यात्राएं करके अपने अनुभव में वृद्धि की । प्रयाग ये दो बार आए । यहाँ की ‘हिंदी-वर्द्धिनी-सभा में कविता में इन्होंने जो व्याख्यान दिया, उससे  इनका हिंदी-प्रेम टपकता है. 

राजा शिवप्रसाद अंग्रेज-शासकों के कृपा-भाजन थे । हिंदुस्तानी के पक्षपाती होने के कारण भारतेन्दु से उनकी नहीं पटती थी |

सरकार की ओर से जब उन्हें “सितारेहिंद’ की पदवी मिली, तो पत्रकारों और लेखकों का क्षुग्ध होना स्वाभाविक था अतः सन्‌ 1880 में ‘सार-सुधानिधि’ नामक पत्रिका में प्रस्ताव किया गया कि इनहें ‘भारतेन्दु’ के नाम से संबोधित किया जाय और इस प्रकार जनता ने इन्हें सितारे” की तुलना में ‘इंद” बना दिया ।

भारतेन्दु की हिंदी-सेवा को देखते हुए यह सम्मान उपयुक्त ही था ।

भारतेन्दु स्वभाव से अपव्ययी थे। जब इनके छोटे भाई गोकुलचंद्र वयस्क हुए, तो उन्होंने बँटवारे के लिए आग्रह किया । अपने हिस्से का यह बहुत कुछ पहले ही उड़ा चुके थे। अतः इस बंटवारे में इनके हाथ बहुत कम लगा ।

जीवन के अंतिम दिनों में अर्थ का इन्हें अभाव रहा । धीरे-धीरे स्वास्थ्य गिरने लगा। पहले  इन्हें खासी और ज्वर का प्रकोप हुआ और फिर क्षय के लक्षण प्रकट होने लगे । अंत में 25 जनवरी सन्‌ 1885 को इनका स्वर्गवास हो गया |

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की समस्त कविताएँ अब नागरी-प्रचारिणी-सभा काशी द्वारा भारतेन्दु-ग्ंथावली भाग 2 के रूप में संकलित मिलती हैं।

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं के शीर्षक इस प्रकार हैं-कृष्ण चरित्र, रामलीला, जैन कुतृहल, उत्तरार्दध भक्तमाल, प्रेम-मालिका, प्रेम-सरोवर, प्रेमाश्रु वर्णन, प्रेम-माधुरी, प्रेम-तरंग, प्रेम- प्रलाप, विनय प्रेम पचासा, प्रबोधिनी, विजय वल्लरी, विजयिनी विजय पताका, वर्षा विनोद, उर्दू का स्थापना, नए जमाने की मुकरी और सतसई खंगार ।

भारतेन्दु ने वैष्णव घराने में जन्म लिया था और वे वल्लभाचार्य द्वारा प्रचारित सम्प्रदाय के अनुयायी थे | यही कारण है कि हृदय से भक्त होने के कारण कृष्ण की समस्त लीलाओं का वर्णन उन्होंने बड़े अनुराग से किया हैं इस दृष्टि से वे विद्यापति, सूर और अन्य कृष्ण-भक्तों के परम्परा में आते हैं।

कृष्ण के चरित्र- गान के साथ हरिश्चंद्र ने कृष्ण-भक्तों की भी अनुराग-पूर्वक चर्चा की है। नाभा जी की “भक्त-माल’ के अनुकरण पर उन्होंने “उत्तर भक्त-माल’ की रचना की ।

इसमें उन्होंनें अपने वंश के उल्लेख के साथ कृष्ण-भक्त आचार्यों का गुणगान किया है तथा अपने समय तक जिन हिंदू-मुसलमान कृष्ण-भक्तों की चर्चा उन्होने सुन थी, उतका परिचय भी दिया है इसी प्रंण में भारतेन्दु का बह छप्पय है जिसमें यह प्रसिद्ध पंक्ति आती है-इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिंदुन कारियै ।

हरिश्चंद्र ने यद्यपि कृष्ण की लीला का गान किया है, फिर भी किसी प्रकार की साम्प्रदायिक कट्टरता उनमें नहीं पायी जाती है ।

सभी अवतारों की वंदना उन्होंने समान भाव से की है। यह दूसरी बात है कि उनका विशेष झुकाव कृष्ण लीला की ओर है और उसका कारण यह है कि वह उनके मन और प्रवृत्ति के अधिक अनुकूल था।

दीनता भी प्राचीन भक्तों की-सी हरिश्चन्द्र के काव्य में पायी जाती है । उसी के साथ उलाहना एवं ताना देना भी बना हुआ हैं प्राचीन भक्तों के समान वे अजामिल, गजराज, गीधघ, गनिका, घा सुदामा आदि की चर्चा करते हुए पूछते हैं? 

क्या हम इस कोटि में नहीं है? भगवान के अनुप्रह को हरिश्चन्द्र ने अनेक स्थानों पर स्वीकार किया है। मन के प्रति उनका वैसा ही दृष्टिकोण है, जैसा अन्य भक्तों का |

शरीर की अशुद्धता और मन के विकारों का प्रसंग उठाते दर उन्होंने वैराग्य की दृढ़ता के लिए सांसारिक सुख की निस्सारता प्रदर्शित की राधा-कृष्ण-काव्य में एक स्थल ऐसा है जहां भक्ति और श्रृंगार एक हो जाते हैं, अर्थात्‌ जहाँ यह निर्णय करना कठिन है कि इस रचना को भक्ति के अंतर्गत लें अथवा श्रृंगार के वह्पि भारतेन्दु ने एक स्थल पर राधा को माता और कृष्ण को पिता कहा है, परन्तु जहाँ उन्होंने राधा-कृष्ण के मिलन का वर्णन किया है, वहाँ लेखनी को बहुत ढील दे दी है।

कहीं राधा के वक्ष की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कृष्ण की गोदी में वे उन्हें देखते हैं, कहीं फूलों की सेज और पाँवड़े बिछाकर राधा को कृष्ण की प्रतीक्षा करते पाते हैं, कहीं निकुंज में दोनों गले में बाँह डाले बैठे हैं, कहीं मुख-से-मुख मिलाए ऊँची अटारी में बिछे पलंग पर पौड़े हैं । 

यहीं तक नहीं, इधर राधा-कृष्ण रति-श्रम से श्रमित हैं, उधर समस्त क्रियाओं का अवलोकन करती हुई सखी पास बैठी पंखा झूला रही है। सखियों का सकुचाना तो दूर, वे ठस ‘संगम के गुन’ मधुर स्वर से गा रही है और आगे बढ़िए तो एक सखी ऐसी भी है जो ओट में होकर “सुरत-सुख’ देखती है।

इस प्रकार राधा- कृष्ण के इस प्रेम-चित्रण में वासना का प्राधान्य है, यहाँ तक कि अनेक स्थलों पर अश्लीलता आ गयी है ।

गोपी-कृष्ण प्रेम के कुछ उदाहरण लीजिए-

नव कुंजन बैठे प्रिया नंदलाल जू जानत हैं सब कोक-कला ।

दिन में तहाँ दूती भुराह कैलाई, महा छवि-धाम नह अबला ।

ज्य थाय गही हरिषंद’ पिया तब कोली अजू तुम मरोहि छला।

मोहिं लाज लगे, बलि पाँव परा, दिन ही हहा ऐसी न कौजे लला ॥

ऊथो यू सूझों गहों कह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है।

कोऊ नहीं सिख मानिहै हथां, इक श्याम की प्रीति प्रतीति खरी है 

ये ग्रज्याला सबे इक सी, रिचंद” जू मंडली ही बिगरी है।

एक जो होय तो ज्ञान सिलाइए, कृप ही में यहाँ भाग परी है ।

फ्ले ही जाय मिले गुन में, श्रवन फ्रेरि,

रूप-सुधा मधि कीनो नैनहू एयान है!

हँंसनि, नटनि, चितवनि, मुसुकानि, सुथराई,

रसिकाई ग्रिल मति पफवय प्रान है।

मोहि-मोहि मोहन-मरई री मन मेरों भयो

हरिचंद’ भेद ना फरत कछु जान है।

कान भये आनमय, गान भये कान्हमय,

हिब में न जानी परी कान्ह है किप्रान है।

हरिश्चंद्र का जीवन एक प्रकार से प्रेम का जीवन था । उनके शब्द-शब्द से प्रेम टपकता है । अनेक प्रकार से प्रेम की व्याख्या उन्होंने की और उसकी महसा का प्रतिपादन किया |

रसिकता और पीड़ा का विचित्र संयोग भारतेन्दु के प्रेम-सम्बन्धी कवित-सवैयों में पाया जाता है। रीति-काल के मस्त प्रेमी-कवियों की-सी सरसता और कोमलता उनमें पायी जाती है।

इन रचनाओं की मार्मिकक के मूल में एक प्रकार की अतृप्ति की भावना है जो एक ओर अनन्यता और दूसरी ओर की लापरवाही से उत्पन्न होती है ।

प्रेम में बहुत-कुछ पाकर भी हरिश्चंद्र का हृदय पूर्ण रूप से कभी संतुष्ट नहीं हुआ, इसी से संयोग की अपेक्षा वियोग-सम्बन्धी उनकी रचनाएँ अधिक प्रभावशाली हुई हैं—

(1)

जानि सुजान मैं प्रीति करी सहिके जग की यहु भाँति हसाईं।

त्यों हरिचंदजू” जो-जो कहाँ स्रे करग्रो बुप है कारि कोटि उपाई।

सोऊ नहीं विबही उनसों उन तोरत बार कछू ने लगाई।

साँची भई कहनावति वा अरी ऊँची दुकान की फ्रीकी मिठाई ॥

(2)

प्रिय प्यरे बिना यह माधुरी मूरति औरन को अब पेलिये का /

छुल छाँड़ि के संगम को तुमरे इन तुष्छकन को अब लेखिये का /

हरियंद जू” हौरत को बेक्हार के काँकत को लै परेकिये का /

जिन आँखित में ठुब रूप बस्‍्ले उन आँखिन सो अब देखिये का ।

(3)

हन दुखियान को ने चेन सपने हूँ मिलनी

कतसों सदा व्याकूल बिकल अकुलायंगी 

प्यरे हरियंद जू” की कीती जानि औष, प्रान

फाहत फक्ले ऐ ये तो संग न समाय॑गी ।

देखकें एक करहू न नैन भरि तोहि या में

जौन-जौन लोक जैहें कहाँ प्रछतायँगी ।

बिता प्राम-प्योोो भये दरस तुम्हारे हाय,

मरेहू ऐ आंखें ये जुली ही रहे. जायंगी ।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ रचनाएं उनकी राजभत्ति की परिचायिका है। 14 दिसम्बर 1861 को महारानी विक्टोरिया के पति एलबर्ट की मृत्यु हुई । उस समय भारतेन्दु ने ‘अलवरत वर्णन अंतर्लापिका’ लिखी ।

सन्‌ 1669 में विक्टोरिया के द्वितीय पुत्र ड्यूक ऑव एडिन्यरा भारतवर्ष आए । हरिश्थंद्र ने “श्री राजकुमार- सुस्वागत-पत्र’ लिखा । सन्‌ 1871 के नवम्बर मास में प्रिंस ऑव वेल्स टाइफायड से बीमार रहे ।

हरिश्चंद्र ने ‘श्रीमान्‌ प्रिंस-ऑव वेल्स के पीड़ित होने पर कविता लिखी । सन्‌ 1874 में ड्यूक ऑव एडिन्यरा का विवाह रूस की राजकुमारी ग्रांड डचेज मेरी के साथ हुआ । हरिश्चंद्र ने मुंह दिखावनी’ लिखी ।

सन्‌ 1875 में प्रिंस ऑव वेल्स (सप्राट एडवर्ड सप्तम) भारत आए | कवि ने “श्री राजकुमार-शुभागमन वर्णन’ द्वारा उनका स्वागत किया। सन्‌ 1877 में हरिश्चंद्र ने ‘प्रानसोपायन’ की रचना की जिसमें राजकुमार के प्रति विनय है ।

यहीं तक नहीं, सन्‌ 1884 में लार्ड रिपन की प्रशंसा में ‘रिपनाष्टक भी लिखा । आज इस भावना को हम बिल्कुल नहीं समझ पाते-ठल्टे विरक्ति होती है, परन्तु भारतेन्दु ने अँगरेजों के शासन को देशवासियों के लिए कल्याणकारी समझ कर ही प्रशंसा के योग्य समझा होगा ।

भारतवर्ष के लिए यदि कोई भी उपकार का काम करता था, तो भारतेन्दु का हृदय ठसके लिए ठमड़ने लगता था। सप्राट एडवर्ड सप्तम के आगमन पर आइ्डाद से पूर्ण कुछ दोहे देखिए-

स्वागत-स्वागत धन्‍य तुम भावी राजबविराज ।

पर सनाया पृूमि यह परसि चरन तठुब आज ॥

साँचहु. भारत में कड़े अचरज सहित अमंद ।

निरखत पच्छिम सों ठदित आज अपूरब बंद ॥

जिमि रघवर आए अवक्धथ, जिमि रजकी सह बंद ।

विमि आगमन कुमार के कासी लहो अनंद ॥

पर-घर में मनु सुत भयों पर-घर में मनु ब्याह।

पर-घर॒ बाढ़ी संपा तुब आग्म नर-नाह ॥

भारतेन्दु हरिश्चंद्र भक्त थे, श्गारी थे, प्रेमी थे, राजभक्त भी, परन्तु उनमें एक प्रवृत्ति और भी प्रमुख रूप से पायी जाती है और वह है देश-भक्ति की ।

अंग्रेजी-शासन का स्वागत उन्होंने इसलिए किया कि वे समझते थे कि मुसलमानी-शासन में हिंदुओं पर जो अत्याचार हुए थे, वे अब बंद हो जायेंगे ।

पर धीरे-धीरे उनका यह भ्रम दूर हुआ और उन्हें पता चला कि अनेक मार्गों से देश का धन विदेश जा रहा है । अत: जीवन के अंत में हल्के ढंग से व्यंग्य द्वारा उन्होंने अँग्रेजी-शासन की निंदा भी की ।

सन्‌ 1882 में अंग्रेजों की मिस्र में विजय पर भारतेन्दु ने ‘विजयिनी-विजय-पताका’ शीर्षक रचना लिखी । इस विजय में भारतीयों का बड़ा सहयोग था ।

आर्य शब्द का उच्चारण ही भारतेन्दु के शरीर को रोमांचित कर जाता था । उनकी द्रष्टि में भीष्म, अर्जुन, भीम, पुरु, रघु, अज, चंद्रगुप्त, पृथ्वीराज, हम्मीर आदि सदैव घूमते रहते थे ।

इस विजय के सुख से वे पुलकित हो उठे और भारत की तत्कालीन हीनावस्था उन्हें खटकने लगी । अतः देश की गरिमा फिर से लौट आये, यह भावना उनकी रचनाओं में कई रूपों में प्रकट हुई है। ‘प्रबोधिनी’ में कृष्ण को संकोधित करते हुए वे कहते है-

सीखत कोठ न कला, उदर भरि जीक्त केक्‍्ल।

एसु समाज सब अन्र खात प्रीजत गंगा जल ॥

धन विदेस चलि जात तऊ जिय होत न चंचल ।

जड़ समान हवे रहते अक्िल हत रच ने सकल कल ।

जीवन विदेस की वस्तु लै गा बिनु कहु नहें कर सकते ।

जागो-जागो अब साँवरे सब कोठ रुख तुमरो तकत ॥

प्रकृति को उद्दीपन के रूप में हरिश्चंद्र ने स्वीकार किया है । प्रकृति का एक उपयोग वह है जहाँ वे राधा-कृष्ण के मिलन में वातावरण के रूप में उसे ग्रहण करते हैं ।

महान्‌ भावज्ञ और विलशण भावमयी की भेंट है, अतः बातारवण एकदम रम्य है । शीतल पवन बह रहा है, सुगंध छायी हुई है और निकुंजों या महल के झरोखों से चाँदनी छनकर आ रही हैं यह वातावरण निश्चित रूप से भाव का उद्दीपक है ।

कहीं-कहीं हरिश्चंद्र ने ऐसी कल्पना की है कि राधा-कृष्ण के सुख-विधान के लिए जो सम्भव है, वह प्रकृति अपनी ओर से करती है । प्रकृति को राधा-कृष्ण के सम्पर्क में ही प्रायः कवि ने देखा है ।

नए वृक्ष हैं, नए पत्ते, नए फूल । वहाँ कुंजों में कोकिल कूक रही है, मयूर नृत्य कर रहे हैं, पपीहा पी-पी पुकार रहा है, पर साथ ही वह राधा-माधव की क्रीड़ाभूमि भी है ।

वर्षा का वर्णन हरिश्जंद्र ने बहुत किया हैं बसंत का भी वर्णन कहीं-कहीं है। पर है वह ठद्दीपनकारी ही । उन्होंने बारहमासे भी कई लिखे ।

काव्य-ग्रंथों के अतरिक्त नाटकों के बीच-बीच में भी प्रकृति-वर्णन के प्रसंग पाए जाते हैं जैसे “सत्य हरिश्जंद्र’ में  गंगा और चंद्रावली’ में यमुना का वर्णन ।

(1)

नव उज्यक्ल जलधार हार हीरक सी सोहत।

कयि गिव छहरत बूंद मध्य मुक्ता मन प्रोहत ॥

लोल लहर लहि प्रव एक पऐ इक इमि आवत ।

जिमि नरगन मन विविध मनोरब करत मिटाक्त ॥

कासी कहाँ प्रिय जानि ललकि भेटयो उठि पाईं।

सपनेहू नहिं. तजी रही अंकनि लफ्टाई ॥

(2)

तरनि-कूजा-तटत तमाल तठकर बहु छाए।

हुके कूल सो जल परसन हित मनहुसुहाए ॥

कियाँ मुकुर में लखत उज्ञलकि सब निज-निज सोभा ।

के अनक्‍त जल जानि परम प्रावत फ़ल लोभा ॥

मनु आतप वारन तीर कौ सिमिटि सबे छाए रहत ।

के हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत ॥

(3)

आजु प्रानप्यरी आननाथ सोॉ मिलन चली।

लखि के प्वस दास साजी है सवारी ॥

तन के पाॉक्रे बिछाय, धन धुनि मंगल सुनाया

दामिनि दमकि आगे करे उजियारी॥

दर तौर राह क्तायत झिल्ली।

बूंद बरसि हरे श्रम सुखकारी॥

(4)

मास असाढ़ उमड़ि आए बदरा ऋतु कक्‍रसा आई।

बोले मोर सोर कह दिसि घन घोर घटा छाई ॥

एफ्रहन प-पी र्ट लाई ।

भयो अरंभ विगोग फ़िरी जब काम की दुहाई ॥

सावन मास युहावन लागे॑ मनभावन नाहीं।

इले॑ काके संग हिंडोरा देकर गलबाही ॥

करसि घन कुंजन के माही

कौन बकावे आए भीनि मोहि रखि अपनी हछाही ॥

(5)

फूलगे फ्लास बन आगि सौ लगाई झूर

 कोकिल  कुडुकि कल सबद युनावेगो,

 व्यौही हरीयंद” सबे॑ गावैगो धमार थीर

 हरन अजबीर बीर सकही . उड़ावैगो,

 सावधान होहु दे वियोगिनी सम्हारि तन

 अतन कनक ही में तएन में तावैगो,

 धीरय नसावन वड़ाकत बिरह काम

 कहर मधावत बसंत अब आवेगी ।

व्यंग्य और हास्य भी हरिश्खंद्र में कम नहीं | प्रसिद्ध है कि राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद फारसी मिश्रित हिंदी के पक्षपाती थे और भारतेन्दु शुद्ध हिंदी के अर्थात्‌ राजासाहब का झ्ुकाव ठर्दू की ओर अधिक था । उर्दू का मजाक उड़ाने के लिए हरिश्थंद्र ने “उर्दू का स्थापा’ लिखा | ठसमें राजा शिवप्रसाद को भी नहीं छोड़ा ।

स्थापे का एक अंश देखिए-

है है उर्दू हाय हाय!

कहाँ सिधारी हाय हाय ॥

मेरी प्यारी हाय हाय ।

मुती  मुल्ला हाय हाय ॥

यचरक- जुबानी हाय हाय ।

शोख- बयानदी हाय हाव ॥

फिर नहिं आनी हाय- हाय ॥

उर्दू में ‘इंदर सभा” एक प्रकार का नाटक है । ठसी के अनुकरण पर भारतेन्दु ने “बन्दर सभा” लिखी जिसका नायक बन्दर और नायिका शुतुरमुर्ग परी है। नाटक छंदबद्ध है और विनोद के ढंग पर लिखा गया है। इसका बहुत थोड़ा अंश प्रकाशित हुआ है । उदाहरण लीजिए- 

सभा में दोस्तों बंदर की आमद आमद है।

गधे औ फूलों के अफसर की आमद आमद है ।

मरे जो बोड़े तो गदहा य॑ बादशाह बना ।

उसी मसीह के पैकर की आमद-आमद है ।

सन्‌ 1877 में हिंदी वद्धिनी सभा’ में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिंदी के संबंध में एक व्याख्यान दिया । उससे उनका भाषा-प्रेम स्पष्ट झलकता है | उनका कहना है कि आप संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी के कितने ही बड़े विद्वान हों, परन्तु अपनी भाषा के ज्ञान के बिना आप किसी काम के नहीं हैं।

स्वयं आपकी पत्नी  और बच्चे आपकी बात नहीं समझ पायेंगे । बच्चा मातृ-भाषा को जिस सहज भाव से अहण करता है, उस सहज भाव से अन्य भाषा को नहीं ।

उसके कोमल हृदय पर  बचपन से जो संस्कार पड़ते हैं, वे अमिट रहते हैं । अतः भारतीय को तो भारत की भाषा ही सहज-गर्भ्य रहेगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक जाति अपनी ही भाषा की पक्षपातिनी है ।

अंग्रेजी में उच्चारण आदि के अनेक प्रकार के दोष हैं, पर अंग्रेजों ने अपनी भाषा को छोड़कर कभी किसी अन्य अधिक पूर्ण भाषा को सहारा नहीं दिया |

वे अनेक देशों के अनेक भाषाओं से ज्ञान का संचय कर अपनी भाषा को समृद्ध बनाने का प्रयल करते रहे हैं। भारतेन्दु प्रश्न करते हैं कि जब अपने समर्थकों की शक्ति से एक अपूर्ण भाषा इतनी व्यापक बन सकती है, तो क्या एक वैज्ञानिक और पूर्ण भाषा उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकती? इस व्याख्यान में

96 दोहे हैं। उनमें से कुछ दोहे लीजिए-

 निज भाषा उन्नति अहै, सब उम्रति को मूल।

‘बिन निज भाषा ज्ञान के मिटन न हिय को सूल ॥

 एड़ो लिखो कोठउ लाख विधि भागा बहुत प्रकार ।

 पै जब ही कु सोचिहौ  निज भाषा अनुसार ॥

 भावा सोधहु आपनी होह सबे॑ एकत्र ।

 पएढ़हु पढ़ावहु लिखहु मिलि छपफ़्वावु कहू पत्र ॥

 काम खिताब किताब सौं अब नहैं सारिहै मीत ।

 तसों उठु सिताबव अब छाँड़े सकल भय भीत ॥

 निज भाषा, निज धरम, तिज मात करम व्यौहार 

 सबे बढ़ावः बेगि मिली  कहत पुकार-पुकार .

भारतेन्दु की अधिकांश कविता ब्रजभाषा में है। उनके पदों में वह लालित्य विद्यमान है जो भक्ति और रीति-काल के कवियों का प्रमुख गुण है ।

भारतेन्दु को थोड़ा-बहुत अन्य भाषाओं का भी ज्ञान था| दर्द में तो वे ‘रसा’ नाम से शायरी करते ही थे, पर उन्होंने बंगला, संस्कृत, पंजाबी, गुजराती और मारवाड़ी में भी कुछ रचनाएँ छोड़ी है। गजलें अधिकतर प्रेम-संबंधी हैं । कहीं-कहीं दार्शनिकता का पुट है । 

यह आशा करना तो व्यर्थ होगा कि भारतेन्दु उर्दू में भी वैसा ही लिखते थे जैसा कोई मुसलमान कवि । रचनाएँ उनकी साधारण है । उन्हें पढ़कर वह स्पष्ट झलकता है कि ये रचनाएं ऐसे व्यक्ति के हाथ की है जिसकी मातृभाषा उर्दू  नहीं । उनकी गजलों में यहाँ-वहाँ हिंदी के दो-चार शब्दों का भी प्रयोग है । 

कहीं-कहीं पूरी पंक्ति ही हिंदी खड़ी बोली में है। कुछ गजलें ऐसी हैं जो वास्तव में खड़ी बोली हिंदी में लिखी गयी है| पर बीच-बीच में उर्दू के शब्द आ गए हैं।

उस भाषा की तुलना आज की भाषा से करना अनुचित होगा । वह एक ऐसी स्थिति है जब खड़ी बोली पैरों पर खड़े होने का प्रयतत कर रही थी । उसमें वह कोमलता, भावभंगिमा और सरसता नहीं, जो आगे चलकर उत्पन्न हुई ।

हरिश्चंद्र को कूट आदि का भी कुछ शौक था । इस प्रकार की उनकी चार- पाँच रचनाएं हैं, जैसे “श्री जीवन जी महाराज’, ‘मूक प्रश्न! ‘फूल बुझौवल’ आदि । इन रचनाओं को शुद्ध काव्य नहीं कहा जा सकता ।

शब्दों का खेल मात्र है इनमें । भाषा हरिश्चंद्र की सरल ही है । मुहावरों का प्रयोग कहीं-कहीं है । छंदों में पदों की प्रचुरता है ।

कवित्त-सवैये भी उन्होंने बहुत-से लिखे | इनके अतिरिक्त कुंडलिया, दोहा, ठुमरी, लाबनी, लोकगीत, ख्याल आदि के प्रयोग हैं । बंगला के “पयार” छंद को भी उन्होंने सफलता से साधा है । 

कृष्ण-चरित का गान भारतेन्दु ने जिस प्रकार मुक्तक पदों में किया है, वैसे ही काव्य-कथा के रूप में भी । इस प्रकार की काव्य-कथाओं में “देवी छन्‍द लीला’ एक सफल कृति है ।

इस काव्य-कथा की यह विशेषता है कि पदों में होने पर भी कथा न कहीं खंडित हुई है और न एक पद की बात दूसरे पद में दुहरायी गयी है । भारतेन्दु की रचनाओं से कुछ और उदाहरण लीजिए-

(1)

ब्रज के लता पता मोहि कीजे ।

गोपी पद प्ंकेक पावन की रज जामे सिर भीजे ॥

आवत जात कुंज की गलियन रूप-सुधा नित पीजे ।

श्री राधे-राथे मुख यह वर हरिअन्द को दीजै ॥

(2)

साँभ सबेरे पंछी सब क्‍या कहते हैं कुछ तेरा है।

हम सब इक दिन उड़ जायेंगे, यह दिन चार सबेरा है ॥

आँधी चलकर इधर-उधर से तुलझ्को यह समझाती है ।

चेत-चेत जिदंगी हवा-सी उड़ी तुम्हारी जाती है ॥

(3)

दिल मेरा ले गया दया करके,

नेवफ़ा हो गया वफ़ा करके |

हिज़ की शव घटा ही दी हमने,

दास्तां जुल्फ़ की बढ़ा करके |

दोस्तों कौन मेरी तुरबत पर,

रो रहा है रसा’ रसा’ करके ।

(4)

मंद मंद आवबैे देखो आत समीरन,

करत सुगंध चारों ओर विकीरन

दिसा प्राची लाल करे, कुमृदी लजाय,

होरी को खिलार सो एवन सुख प्राय

छुअत सीतल सबे॑ होत गात आत,

स्‍्ेही के प्रस सम पवन प्रभात ।

(5)

रंगी में तो रंग तुम्हारे, और रंग जिन डारौ ।

कोऊ बात सो होउँ जो बाहर तौ तुम गारी उचारौ ॥

भारतेन्दु के व्यक्तित्व और काव्य की महत्ता यह है कि प्राचीन को आत्मसात्‌ करके उन्होंने नवीन की सृष्टि की । उनके राधा-कृष्ण सम्बन्धी पदों और प्रेम- सम्बन्धी कवित्त-सवैयों से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि वे भक्ति एवं रीति-काल दोनों युगों के सपने एक साथ देखते थे।

साथ ही राष्ट्रीया, समाज-सुधार और हास्य-व्यंग्य पर लेखनी चलाने के कारण वे नवयुग के जन्मदाता भी सिद्ध हुए। हिंदी-भाषा और साहित्य दोनों के प्रचार के लिए उन्होंने जीवन भर अथक प्रयल किया है । वे भाषा-प्रेमी, भाषा के प्रचारक और भाषा के उन्नायक थे । इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के ठत्ताार्द्ध के भारतेन्दु अकेले महाकवि हैं ।

READ ALSO:

About admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*