Christian mission

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आधुनिक हिंदी का इतिहास
ईसाई मिशन


यदि राजकाज के लिए सरकारी स्तर पर हिन्दी गद्य का निर्माण और प्रसार फोर्ट विलियम कालेज के माध्यम से किया जाने लगा तो ईसाई धर्म के प्रचार के लिए ईसाई मिशनों ने भी हिन्दी गद्य के निर्माण में योग दिया। इस धर्म में धर्म प्रचाः के लिए ईसाई मिशन बरावर आया करते थे। पर बाइबिल के हिन्दी अनुवाद का कार्य कलकत्ते के पास श्रीरामपुर में स्थापित डेनिश मिशन ने शुरू किया। केरे, माशमैन और वार्ड ने सन्‌ १७६६ में इसकी नींव डाली | पर इस त्रयी में केरी की भूमिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थी।

केरे को गिलक्राइस्ट की हिन्दुस्तानी कृत्रिम प्रतीत हुई । अतः धर्म प्रचार की दृष्टि से उसने इसे उपयोगी नहीं समझा। वे यहाँ आने के पहले कामचलाऊ हिन्दी सीख चुके थे। दो मुन्शियों की सहायता से किया गया बाइविल का हिन्दी अनुवाद सन्‌ १८११ में छपा । यह याइबिल का पहला हिन्दी अनुवाद है। सर्वप्रथम केरे ने हिन्दी की प्रकृति को अलग किया। अपने अनुवाद के चौथे संस्करण में उसका कहना है—“हम हिन्दुस्तानी की उस बोली को हिन्दुई या हिन्दी समझते हैं जो मुख्यतः संस्कृत से बनी है और जो मुसलमानों के आने के पूर्व सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में बोली जाती थी। यह अब भी बहुत व्यापक क्षेत्र में समझी जाती है, विशेष कर जन साधारण के मध्य।

केरे के पश्चात्‌ थेम्वरलेन ने भी हिन्दी की अपनी प्रकृति को समझने की कोशिश की! उसने हिन्दी की विभिन्न शैलियों–चलती हिन्दुस्तानी, चलती नागरी, संस्कृतनिष्ठ हिन्दुस्तानी, ग्राम्य शब्द-बहुल हिन्दी को वह हिन्दवी कहता था। मतलब यह कि थधेम्बरलेन ने भी उर्दू को हिन्दी की एक शैली ही माना है। यदि विभिन्न कालों (१८६११, १८१६८, २१, २६, ३४) में किये गए बाइबविल के अनुवादों की भाषा का अध्ययन किया जाय तो उनमें क्रमिक विकास को स्पष्ट देखा जा सकता है —

१–फिर उसने अपने बारह शागिर्दों को पास बुलाया और उन्हीं पलीत रूहों के दूर करने की और हर तरह की बीमारी और हर किसम के आजार से शिफा बख्शने की कुदरत बछ्शी–

२–‘और यिशु ने अपने बारह शिष्यों को बुलाके नापाक भूतों के ऊपर उन्हीं के
छुड़वाने को और हर तरह की बीमारी और हर एक आजार दूर करने की उन्हें कुदरत
किया—

३–‘और अपने बारह शिष्यों को समीप बुलाकर अपवित्र आत्माओं के ऊपर
उन्हीं के छुड़वाने को और सब पीड़ा और सब दुबलाई आछी करने को उन्हीं को अधिकार
दिया—

धीरे-घीरे फोर्ट विलियम कालेज के अधिकारियों की भाँति ईसाई मिशनरियों को , भी स्पष्ट हो गया कि उत्तर भारत की जनभाषा हिन्दी है और उनके अनुवादों में इसी का प्रयोग होने लगा। प्रेस और समाचार पत्र यों प्रेस स्थापना का छिटफुट प्रयास गोवा आदि स्थानों में हुआ किन्तु व्यवस्थित रूप से उसकी शुरुआत कलकत्ते में हुई। चार्ल्स विल्किन्स (१७५०-१८३६) ने नैथेनियल ब्रेसी हालहेड कृत ‘ए ग्रामर आफ बंगाली लैंग्वेज’ के लिए प्रथम बार बंगला टाइप बनाए । विल्किन्स ने हुगली प्रेस के लिए बंगला टाइप के अतिरिक्त नागरी टाइप भी निर्मित किए।

श्रीरामपुर मिशन के केरी पंचानन कर्मकार की सहायता से टाइप फाउण्ड़ी खोली गई। वस्तुतः नागरी टाइपों का जन्मस्थान हुगली और श्रीरामपुर है। श्रीरामपुर में पहले पहल टाइप फाउण्ड्री बनी। यहाँ से ही अन्य स्थानों को टाइप भेजे जाते थे। टाइप उपलब्ध होने से जगह-जगह छापेखानों का छुलना आरम्भ हो गया। छापेखाने के कारण पुस्तकें और समाचार पन्नों के प्रकाशन का द्वार खुल गया।

सन्‌ १७६८० में जे० ए० हिकी ने अंग्रेजी में दि बंगाल गजट’ प्रकाशित किया। गजट भारतीय पत्र जगत्‌ में नया प्रकाश लेकर आया। इसके बाद अंग्रेजी के और भी पत्र प्रकाशित हुए। १८१८ में मार्शमन और केरे ने ‘दिग्दर्शन’ नामक बँगला पत्र प्रकाशित किया |

बह बँगला और अंग्रेजी दोनों में छपता था। हिन्दी में पहला पत्र उदन्त मार्तण्ड है जो ३० मई १८२६ को जुगलकिशोर सुकुल के सम्पादकत्व में प्रकाशित हुआ। इसमें देश विदेश के समाचार, अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानान्तरण की सूचनाएँ, बाजार-भाव आदि रहते थे।

हिन्दी सम्बन्धी दूसरे पत्र के सिलसिले में बंगदूत का नाम लिया जाता है। यह (१८२६) आर० एम० मार्टिन और राजा राममोहन राय द्वारा प्रकाशित किया गया। कहा : जाता है कि यह बेंगला, हिन्दी और फारसी में छप्ता था। पर कलकत्ता रीव्यू के अनुसार यह बंगला और फारसी में छपा करता था। १८२६ में यह सरकारी आदेश से बन्द हो गया।

फिर यह दो रूपों में प्रकाशित हुआ–हिन्दू हेराल्ड (अंग्रेजी) और बंगदूत (बंगला और हिन्दुस्तानी यानी उर्दू) में सेठों के लाभार्थ बाजार भाव बंगला और नागरी दोनों में छपते थे। हिन्दी-पत्रकारिता के क्षेत्र में बंगदूत का कोई स्थान नहीं है। कलकत्ता से मो० नातिरुद्दीन के सम्पादकत्व में ‘जगत दीपक भास्कर’ प्रकाशित हुआ। इसके प्रत्येक पृष्ठ पर पाँच स्तम्भ होते थे–बंगला, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और हिन्दी के स्तम्भ। १८४४ में राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द द्वारा स्थापित और तारामोहन निन्न द्वारा सम्पादित ‘बनारस अखबार’ निकला । यह नागराक्षरों में हिन्दुस्तानी शैली का पत्र था। १८९० में ‘सुधाकर” तारामोहन मित्र के सम्पादकत्व में निकला । यह पहले हिन्दुस्तानी दर्रे का पतन्न था पर बाद में शुद्ध हिन्दी में निकलने लगा।

सन्‌ १६९० से ‘६७ ई० के बीच बहुत से और पत्र भी प्रकाशित हुए—तत्त्वबोधिनी पत्रिका (१६६५), सत्यदीपक (१६६६), लोकमित्र (१८६७) बुद्धि प्रकाश (मुंशी सदासुखलाल के ‘नूछल बाजार” का हिन्दी रूपान्तर) आदि | इन समाचार पत्रों की भाषा परिष्कृत नहीं कही जा सकती । इनमें ब्रजी, अवधी, भोजपुरी के शब्दों का प्रयोग तो है ही, ब्रजी के कई रूप विन्यास भी पाये जाते हैं। किन्तु इनके द्वारा नए-नए शब्दों का व्यवहार होने लगा और खड़ीबोली की श्रीवृद्धि हुई, इसमें कोई सन्देह नहीं।

पाढ़य पुस्तकें

फोर्ट विलियम कालेज ने ही पद्य पुस्तकों की परम्परा की शुरुआत की | लल्लूलाल का प्रेम सागर, सदलमिश्र के ‘रामचरित्र’ और “नासिकेतोपाख्यान’ पद्य पुस्तकें ही थीं। लल्लूलाल की सहायता से मजहर अली द्वारा लिखित ‘बैताल पद्चीची’ और काजिम अली की “सिंहासन बत्तीसी’ ऐसी ही रचनाएँ हैं। प्राइस के समय में ‘हिन्दी एण्ड हिन्दुस्तानी सेलेक्शन्स’ दो खण्डों में प्रकाशित हुआ।
अंग्रेज शासकों ने प्रशासन की सुविधा तथा ईसाई मिशनरियों ने धर्म-प्रचार के लिए अनेक कालेज और स्कूलों की स्थापना की । १६वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में आगरा कालेज “आगरा, नार्मल स्कूल आगरा, दिल्ली कालेज, इन्दौर हिन्दी स्कूल आदि स्थापित हो चुके थे। ईसाई मिशनों ने नगरों में छोटी-छोटी पाठशालाएँ खुलवाई। गांवों में भी पाठशालाएँ खुलने लगीं। फलस्वरूप हिन्दी पाठ्य पुस्तकों की मांग हुई |

शासकों और मिशनों के प्रयास से बहुत-सी टेक्स्ट-बुक सोसाइटियाँ खुलीं। उनमें कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी (१८१७ ई०), मद्रास स्कुल बुक सोसाइटी (१८२८ ई०), आगरा बुक सोसाइटी (१८२०), आगरा स्कूल बुक सोसाइटी (१८३३) और नार्दर्न इण्डियन क्रिश्वियन बुक सोसाइटी आगरा-बनारस (१६४८) प्रमुख हैं। इन पाद्यपुस्तकों में रतनलाल की भूगोल सार, कथासार, भूगोल दर्पण आदि उल्लेखनीय हैं।

कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी के तत्त्वावधान में ‘पुरुष परीच्छा संग्रह’, (१८१३) अनूदित हुआ। ‘मूल सूत्र’ १८२० में उसी सोसाइटी द्वारा प्रकाशित हुआ। इसमें कुछ छात्रोपयोगी कहानियाँ संगृहीत हैं। ऐडम लिखित उपदेश कथा” (१८२४) लघु कहानियों का संग्रह है। १६४० में ‘ज्ञान प्रकाश” आगरा बुक सोसाइटी द्वारा प्रकाशित हुआ। इतिहास, भूगोल आदि विषयों के साथ-साथ “जेनान्तर सार या मेटीरिया मेडिका” (१८२१) हिन्दुस्तानी छापाखाना कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। इस तरह और भी अनेक पुस्तकों का उल्लेख किया जा सकता है। बीवीरोसाहिक के “मूल सूत्र’ की भाषा देखिए–

” छोटी दान्त लड़की की बात | एक छोटी लड़की चार-पाँच बरस की.एक गरम रोटी चीखने को चाहती थी। उसने रोटी वाले को जाते देखा तब रोटी खरीद करने को अपनी माँ से एक पैसा माँगा, मां ने एक पैसा दिया, तब वह दौड़ी और तुरन्त मोल ली। “

” फिर आके दरवाजे के पास उसने एक गरीब औरत देखी जो खाने मोल लेने के वास्‍्ते पैसा माँगती थी क्योंकि वह यहुत भूखी थी। उसने उससे कहा कि मेरे पास कोई पैसा और नहीं, लेकिन हम जाके अपनी मां से पूंछूंगी पैसे के वास्ते तब वह भीतर दीड़ी गई और जल्दी फिर आयी गरीब रंडी से कहा कि मेरी मां के पास और कोई पैसा नहीं लेकिन एक रोटी वहां है तुम्हारे वास्ते और वह गरम भी है लो खाओ और दिलस्युश रहो। हम भी खुश है कि मेरे पास जो था सो भूखी को दिया। “

पाठ्य पुस्तकों की भाषा बाइविल के अनुवादों की भाषा की अपेक्षा साफ-सुथरी है यधपि ब्रजी के स्पर्श से सर्वथा मुक्त नहीं है। शब्द-प्रयोग की अनुपयुक्तता, लिंग-वचन की अनेक भूलें हैं। किन्तु पाठ्य-पुस्तकों के लिए नई शब्दावली भी ढूँढ़ना पड़ा है, नये विषयों करे अनुरूप शब्दों की तलाश करनी पड़ी है। इस तरह भाषा की श्रीवृद्धि में पाठ्य-पुस्तकों का महत्त्वपूर्ण योग है।

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