Jai Shankar Prasad Biography

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर ‘प्रसाद’ का जन्म सन्‌ 1889 में काशी के सराय गोवर्द्धन मोहल्ले में हुआ । जाति के ये वैश्य थे। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद और पितामह का शिवरतन था । दोनों तमाखू, सुर्ती और सुंघनी के प्रसिद्ध विक्रेता थे और बड़े व्यापारी होने के कारण ‘सुंघनी साहु’ कहलाते थे । ये लोग शिव के उपासक थे । 


प्रसाद जी ने काशी के क्वींस कालेज में सातवीं कक्षा तक शिक्षा पायी । इसके उपरांत इन्होंने पढ़ना छोड़ दिया और घर पर ही हिंदी, उर्दू, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे । जब ये बारहवें वर्ष में पहुँचे तब पिता का, जब पन्द्रह वर्ष के थे तब माता का तथा जब सत्रह वर्ष के हुए तब इनके बड़े भाई का देहान्त हो गया । 


इन आधातों को सहकर ‘प्रसाद’ ने दुकान और गृहस्थी दोनों को संभाला । इनके चाया और भाई शम्भूरतन के बीच काफी दिन मुकदमेबाजी चली, जिसके फलस्वरूप न केवल प्राचीन वैभव नष्ट हो गया, वरन ऋण भी सिर पर चढ़ गया | 


प्रसाद ने अपने अध्यवसाय से इस कर्ज को चुकाया | अपने जीवन में इन्होने दीन विवाह किए । इनके पुत्र का नाम रलशंकर है ।

प्रारंभ में प्रसाद जी अपने बड़े भाई से छिपाकर कविताएं लिखा करते थे | यह बात बहुत दिनों तक छिपी न रह सकी । इनकी पहली रचना 9 वर्ष की अवस्था की बतलायी जाती है।


पहले ये कलाधार नाम से लिखते थे । बाद में ‘प्रसाद’ कपबाम का प्रयोग करने लगे । दोनों ठपनामों से इनकी ब्रजभाषा की कविताएं पायी

जाती हैं ।

बचपन में अपने परिवार के साथ इन्होंने अनेक स्थानों का भ्रमण किया । सन्‌ 1931 में पुरी के समुद्र तट के दर्शन किए । वैसे बाहर जाने के ये कम अभ्यासी थे । नौका-विहार, संगीत और इत्र के ये विशेष प्रेमी थे ।

प्रसाद जी गम्भीर स्वभाव के सहृदय और संकोचशील व्यक्ति थे । वैदिक धर्म में उनकी दृढ़ आस्था थी । शैव होते हुए भी बुद्ध की करुणा-भावना से वे प्रभावित रहे । उपनिषदों के गंभीर अध्येता होने के साथ इतिहास तथा पुरावत्व में उनकी विशेष रुचि थी ।

उनकी प्रेरणा से उनके भानजे अम्बिकाप्रसाद ने ‘इंदु” मासिक पत्र निकाला, जिसमें प्रसाद जी की रचनाएँ प्रकाशित होती रहती थीं। अपने इस पत्र के अतिरिक्त प्रेमचन्द्र जी के ‘हंस” और “जागरण’ से भी ये कभी-कभी लिखा करते।

प्रसाद के पिता काव्य के प्रेमी थे और उनके यहाँ विद्वानों, कवियों औरसहृदय व्यक्तियों का समागम होता रहता था । इस परिवेश का प्रभाव प्रसाद पर पड़ा होगा। प्रारंभ में इन्होंने श्रजभाषा में लिखा ।


ऐसी रचनाओं का संकलन “’चित्राधार’ में पाया जाता है। आगे चलकर इन्होंने खड़ी बोली को अपनाया और जीवन भर उसकी संवर्द्धना में लगे रहे । घर के सामने ही नारियल बाजार वाली उनकी दूकान के सामने लोग उनसे मिलने के लिए आते रहते थे और वे किसी को भी निराश नहीं करते थे ।


प्रातःकाल वे बेनियाबाग तक टहलने जाते थे । प्रेमचन्द जी से यहीं उनकी भेंट होती थी | मैथिलीशरण गुप्द तथा निराला से परिचित होने के अतिरिक्त रायकृष्णदास तथा डॉ० मोतीचंद्र से उनकी काफी घनिष्ठता थी । इनके अतिरिक्त विनोदशंकर व्यास और वाचस्पति पाठक भी उनके विशेष स्नेह-भाजन रहे |

जीवन के अंत में राय-यश्मा से कुछ दिन पीड़ित रहकर सन्‌ 1937 में उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया । केवल 48 वर्ष की अवस्था में उन्होंने 27 ग्रन्थों का प्रणयन किया-जिनमें काव्य, नाटक, उपन्यास कहानी-संग्रह और निबन्ध सभी सम्मिलित है ।

सन्‌ 1913 और 36 के बीच उनके 9 काव्य-प्रन्थ प्रकाशित हुए-

  • करुणालय (1913), 
  • प्रेमन-पथिक (1914), 
  • महाराणा का महत्व (1914), 
  • चित्राधार (1918), 
  • कानन-कुसुम (1918), 
  • आँसू (1925), 
  • झरना (1927), 
  • लहर (1935) और 
  • कामायनी (1936) ।

प्रसाद जी ने जिस समय लिखना प्रारंभ किया, उस समय तक पिछले कई युगों का प्रभाव बना हुआ था । प्रारंभ में उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चंद्र की भाँति पदों की रचना की, ‘रत्नाकार’ की भाँति कवित्त सवैयों में लिखा, मैबिलीशरण गुप्त की भाँति पौराणिक आख्यान लिए ।


पुराने विषयों, पुराने छंदों का यह प्रयोग बीस वर्ष की अवस्था तक चलता रहा । धीरे-धीरे उन्होंने अपने को इन प्रभावों से मुक्त किया और भाव, भाषा एवं अभिव्यक्ति के ऐसे नए प्रयोग प्रारम्भ किए जिससे हिंदी में एक नए युग का समारंभ हुआ । अध्ययन की सुविधा के लिए उनके काय्य को

इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है-

  • काव्य रूपफक _– करुणालय ।
  • काव्य-कथाएँ — .चित्राधार तथा अन्य ग्रन्थों में संकलित रचनाएँ ।
  • गीत-काव्य — कानन-कुसुम, झरना, लहर ।
  • खंड-काव्य — प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, आँसू ।
  • महाकाव्य —  कामायनी ।

करुणालय की कथा वैदिक-काल से सम्बन्ध रखती है। महाराज हरिश्चंद्र ने, प्रण किया था कि यज्ञ में वे अपने पुत्र की बलि देंगे, परन्तु ठसके बड़े होने पर ममता के कारण वे अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण न कर सके ।


एक बार नौका-विहार करते समय वरुण की अप्रसनता से उनकी नाज का चलता रुक जाता है | इस पर जे अपनी भूल स्वीकार करते हैं और घर लौटकर अपनी प्रतिज्ञा पालन करने का बचन देते हैं ।


रोहित को यह स्वीकार नहीं कि कोई उसके प्राण ले सके । अत: वह निश्चय करता है कि वह जीवित रहेगा । एक दूसरे स्थान पर अजीगर्त नाम का एक ऋषि अपनी पत्नी तारिणी के साथ इस बात पर दुःख मना रहा है कि अकाल के कारण उन दोनों के प्राण बचने का कोई उपाय नहीं ।


रोहित प्रकट होकर यह प्रस्ताव सामने रखता है कि यदि वे अपने एक पुत्र को बलि के लिए उसके हाथ बेच दे, तो वह बदले में सौ गायें देगा । इस पर वे दोनों अपने मझले पुत्र शुनशेफ को, जिसके प्रति पिता का व्यवहार सदा से क्रूर रहा है, बेच देते हैं।

यज्ञभूमि में वशिष्ट अपने पुत्र शक्ति को यूप से बंधे शुनशेफ की बलि चढ़ाने की आज्ञा देते हैं, पर शक्ति इसे अत्यन्त क्रूर कर्म समझकर फेंक देता है । ठसी समय विश्वामित्र प्रवेश करते हैं और हरिश्यंद्र तथा वशिष्ठ के कर्म की निंदा करते हुए अजीगर्त को भी फटकारते हैं जो सौ गायों के और मिलने पर अपने हाथ से अपने पुत्र की हत्या को उद्यत हो गया था ।

इसी कांड के बीच महाराज हरिश्चंद्र की एक दासी प्रवेश करती है कि विश्वामित्र से उसका कभी पति-पत्नी का संबंध रहा था और यह शुनाःशेफ उन दोनों की संतान है। विश्वामित्र लज्जित होते हुए इस बात को स्वीकार करते हैं और महाराज से प्रार्थना करते हैं कि वे सुग्रता को दासीपन से मुक्त कर दें जिससे वे उसे चिरसंगिनी के रूप में ग्रहण कर सकें ।


हरिश्चंद्र इस प्रार्था को स्वीकार करते हैं। शुनशेफ का बंधन खोला जाता है और अंत में सारा दृश्य आनन्द में परिवर्तित हो जाता है । इस गोति-नाटय में प्रसाद ने बड़े ही कौशल से याज्ञिक क्रियाओं की क्रूरता को गर्हित ठहराया है और हमारे हृदय में करुणा जगाकर यह चेतावनी दी है कि मनुष्य का वास्तविक धर्म मानवता है । करुणालय मात्रिक छंद में है ।

इसमें विराम अनेक स्थानों पर वाक्य के अंत में न आकर बीच में आते हैं। कथानक में गति, रोचकता और सजीयता है । भाषा इसकी सरत्न है ।

काव्य-कथा एक वर्णनात्मक लंबी कविता मात्र होती है । प्रसाद की कृतियों में निम्नलिखित काव्य-कथाएं पायी जाती है-

चित्राधार–अयोध्या का उद्धार, वन-मिलन, प्रेम-राज्य ।

कानन-कुसुम–चित्रकूट, भरत, शिल्प-सौंदर्य, कुरुक्षेत्र, वीर-बालक, श्रीकृष्ण

जयन्ती ।

लहर–अशोक की चिंता, शेरसिंह का शख-समर्पण, पेशीला की प्रतिध्वनि

और प्रलय की छाया ।

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