खड़ीबोली का गय : संघर्ष की कहानी

History Of Modern Hindi | Ancient Form Of Hindi Language

आधुनिक हिंदी का इतिहास

खड़ीबोली का गय : संघर्ष की कहानी


इस देश की प्रान्तीय भाषाओं को पहला धक्का लगा जिसका कारण नवीन शिक्षा का प्रादुभवि था। कम्पनी सरकार ने सन्‌ १८१३ में एक ऐक्ट बनाकर संस्कृत-फारसी की शिक्षा को प्रोत्साहित किया। राजा राममोहन राय इसके विरुद्ध थे; वे आधुनिकता ले आने के लिए पश्चिमी ढंग की शिक्षा आवश्यक समझते थे। राजा साहब ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए डेविड हेयर की सहायता से एक स्कूल की स्थापना की।

सन्‌ १८३० में अलेक्जेंडर डइफ ने उच्च शिक्षा के निमित्त एक कालेज खोला। सन्‌ १८३४ में लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में कम्पनी के डाइरेक्टरों के पास जो परामर्श भेजा उसका परिणाम यह हुआ कि कम्पनी ने शिक्षा-सम्बन्धी पूर्व निश्चित नीति में मौलिक परिवर्तन स्वीकार कर लिया। मैकाले ने सोचा था कि इस शिक्षा से प्रशासकीय कार्य के लिए क्लर्क तो मिलेंगे ही, कालान्तर में भारतीय शिक्षित बर्ग अंग्रेजों की तरह सोचने-विचारने लगेगा और अंग्रेजी राज्य की नींव सर्वदा के लिए दृढ़ हो जायगी। मैकाले का सोचना आंशिक रूप में सच निकला पर राजा राममोहन राय अधिक दूरदर्शी सिद्ध हुए। राष्ट्रीयता के उदय में अंग्रेजी शिक्षा का योग कंम महत्त्वपूर्ण नहीं रहा। किन्तु इससे संस्कृत-फारसी की शिक्षा को धक्का लगा, देशी-भाषाओं का भविष्य खतरे में पड़ गया।


सन्‌ १८३६ में कम्पनी सरकार ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार का प्रस्ताव स्वीकार किया। पर अदालती भाषा के सम्बन्ध में सन्‌ १६३६ में जो इश्तहारनामा निकला उसमें अदालतों में देशी भाषा के प्रयोग का निदेश किया गया। अभी तक हिन्दी प्रदेशों की अदालती भाषा फारसी ही थी, पर जनता की सुविधा तथा अंग्रेजी शासन को दृढ़ बनाने की दृष्टि से अदालतों की भाषा देशी कर दी गई–
‘पच्छांह के सदर बोर्ड के साहयों ने यह ध्यान किया है कि कधहरी के सब काम फारसी जबान में लिखा-पढ़ा होने के कारण सब लोगों को बहुत हर्ज पड़ता है जब कोई अपनी अर्जी अपनी भाषा में लिख के सरकार में दाखिल करने पावे तो बड़ी बात होगी। इसलिए हुक्म दिया गया है कि सन्‌ १८४४ की कुवार बदी प्रथम से जिसका जो मामला सदर बोर्ड में हो सो अपना अपना सवाल हिन्दी की बोली में और फारसी और नागरी अच्छान में लिखने के दाखिल करे कि डाक पर भेजे और सवाल जौन अच्छरन में लिखा हो तीने अच्छरन में और हिन्दी बोली में उसपर हुकुम लिखा जायगा। मिती २€ जुलाई सन्‌ १८३६ ईं०।

पर संप्रदायवादियों ने इस व्यवस्था का घोर विरोध किया। कहना न होगा इसकी भूमिका जान गिलक्राइस्ट ने फोर्ट विलियम कालेज में ही बाँध दी थी –हिन्दी उर्दू को अलग-अलग करके। इश्तहार के साल भर वाद सन्‌ १६८३७ ई० में हिन्दी के स्थान पर उर्दू अदालतों की भाषा घोषित कर दी गईं। यों सन्‌ १८०३ में ही कम्पनी ने ‘तमासी आदमी के युझने के वास्ते” नागरी भाषा और अक्षर में इश्तहार जारी करने की आज्ञा निकाल दी थी। स्पष्ट है कि नागरी भाषा और अक्षर तमामी आदमी (जनसाधारण) की भाषा थी। लेकिन सरकार जानबूझ कर उसकी अवहेलना कर रही थी।

पर सन्‌ १८३६ के बाद प्रभुवर्ग अधिक चतुर हो गया और नई अदालती भाषा के आधार पर हमारी एकता पर गहरा प्रहार किया। आधार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में गार्सा द तासी ने भी फ्रांस में बैठे-यैठे इस झगड़े में योग दिया। बाबू शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने इस कूटनीतिक कार्यवाही को समझा और उन्होंने स्पष्ट कहा–‘दिल्ली के मुसलमान वादशाहों ने भाषा के सम्बन्ध में जो कुछ सोचा भी नहीं था वह अंग्रेजी सरकार अंग्रेजी के साथ-साथ ; फारसी लिपि में उर्दू को, जो एक दूसरी विदेशी भाषा है, लाद रही है। हिन्दी को अन्य भाषाओं–बँगला, मराठी, गुजराती–से अलग करके उसके विकास को वाधित किया जा रहा है–मेरी प्रार्थना है कि फारसी अक्षरों को हटाकर उसके स्थान पर हिन्दी को जारी करना चाहिए।

राजा ने भेदभाव का विरोध करते हुए अतिवादी पंडितों और मुल्लाओं के सम्बन्ध -में लिखा है—गर्ज मीलवी और पंडित दोनों की यह बड़ी भूल है कि तो सिवाय फेल और हरफों के बाकी सब अल्फाज सहीह पांणिनी की टकसाल के खुरखुरे संस्कृत गोया यह हजारों बरस में हम ही लोग हजारों हालतों के बाअस हजारों तबददुल व तगैयत अपनी जबान में करते छले आए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ कहा है कि हमें भाषा में आमफहम और
खासपसन्द शब्दों का चुनाव करना चाहिए ।

अब खड़ीयोली हिन्दी को दो प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ा। एक तो शासक वर्ग ने उसकी उपेक्षा ही नहीं उसका विरोध करना आरम्भ किया, दूसरे उर्दू को राजाश्रय मिलने से उसे एक समानान्तर भाषा का सामना करना पड़ा। मराठी, बैंगला, गुजराती आदि भाषाओं को इस तरह के विरोधों से गुजरने की.-स्थिति ही नहीं आई।

शासक वर्ग ने उसकी उपेक्षा ही नहीं उसका विरोध करना आरम्भ किया, दूसरे उर्दू को राजाश्रय मिलने से उसे एक समानान्तर भाषा का सामना करना पड़ा। मराठी, बैंगला, गुजराती आदि भाषाओं को इस तरह के विरोधों से गुजरने की स्थिति ही नहीं आई।

पर जन-भाषा को सरकारी स्तर पर कुछ काल तक उपेक्षित भले ही कर लिया जाय पर सर्वदा के लिए उसे दबाया नहीं जा सकता। धीरे-धीरे इसने अपने को अपनी आन्तरिक शक्ति के आधार पर, सर्वत्र प्रतिष्ठित कर लिया। पर हिन्दी-उर्दू के जो कृत्रिम झगड़ा अंग्रेजों और सम्प्रदायवादियों की कृपा से उठाया गया वह देश के दो खण्ड हो जाने के वाद ही समाप्त हुआ |

जैसा पहले कड़ा जा चुका है राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द (१८२३-६४ ई०) जनता के हित को देखते हुए सरकार की भाषा विषयक नीति को बदलने की चेष्टा कर रहे थे। वे आम फहम भाषा तथा नागरी लिपि के पक्ष में थे। पीछे कहा जा चुका है कि फारसी लिपि में लिखी उर्दू को अरबी-फारसी बहुल उर्दू को वे विदेशी भाषा मानते थे। परम्परा से विकसित हिन्दी में उन्होंने कई पुस्तकें और निबन्ध आदि लिखे जैसे, मानवधर्म सार, योगवाशिष्ठ के चुने हुए श्लोक, उपनिषद्‌ सार, भूगोल हस्तामलक, वामामनरंजन, राजा भोज का सपना आदि। लेकिन बाद में चलकर उनकी भाषा अरबी-फारसी बहुल हो गई, यद्यपि इसके लिए उन्होंने नागरी लिपि का ही व्यवहार किया। पर उनकी अपनी सीमाएँ थीं, शिक्षा-विभाग की नौकरी करते हुए अंग्रेजों की निर्धारित नीति के सर्वथा विरुद्ध जाना कैसे सम्भव था।

फिर भी उन्होंने जो कुछ किया वह बहुत था। राजा साहब की इस नीति से चिढ़कर हेनरी पिंकाट ने भारतेन्दु बाबू के नाम एक पत्र में लिखा था–.’बीस वर्ष हुए उसने सोचा कि अंग्रेजी साहयों को कैसी-कैसी बातें अच्छी लगती हैं। उन बातों का प्रचलन करना परम चतुर लोगों का धर्म है। इसलिए बड़े धाव से उसने अपनी हिन्दी भाषा को भी बिना लाज छोड़कर उर्दू को प्रचलित करने में बहुत उद्योग किया।’ हेनरी पिंकाट के इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह पत्र १ जनवरी १८८४ ई० को लिखा गया । इसके दो वर्ष पहले ही १८८२ के एजूकेशन कमीशन के सामने अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने नागरी लिपि का प्रबल समर्थन किया था।

उनका कहना था कि नागरी लिपि के प्रचार होने पर मैं शिक्षा संस्थाओं में (नार्थ वेस्टर्न प्राविन्‍्सेत और अवध) बंगाल से अधिक इस वृद्धावस्था में अपनी पेंशन छोड़ने को तैयार हूँ।यह अवश्य है कि वे उर्दू के विरोधी नहीं थे, हाँ फारसी लिपि और विदेशी शब्दावली को स्वीकार करने के लिए वे कभी भी प्रस्तुत न हुए। आज पुनर्विचार करने पर राजा साहब की नीति ही अधिक साधु और विवेकपूर्ण प्रतीत होती है। केवल “इतिहास तिमिरनाशक”’ और बनारस अखबार’ की भाषा के आधार पर, जो फारसी-अरबी प्रंधान है, उनकी कीर्ति पर धूल नहीं डाली जा सकती ।

प्रेमथन राजा साहब की शैली के प्रशंसक थे। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र प्रेमथन से सहमत थे। राम विलास शर्मा का तो यहाँ तक कहना है– ‘१८७३ ई० में हिंदी नई चाल में नहीं ढली। यह कार्य इससे बहुत पहले सम्पन्न हों चुका था। १६५७ के आस-पास राजा शिवप्रसाद जैसी हिन्दी लिख रहे ये उसी को भारतेन्दु ने अपनाया था।’

“इतिहास तिमिरनाशक’ और “बनारस अखबार’ में राजा शिवप्रसाद जिस भाषा– फारसी-अरबी बहुल भाषा—का प्रयोग कर रहे थे उसकी प्रतिक्रिया राजा लक्ष्मण सिंह (१८२६-६६) पर हुई । राजा शिवप्रसाद की भाँति उन्हें भी हिन्दी अंग्रेजी फारसी का अच्छा ज्ञान था। वे भी २० वर्ष तक सरकारी सेवा में रहे। राजा की उपाधि उन्हें भी अंग्रेजी सरकार से ही प्राप्त हुई थी। किंतु हिन्दी के सम्बन्ध में उन्होंने राजा शिवप्रसाद का ठीक विदेधी दृष्टिकोण अपनाया। वे शुद्ध हिन्दी के पक्षपाती थे। उन्होंने १८६२ में अभिज्ञान शाकुन्तल का अनुवाद विशुद्ध हिन्दी में किया। मेघदूत और रघुवंश के अनुवाद भी उन्होंने किए। भाषा के सम्बन्ध में उनकी नीति बिलकुल अलग थी—

“हमारे मत में हिन्दी और उर्दू दो बोली न्यारी-न्यारी हैं। हिन्दी इस देश के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और पारसी पढ़े हुए हिन्दुओं की बोलचाल है। हिन्दी में संस्कृत के पद बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी-फारसी के |” रघुवंश का प्राक्धन |

लेकिन हयूम साहब के साथ एक्ट नं. १० का उल्या करते समय उन्होंने यह अनुभव किया कि जनता में विदेशी भाषा के बहुत से शब्द प्रचलित हैं और इसके आधार पर उन्हें अदालत, गवाह आदि शद्धों को ग्रहण करना पड़ा। इससे दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं; एक तो यह कि इस समय तक हिन्दी-उर्दू अलग-अलग भाषाएँ हो गई थीं, दूसरी यह कि ऐसा होने पर भी अलग्योझा इस सीमा तक नहीं पहुँचा था कि जनता में प्रधथलित विदेशी शब्दों का एकबारगी बहिष्कार कर दिया जाय ।
सरकारी नीति की चिन्ता न करते हुए लोग हिन्दी के विकास में लगे हुए थे। अनुवाद पाद्यग्रन्थ तथा स्वतन्त्र पुस्तक लेखन के साथ-साथ समाचार पत्र भी निकलने लगे। उदन्त मार्तण्ड (१८२६-२८ ई०), समाचार सुधावर्षण (१८४४) आदि से भाषा में निखार आने लगा और लोगों में भाषा की ओर झुकाव भी हुआ।

सन्‌ १८७५ ई० में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की। वेदों को अपीरुषेयता में विश्वास करते हुए भी इस समाज ने हिन्दू धर्म की सनातनी रूढ़ियों को प्रबल धक्का दिया। समाज के प्रचारकों ने देश में धर्म के माध्यम से जिस राजनीतिक-सांस्कृतिक चेतना को प्रवाहित किया समस्त उत्तर भारत पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा। धार्मिक आन्दोलनों में आर्यसमाज ही सरकार का कोप भाजन हुआ। स्वामी जी गुजराती थे लेकिन उन्होंने देश की सर्वाधिक प्रधथलित और व्यापक भाषा को अपने धर्म प्रचार का माध्यम बनाया। स्वामीजी के इस प्रचार के कारण हिन्दी की अभिव्यंजना शक्ति बढ़ी और उसके माध्यम से लोग अपने तर्कपूर्ण बिचारों को व्यक्त करने लगे। पंजाब में प्रधथलित उर्दू को इससे गहरा धक्का लगा।

आर्यसमाज के पहले ही नवीनचन्द्र राय पंजाब में हिन्दी के माध्यम से ब्रह्मधर्म का प्रचार कर रहे थे। उन्होंने फारसी-अरबी मिश्रित उर्दू का घोर विरोध किया। उर्दू पर उस समय तक मजहबी रंग हद तक चढ़ चुका था कि राय को कहना पड़ा – उर्दू के प्रचलित होने से देशवासियों को कोई लाभ न होगा क्योंकि वह भाषा खास मुसलमानों की है। १८६७ में उन्होंने हिन्दी में “ज्ञान प्रकाशिनी पत्रिका’ भी निकाली। इन्हीं दिनों श्रद्धाराम फिल्लीरी अपने प्रवचनों से सनातन धर्म के प्रचार के साथ ही हिन्दी का प्रसार कर रहे थे। बाद में चलकर उन्होंने आर्यसमाज का विरोध किया। वे बहुत ही ठोस संस्कृत-निष्ठ हिन्दी लिखते थे। यह उनके ग्रन्थ ‘सत्यामृत-प्रवाह” से स्पष्ट हो जाता है। सन्‌ १८७३ ई० में उन्होंने “’भाग्यवती’ उपन्यास भी लिखा। इन धार्मिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी का आशातीत प्रसार हुआ, कठिन से कठिन विषयों का विवेचन सरल भाषा में होने लगा।

कहना न होगा कि हिन्दी गद्य के निर्माण में मुख्यतः दो शक्तियों ने सहायता पहुँचाई; पहली शक्ति तत्कालीन ऐतिहासिक आवश्यकता है जो आधुनिकता के कारण प्रयूत हुई थी, दूसरी विविध प्रकार के धार्मिक आन्दोलनों के रूप में प्रकट हुई। सौदागरों और व्यवसायियों के आवागमन से, उनके पारस्परिक विचार-विनिमय से, इस भाषा का, जो बोलचाल में प्रयुक्त हो रही थी, अपने आप विकास हुआ। धार्मिक आन्दोलन-कर्त्ताओं में ईसाई मिशनों ने पहले पहल देशी बोली की पहचान की और धर्मप्रचारार्थ हिन्दी को अपनाया। गुजरात, महाराष्ट्र, बगाल, पंजाब आदि प्रांतों का भेद मन में न लाते हुए। विभिन्न प्रांतों में धार्मिक आन्दोलन-कर्त्ताओं ने हिन्दी को स्वेच्छया अपनाया।

इस तरह एक विशेष प्रकार की राष्ट्रीयता के प्रादर्भाव के साथ-साथ हिन्दी आरम्भ से ही अन्तप्रान्तीय विधार-विनिमय की भाषा बनती जा रही थी। पर भारतेन्दु के उदय के पूर्व हिन्दी गद्य व्यवस्थित न हो सका। नाना प्रकार के धार्मिक ग्रन्थों, उपदेशों, खण्डन-मण्डन पूर्ण परिपत्रों, पादूयग्रन्थों आदि को सही अर्थ में साहित्य के अन्तर्गत नहीं ग्रहण किया जा सकता। राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की रचनाएँ भी इस कोटि में नहीं आ सकतीं क्योंकि वे कभी साफ-सुधरा हिन्दी गद्य लिखते थे तो कभी अरबी-फारसी मिश्रित गध । “राजा भोज का सपना’ निबन्ध के कारण उन्हें साहित्यिक श्रेणी में रखा जाता है, पर वह निबन्ध मौलिक न होकर मिस सी० एम० टकर के एक निबन्ध का अनुवाद है।

“राजा भोज का सपना’ पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर लिखा है–
“राजा भोज का स्वप्ना’ राजाज ड्रीम
थाई
मिस सी० एम० टकर
ट्रांसलेटेड बाई
राजा शिवप्रसाद सती० एस० आई० फार
एच० सी० टकर, स्क्वायर, वी० सी० एस०
पर यह अनुवाद है टक्साली हिन्दी में ।

अन्ततोगल्वा शतादियों से विकसित होती हुई हिन्दी, समय की आवश्यकताओं के अनुरूप, अनेक विरोधी परिस्थितियों से गुजरती हुई, एक शैली का निर्माण करने लगी। पर अभी तक ब्रजभाषा, अवधी, पंडिताऊपन, पंजाबी, गुजराती आदि के प्रभाव से वह अपने को सर्वया मुक्त नहीं कर पाई थी। इसीलिए उसमें एक सर्वसामान्य गद्य शैली की परम्परा नहीं दीख पड़ी जो आगे चलकर भारतेन्दु तथा उनके सहयोगियों द्वारा निर्मित हुई। लेकिन भारतेन्दु मण्डल के लिए भूमि निर्माण का कार्य इसी समय हुआ। इसका ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं आँका जा सकता।

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