Hindi outside Fort William College

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आधुनिक हिंदी का इतिहास

फोर्ट विलियम कालेज के बाहर की हिन्दी


प्रशासनिक सुविधा के लिए सन्‌ १८०० में अंग्रेजों ने कलकत्ते में फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना की। इस कालेज में साहित्य और विज्ञान दोनों की शिक्षा का आयोजन किया गया।

साहित्य में एक ओर तो क्लासिकल भाषा-साहित्य–अरबी, फारसी, संस्कृत-की शिक्षा दी जाने लगी और दूसरी ओर देशभाषा–हिन्दुस्तानी, भाख्वा, बँगला, तेलगू, मराठी, तमिल, कन्नड़–आदि में पुस्तकों का लिखा जाना आरंभ हुआ। इसके अतिरिक्त प्रकृति विज्ञान, वनस्पतिशाख्र, रसायनशाखत्र की शिक्षा की भी व्यवस्था हुई।

१८०० ई० में ही गिलक्राइस्ट हिन्दुस्तानी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। हिन्दुस्तानी से उनका मतलब अरबी-फारसी शब्दावली से भरी हुई भाषा से था। गिलक्राइस्ट के शिष्य बेली हिन्दुस्तानी, उर्दू, हिन्दी और रेख्ता को एक ही अर्थ में प्रयुक्त करते थे।

गिलक्राइस्ट ने हिन्दी से अलग हिन्दवी के भारवा मुंशियों की नियुक्ति की। १८२४ में जब कैप्टेन विलियम प्राइस हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष हुए तो उन्होंने गिलक्राइस्ट की भाषा-नीति को बदल दिया, तब उन्होंने उर्दू के स्थान पर हिन्दी को प्रधानता दी और हिन्दी को हिन्दवी के अर्थ में प्रयुक्त किया।

ईसाई मिशनरियों को भी गिलक्राइस्ट की भाषानीति मान्य नहीं हुई। मिशनों ने इस देश की योली हिन्दी को अपनाया। उन्होंने हिन्दुस्तानी (उर्दू) और भाखा (हिन्दी) में पुस्तक तैयार करने की अलग-अलग व्यवस्था की। लल्लूलाल और सदल मिश्र भाखा-मुंशी थे। लल्लूलाल ने ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ लिखा।

फोर्ट विलियम कालेज के इस प्रयास के बारे में अंग्रेजों ने काफी गलतफहमी फैलाई। ग्रियर्सन ऐसे भाषाविद्‌ ने कहा कि यह अंग्रेजों द्वारा आविष्कृत हिन्दी है जिसे गिलक्राइस्ट के तत््यायधान में लल्लूलाल ने ‘प्रेमसागर’ में प्रयुक्त किया। . फ्रेजर ने ग्रियर्सन की वात दुहराते हुए लल्लूलाल के साथ सदल मिश्र का नाम भी भाषा के आविष्कारकों में नोड़ दिया

ग्रियर्सन ने खड़ीयोली को किसी की मातृभाषा नहीं स्वीकार किया। आश्चर्य यह है कि ग्रियर्सन ऐसे भाषाविद्‌ भी भाषा को आविष्कार मानते हैं। ग्रियर्सन का वक्तव्य शरारत से भरा हुआ मालूम होता है क्योंकि यह अत्यन्त सामान्य बात है कि कोई योली ही विकसित होकर भाषा का रूप धारण करती है। यदि खड़ीबोली कोई भाषा न होती ठो फोर्ट विलियम के अधिकारियों को उसमें पुस्तकें लिखाने का इलहाम न होता ?

फोर्ट विलियम कालेज के बाहर खड़ीवोली में जो कुछ लिखा जा रहा था उससे प्रमाणित है कि जन सामान्य की इस बोली के विकास के लिए राज्याश्रय की आवश्यकता नहीं थी।

वास्तविकता तो यह है कि हिन्दी अपनी आन्तरिक क्षमता के आधार पर ही आगे बढ़ी, राज्याश्रय तो इसे मिला ही नहीं। फोर्ट बिलियम कालेज के बाहर जिन दो लेखकों की गद्य रचनाएँ उपलब्ध हुई हैं उनके नाम हैं सदासुख राय निसार और इंशाअल्ला खाँ।

किन्तु मुंशी सदासुखराय (१७४६-१८२४) के ग्रन्थ और रचनाकाल के सम्बन्ध में दिद्वानों में मतभेद है। वे उर्दू-फारसी के अच्छे ज्ञाता और शायर थे। १८१६८ ई० में उन्होंने “मंतखयुत्तवारीख’ लिखी |इससे उनके जीवन का संक्षित्त इतिहास मालूम होता है। शुक्ल जी के मतानुसार ‘मुंशी जी ने विष्णु पुराण के उपदेशातमक प्रसंग लेकर एक पुस्तक लिखी थी, जो पूरी नहीं मिली है।

कुछ दूर तक सफाई के साथ चलने-वाला गद्य जैसा योगवासिष्ठ का था वैसा ही मुंशी जी की इस पुस्तक में दिखाई पड़ा।’ कुछ अन्य लोगों के मत से उन्होंने भागवत का गधघानुवाद किया। डा० लक्ष्मीसागर वार्ष्णय ने उनके अनुवाद का नाम ‘सुखसागर’ बताया है। पर रामदास गौड़ का कहना है कि उन्होंने विष्णु-पुराण का पद्यानुवाद किया था। लाला भगवानदीन और रामदास गौड़ ने “हिन्दी भाषा सार’ पुस्तक का संपादन किया है। उसमें मुंशी सदासुख॒राय का सुरासुरनिर्णय लेख और उसके वार्तिक करा एक अंश संगृहीत है।

संपादकों ने सुरासुरनिर्णय का रचना-काल सं० १८३६-४० (१७८३ ई०) ठहराया है। उन्होंने सुखसागर नाम का कोई ग्रन्थ नहीं लिखा। हिन्दी में उनका उपनाम सुखतागर था और उर्दु-फारसी में निसार। जिस ग्रन्थ के आधार पर शुक्ल जी ने उनकी भाषा के संबंध में यह निष्कर्ष निकाला है वह प्रामाणिक नहीं है। सदासुख नाम के तीन व्यक्तियों का उल्लेख मिलता है–एक “मुंतखवुत्तवारीख’ के लेखक सदासुख॒राय, दूसरे ‘बुद्धिप्रकाश’ समाचारपत्र के संपादक सदासुखलाल, तीसरे जैन सदासुखलाल।

शुक्ल जी ने पहले सदासुख़राय का उल्लेख किया है। उनकी भाषा को शुक्ल जी ने साफ-सुथरी कहा है। शुक्ल जी ने इनके गद्य का जो उदाहरण दिया है वह सुरासुर निर्णय की भाषा के मेल में नहीं है। अतः या तो वह उनकी है ही नहीं या योगवासिष्ठ की भाषा की तरह संशोधित है। सुरासुर निर्णय की
भाषा का नमूना निम्नलिखित है-

“प्रसिद्ध योनि है। | सुरदेवता असुर दैत्य संज्ञा है।। जो कहिये असुर दैत्य हैं। इस बात में दूषण है। कंस दैत्य न था मनुष्य था। श्रीकृष्ण का मामा उग्नसेन का बेटा था। | तो इससे समझिये कि स्वभाव असुर है मनुष्य होय कि अथवा देवता दैत्य होय। | जिसमें तमोगुण विशेष वही असुर है।। कोई क्‍यों न होय। | प्रह्लाद दैत्य था। परन्तु स्वभाव उसका सतोगुणी था।। उसे सुर जाना थाहिए ।। दुर्वासा अह्य ऋषि हैं। स्वभाव तमोगुणी है। । उसे असुर जानना चाहिए। ।”

निश्यय ही इसकी भाषा साफ-सुथरी है। सुरासुर के निर्णय के पीछे एक तकनिमोदित वैचारिक पद्धति भी दिखाई पड़ती है जो निबंध के लिए जरूरी होती है। यदि सुरासुर निर्णय का लेखनकाल १७८३ ई० के लगभग मान लिया जाय तो इसकी भाषा को हिन्दी गद्य परम्परा का प्रारम्भ स्वीकार करने में किसी तरह का संकोच नहीं होना चाहिए।

इन्शाअल्ला खाँ दूसरे लेखक हैं जिन्होंने हिन्दी-गध-निर्माण में विशेष योग दिया है। उन्होंने ‘उदयभानचरित या रानी केतकी’ की कहानी कदाचित्‌ १८०० और १६८०६ के बीच लिखी होगी। वे लललूलाल और सदल मिश्र के समसामयिक थे। पर रानी केतकी की कहानी लाल और मिश्र की रचनाओं से पहले लिखी जा चुकी थी।

इंशा के पूर्वज समरकंद से आकर कश्मीर में बस गए। इसके बाद वे लोग दिल्ली आ बसे। उनके पिता माशाअल्लाह जो मुगल दरबार में हकीम थे, मुगल-साम्राज्य के क्षीण होने पर मुर्शिदाबाद चले आए। इंशा का जन्म यहीं हुआ। इंशा लड़कपन से ही कविता करते थे

मुर्शिदाबाद के नवाब के शक्तिहीन होने पर ये शाह आलम के दरबार में आ गए। शाह आलम के यहाँ भी वे टिक न सके और अवध के नवाब आसफुद्दीला’ सादत अली खाँ के दरबार में जा पहुँचे। पर नवाव से मन-मुटाव हो जाने के कारण वे वहाँ से भी खिसक गए।

सन्‌ १८१६ में उन्होंने अपनी इहलौकिक लीला समाप्त की | रानी केतकी की कहानी लखनऊ में ही लिखी गई। इसके सम्बन्ध में इन्शा ने लिखा है. “एक दिन बैठे यह यात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिन्दी की छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में छिले।

बाहरी की बोली और गैवारी कुछ उसके बीच में न हो। अपने मिलनेवालों में से एक कोई बड़े पढ़े-लिखे पुराने-धुराने डांग बूढ़े घाग यह खटराग लगा लाए–लगे कहने-यह बात होते दिखाई नहीं देती |

हिन्दवीपन भी न निकले और भाषापन भी न हो। बस, भले लोग अच्छों से अच्छे आपस में बोलते-चालते. हैं ज्यों का त्यों वही सब डील रहे औ छाँव किसी की न हो, यही नहीं होने का। “
इससे लगता है कि इन्शा ने किसी पुराने-धुराने डांग-बूढ़े की उन चुनीती को स्वीकार किया था जिसमें कहा गया था कि ठेठ हिन्दवी का प्रयोग सम्भव नहीं है। यहाँ हिन्दी, हिन्दवी, भाषा, वाहरी योली और गँवारी पर विचार कर लेना चाहिए। याहरी बोली का अर्थ है यामिनी भाषा यानी अरबी-फारसी से भरी हिन्दुस्तानी।

भाषा का माने है संस्कृतनिष्ठ पंडिताऊ हिन्दी। गैवारी वह है जो भले लोगों की भाषा न हो। अर्थात्‌ इन्शा ने शिष्जनों की बोलचाल की भाषा में, जिसमें न तो संस्कृत का प्रभाव था, न अरबी-फारसी का, ‘रानी-केतनी की कहानी’ लिखी । चन्द्रबली पांडेय के विचार से–‘रानी केतकी की कहानी उर्दू की खड़ी बोली है और वस्तु हिन्दू तथा मजहव शीया है। इस दृष्टि से देखने पर कबीर, जायसी, कुतुबन, मंझन का कया होगा ? पाण्डेय जी ने इन कवियों पर भी कुछ वैसा ही मन्तव्य व्यक्त किया है।

रानी केतकी की कहानी के कुछ शब्दों और मुहावरों के आधार पर उन्होंने उसमें बाहरी शब्दों को भी खोज निकाला है। किन्तु समग्रतः उसकी भाषा हिन्दी या हिन्दवी है। लल्लूलाल की
भाषा को भी खड़ीवोली और हिन्दवी कहा गया है। यह सही है कि उक्त कहानी मसनवी शैली पर लिखी गई है पर वह सूफी प्रेमाख्यान नहीं है, जैसा कि शोधग्रन्थों में लिखा गया है। हिन्दी के सूफी प्रेमाछ्यानों और “रानी केतकी की कहानी’ में केवल इतना ही अन्तर है कि सूफी काव्य पथ्य में है और यह गद्य में।

किन्तु प्रारम्भिक ईश्वर यंदना, प्रत्येक परिच्छेद के आरम्भ के लम्बे शीर्षक, ईरानी कथानक रुढ़ियाँ आदि इसे सूफी प्रेमाख्यान की कोटि में नहीं रख पातीं। यह केवल प्रेमाख्यान है। इसमें
तसव्वुफ का स्पर्श नहीं है। उसकी भाषा का नमूना देखिए—

“दायरे उसके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल-ढाल का अच्छन वच्छन, उठती हुई कोंपल की कली पहने, जैसे बड़े तड़के धुंधले के हरे भरे पहाड़ों की गोद से सूरत की किरने निकल आती हैं।’

कितनी ताजा और जीवंत भाषा है पर इस प्रकार की भाषा कहीं-कहीं है। सब मिलाकर उसकी. भाषा सर्वत्र हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल नहीं पड़ती। चटक-मटक फारसी के प्रभाव का सूधक है फिर भी प्रारम्भिक गद्य में उसके योग को अस्वीकार नहीं किया जा सकता

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