Khadiboli Hindi

History of modern Hindi | Khadiboli in North India

आधुनिक हिंदी का इतिहास

उत्तर भारत में खड़ीबोली


दक्खिनी हिन्दी उत्तर भारत की हिन्दी से कुछ इतनी दूर थी कि एक का प्रभावदूसरे पर पड़ ही नहीं सकता था। यहाँ पर दक्खिनी हिन्दी के उल्लेख का मतलब था खड़ीबोली की प्राचीनता दिद्याना और उसके विकास के चरणों को रेखांकित करना। उत्तर भारत में खड़ीबोली अपने ढंग से विकसित हो रही थी। किन्तु आचार्य शुक्ल ने अकबर के समय की एक रचना गंग कवि की ‘चन्द छन्द बरनन की महिमा ” का जो उल्लेख किया है वह अप्रामाणिक है। अतः उसकी भाषा के आधार पर शुक्ल जी का यह निष्कर्ष निकालना कि अकबर और जहाँगीर के समय में ही खड़ीबोली भिन्न प्रदेशों में शिष्ट समाज के व्यवहार की भाषा हो चली थी, उचित नहीं है। बस्तुतः यह जाली ग्रन्थ है। यह पृथ्वीराज रासो को प्रामाणिक सिद्ध करने की दृष्टि से आविष्कृत किया गया। कथावस्तु और ऐतिहा के आधार पर इसकी अप्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है।

अकबरी दरबार का जो वर्णन इसमें आया है वह जादूगर की करामात से कम नहीं है। जिस समय इस ग्रन्थ के अनुसार गंग कवि अकबर को रासो की कथा सुना रहा था उस समय अकबर को नूरबादीन कह कर संबोधित करना ऐतिहासिक असंगति है। नूरूद्दीन जहोंगीर का नाम था, अकवर का नहीं। इसलिए इसकी रचना जहाँगीर के बाद उस समय लोगों को बादशाह की उपाधियाँ भूल गई होंगी। यों इसकी भाषा का जो उदाहरण शुक्ल जी ने दिया है वह १८वीं शताब्दी के पूर्व का नहीं हो सकता |

शुक्ल जी ने रामप्रसाद निरंजनी के “भाषा योगवासिष्ठ, (सं० १७६६८)! को बहुत साफ सुथरी खड़ीबोली में लिखा हुआ बताया है। इसके आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला है–‘इनके ग्रंथ को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि मुंशी सदासुख और लल्लूलाल से ६२ वर्ष पहले खड़ीबोली का गद्य अच्छे परिमार्जित रूप में पुस्तकें आदि लिखने में व्यवह्वत होता था। अब तक पाई गई पुस्तकों में यह योगवासिष्ठ ही सबसे पुराना है जिसमें गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है” किन्तु नई खोजों के फलस्वरूप “भाषा योगवातिष्ठ’ न तो साधु निरंजनी द्वारा लिखा गया और न कथा के रूप में पटियाला नरेश की दो विधवा बहनों को सुनाया गया। योगवासिष्ठ की गुरुमुखी की प्रतियों में रामप्रसाद निरंजनी का नाम भी नहीं आया है।

सति चित अनिद रूप जो आतमा है तिसको नमसकारू है। कैसा है घित आनन्द रूप। आतमा सो कहता है। जिस ते एहु सरन भासते हैं। अरु जिस विषै एहुं सरब लीन होते हैं। अह जिस विष सरव इसधित हैं। इस सति आतमा का नामसकारू है। गियाता, गियान गेयि, प्रिसटा, दरसन, दिस, करता, करण, क्रिया जिसु करि तिन्धु होते हैं। ऐसा जो गिआन रूप जो आतमा है। तिसको नमस्कारू है।
“अगस्तोवाच–है ब्राह्मण। केवल कर्म मोछ का कारण नहीं। अर केवल गिआन ते भी मोछ नहीं प्रापत होता। दोनों करि मोछ की प्रापत होती है। करमांकरण अंतहकरण सुध होता है। मोछ नहीं होती। अर अंतहिकरण सुध होए बिना केवल गिआन ते भी मुक्त नहीं होती। अरथ एहु जो सासत्रहु का तातपरज गिआन निसहा अन्तहकरण सुध होए विना इसथित नहीं होती। तां ते दोनहु कर मोछ की प्राप्त नहीं होती। ‘

(सिक्‍्ख रेफरेंस लाइब्रेरी, अमृतसर में संगहीत योगवासिष्ठ भाषा, प्रतिलिपिकाल सं० १६२३) दोनों उद्धरणों की भाषा का तुलनात्मक अध्ययन सिद्ध करता है कि दूसरे उद्धरण की भाषा प्राचीन और पहले की अर्वाचीन है। अपप्रृंश की उकार बहुला प्रवृत्ति ननसकारू, एहु, जिसु, सासहु आदि में देखी जा सकती है। गुरुमुखी प्रति में शब्द अश्लिष्ट है, ततसम शब्दों के स्थान पर अर्ध तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग हुआ है जैसे, आत्मा के स्थान पर आतमा, स्थित की जगह इसथित, ज्ञान के स्थान पर गियान आदि। गुरुमुखी के वाक्य सामान्यतः एक ही क्रिया पर आश्रित हैं जब कि शुक्ल जी वाले संस्करण के वाक्य लम्बे जटिल जीर कई सहायक क्रियाओं से युक्त हैं।

शुक्ल जी के अवतरण में शब्द रूपों का प्रयोग किसी अव्यभिचारित नियम के अनुकूल नहीं है। कभी तो वहाँ संदेह पैदा होता है तो कभी उसको दूर करने के कारण (लिए नहीं) सुतीक्षण (सुत्तीक्ष्ण ?) प्रणाम करके बैठे और प्रश्न किया जैसे अप्रयुक्त एवं व्याकरण-विरुद्ध प्रयोग मिलते हैं तो कभी जानन हारे समझाय के आदि पूर्वी प्रयोग बिना किसी सामंजस्य और अनुपात के वहाँ भरे गये हैं। इसके विपरीत गुरुमुद्धी प्रतियों के गद्य में शब्दरूपों की अव्यभिचारित एकरूपता, वर्तनी में पर्याप्त समानता, वाक्य-विन्यास में निरपवाद रूप से सरलता और सहजता प्रायः सर्वत्र उपलब्ध है। ”
योगवासिष्ठ भाषा का जो रूप इसमें उपलब्ध है वह आश्चर्यजनक रूप से दक्खिनी हिन्दी से मिलता है। फर्क यह है कि दक्खिनी हिन्दी में अरबी-फारसी शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है किन्तु योगवासिष्ठ भाषा में उनका स्पर्श नहीं हुआ है। इसे खड़ीबोली की दीर्घ परम्परा की अगली कड़ी के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

सन्‌ १७६६ (सं० १८२३) में दौलतराम जैन (बसवाबासी) ने पदमपुराण वचनिका लिखी। यह जैन पद्मपुराण का भाषानुवाद है। इसमें वैराग्यमूलक दृश्यों और कथाओं का चित्रण किया गया है। इसमें जैन पद्धति से रामकथा वर्णित है। भाषा का नमूना है–

“कैसे हैं श्रीराम, लक्ष्मीकर आलिंगित है हृदय जिनका और प्रफुल्लित है। मुखरूपी
कमल जिनका महापुण्याधिकारी है, महावुद्धिमान हैं गुणन के मन्दर उदार हैं चरित्र जिनका,
जिनका चरित्र केवल ज्ञान के ही गम्य है ऐसे जो श्री रामचन्द्र उनका चरित्र श्री गदाधर देव
ही किंचित्‌मात्र कहने को समर्थ हैं।” ….(प्रथम पर्व पृ० ६)।

गुरुमुली योगवासिष्ठ भाषा की तरह इसमें भी ‘कैसे हैं अमुक’ की .पद्धति अपनाई गई है। इसके बाद विशेष्य के अनेक विशेषण दिए गए हैं। जैसे, ‘लक्ष्मीकर आलिंगित है हृदय जिनका रूपकों का स्पष्टीकरण दोनों में ‘छूपी’ शब्द द्वारा किया गया है। योगवासिष् भाषा पर पंजाबी का प्रभाव है और पद्मपुराण बचनिका पर राजस्थानी और बद्रजी का। फिर भी दोनों के वाक्य-विन्यास में पर्याप्र एकरूपता है | ‘

गुरुमुखी योगवासिष्ठ की भाषा भी १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की है। आचार्य शुक्ल द्वारा उदाहरित भाषा योगवासिष्ठ क्री भाषा उस समय की नहीं हो सकती। यह १६वीं शताददी के उत्तरार्ध की भाषा प्रतीत होती है|

खड़ीबोली के विकास के सिलसिले में ईसवी खाँ की बिहारी सतसई रसचंद्रिका टीका (सं० १८०६) १७५२ ई० का उल्लेख किया जाता है। किन्तु उस टीका पर बव्रिजी का इतना अधिक प्रभाव है कि खड़ीवोली की विकास-परम्परा में उसका कोई योग नहीं माना जा सकता। यही हाल साधु मुकुंददास की पद कवीरदास जी का अर॒थ सहित टीका का भी समझना चाहिए !

हिन्दी न तो विदेशी मुसलमानों के आगमन के कारण पैदा हुई और न तो, जैसा गिलक्राइस्ट कहता है, फोर्ट विलियम के टकसाल में ही ढाली गई। यह स्वयं ऐतिहासिक आवश्यकताओं के फलस्वरूप विकसित होती हुई आधुनिक युग के भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम यनी। ऊपर जिस योगवासिष्ठ भाषा, पद्मपुराण की भाषा का उल्लेख किया गया है वह १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की सामान्य खड़ीवोली प्रतीत होती है।

दक्खिनी हिन्दी की शैली भी उनसे मिलती-जुलती है। ज्यों-ज्यों खड़ीबोली विकसित होती गई उसमें से अरबी-फारसी की शब्दावली और पंजाबी, राजस्थानी और ब्रजभाषा का प्रभाव कम होता गया। फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना के समय तक अंग्रेजों ने फारसी-अरबी शब्दावली से लदी हुई दरबारी भाषा को (हिन्दुस्तानी) हिन्दी से अलग समझ कर भाखा मुंशियों की नियुक्ति की।

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