मैथिलीशरण गुप्त

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मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन्‌ 1886 में चिरगाँव जिला झाँसी में हुआ । जाति के ये वैश्य हैं। इनके पिता सेठ रामचरण जी कविता के बड़े प्रेमी थे और “कनकलता’ नाम से छंद-रचना करते थे । सेठ जी के पाँच पुत्र हुए-महरामदास, रामकिशोर, मैधिलीशरण, सियारामशरण और चारुशीलाशरण । इनमें मैथिलीशरण और सियारामशरण को काव्य के क्षेत्र में प्रसद्धि मिली ।

मैथिलीशरण जी ने कुछ दिन गाँव के स्कूल में शिक्षा पायी, फिर घर पर ही हिंदी, संस्कृत, बंगला, मराठी और अंग्रेजी का अभ्यास किया । इन्होंने संस्कृत से वासवदत्ता, बंगला से मेघनाद-वध और फारसी से उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद किया है ।

काव्य के संस्कार तो गुप्त जी में जन्म-जात थे, पर सृजन के लिए विशेष प्रेरणा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिली | सन्‌ 1906 से ही इनकी रचनाएँ “सरस्वती” में प्रकाशित होने लगी थीं। “रंग में भंग” इनका प्रथम काव्य-ग्रंथ है जो सन्‌ 1909 में प्रकाशित हुआ । प्रारंभ में मुंशी अजमेरी से, जिन्हें ये अपने भाई के समान मानते थे, इन्हें बहुत प्रोत्साहन मिला । 

द्विवेदी जी को तो गुप्त जी ने अपना काव्य-गुरु ही स्वीकार किया है, अजमेरी जी के प्रति भी अपनी कृतज्ञता ‘साकेत’ के “निवेदन’ में व्यक्त की है । उनकी मृत्यु पर ‘समाधि’ शीर्षक से एक कविता भी इन्होंने लिखी, जो “ठच्छवास’ नामक काव्य-संग्रह में संकलित है ।

गुप्त जी को अपने जीवन में बहुत यश और सम्मान मिला है। जैसे लोग माखनलाल चतुर्वेदी को दादा और अमृतलाल नागर को बंधु कहते हैं, वैसे ही मैथिलीशरण जी को दद्दा । सन्‌ 1936 में “साकेत’ महाकाव्य पर इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ । पचासवें वर्ष की समाप्ति पर काशी में बड़े धूमधाम से इनकी जयंती मनायी गयी । 

सत्तर वर्ष पूरे होने पर इन्हें अभिनन्दन-प्रव्थ भेंट किया गया । ‘पद्म भूषण” उपाधि से ये विभूषित हैं। और भारतीय संसद के सदस्य रहे हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष में ये ‘राष्ट्रटकवि’ के नाम से विख्यात हैं मैथिलीशरण हृदय से भक्त हैं और स्वभाव से उदार, विनप्र और मिलनसार । ये बड़े दूरदर्शी और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। साहित्य-साधना के पवित्र कर्म में ये अविराम गति से रत रहे हैं। 

अपने जीवन के आदर्श इन्होंने राम, बुद्ध और गाँधी से ग्रहण किए हैं । उपयुक्त समय पर अपनी आत्मा की आवाज को इन्होंने कभी नहीं दबाया । अंग्रेजी के पक्ष में विधेयक (1963) प्रस्तुत होने पर राज्य-सभा में “लो’ अंग्रेजी बनी रही, शीर्षक से निर्भय होकर इनका पढ़ना, एक ऐतिहासिक घटना है । मैधिलीशरण जी एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन पर हम सभी दृष्टियों से गर्व कर सकते हैं ।

कवि होने के साथ गुप्त जी प्रकाशक भी हैं। दोनों भाइयों के समस्त ग्रन्थ उनकी प्रकाशन संस्था ‘साहित्य-सदन’ से प्रकाशित हुए हैं । हे इस समय तक उनके चालीस से ऊपर निम्नलिखित ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।

  • साकेत (1931), 
  • जयभारत (1952) ।
  • यशोधरा (1932), 
  • कुणाल-गीत, 
  • द्वापर, 
  • सिद्धराज, 
  • विष्णु-प्रिया ।
  • जयद्रथ-वध (1910), 
  • पंचवटी (1925), 
  • नहुष ।
  • वन-वैभव, 
  • वक-संहार, 
  • सैरंध्री ।
  • मंगल-घट, 
  • झंकार, 
  • उच्छवास ।
  • अर्जन और विसर्जन, 
  • काबा और कर्बला, 
  • अंजलि और अर्ध्य ।
  • भारत- भारती (1912), 
  • स्वदेश-संगीत, 
  • वैतालिक, 
  • शक्ति, 
  • गुरुकुल, 
  • हिन्दू ।
  • रंग में भंग, 
  • विकट भट, 
  • पद्म-प्रबन्ध, 
  • पत्रावली, 
  • शकुन्तला, 
  • हिडिम्बा ।
  • विश्व वेदना, 
  • किसान, 
  • पृथ्वीपुत्र, 
  • राजा-प्रजा, 
  • अजित ।
  • तिलोत्तमा, 
  • चंद्रहास, 
  • अनध, 
  • लीला ।
  • स्वप्न वासवदत्ता, 
  • मेघनाथ-वध, 
  • वृष-संहार, 
  • वीरांगना, 
  • विरहिणी-म्रजांगता, 
  • उमर खैयाम की रुबाइयाँ ।

गुप्त जी के काव्य-ग्रंथों से ऐसा आभास मिलता है कि ये भगवान राम के अनन्य उपासक हैं । ‘साकेत’ में तो राम का स्तवन है ही, पर जो ग्रंथ कृष्ण के चरित्र या महाभारत की घटनाओं से सम्बन्धित हैं, वहाँ भी मंगलाचरण में राम ही की वंदना है जैसे-

संचित किए रक्खे हुए,

ह शुक-वृत्द के चक्खे हुए,

कुछ फ़ल कि जो थे दीन शबरी ने दिए,

खाकर जिन्होंने प्रीति से,

शुभ मुक्ति दा भव-भात स,

वे  राम  रेचक  हो . धनुर्धरं  किये

इससे ऐसी धारणा बन सकती है कि ये हृदय से कट्टर धार्मिक होंगे, परन्तु मैथिलीशरण गुप्त की विशेषता ही यह है कि उन जैसा उदार और विशाल हृदय व्यक्ति कठिनाई से दिखायी देगा। 


जिस लेखनी ने ‘पंचवटी’ और ‘साकेत’ का निर्माण किया, उसी ने बौद्धों की करुणा का उद्घोष करने के लिए ‘अनध’, “यशोधरा’ और “कुणाल गीत” की रचना की, ठसी ने सिक्‍्खों की शक्ति का परिचय देने के लिए “गुरुकूल’ की गाथा गायी और उसी ने मुसलमानों के चरित्र की महानता और सहनशीलता को अंकित करने के लिए इृदय को हिलाने वाली “कर्बला’ की कहानी हमें सुनायी । 

हिंदू होकर भी गुप्त जी सभी धर्मवालों के अपने हैं। विश्व-वेदना’ की रचना उन्होने जाति, धर्म और राष्ट्रीय-भावना से ऊपर उठकर किक ुत् त्व का गीत गाने के लिए ही की है । वे तो सारे संसार को एक परिवार समझते ई ।

गुप्त जी हमारे देश और युग के प्रतिनिधि कवि हैं । हमारा देश अखंड है और उस अखंडता की भावना मैथिलीशरण गुप्त ने दी है । जब तक सारे देश की राष्ट्र- प्रेम के आधार पर एक सूृत्र में बांधने का प्रयत्न कोई न करे, तब तक उसे राष्ट्र-कवि कहलाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकता । गुप्त जी ने एक राष्ट्र की भावना अपनी रचनाओं द्वारा हमें दी है और इसी से भारतवर्ष में वे राष्ट्र-कवि के नाम से विख्यात है । 15 अगस्त 1947 को देश में जब स्वतंत्रता के सूर्य का उदय हुआ, तो राष्ट्र पताका की वंदना में 


उन्होंने लिखा-

यह पुण्य प्ताका फ़हरे ।

मुक्त वायु-मंडल में अपनी मानस-लहरी लहहरे,

इस ध्वज पर जूझे स्वजनों पर ध्यान जहाँ जाता है ।

मस्तक ऊँचा होने पर भी, मन भर – भर आता हैं,

निर्भव मृत्यु वकरण कर ही नर अमर कॉर्ति प्राता है,

ऐसे पुत्रों की ही आशा रखती भू – माता है,

भू – माता का यह अंचल – पट छाया करके छहरे ।

 यह पृण्य पताका फ़हरे

गुप्त जी के राजनीतिक विचार बन वैभव” “वक संहार’, ‘पंचवटी’, ‘भारत भारती’, ‘मंगल घट’, अनध’, साकेत’ और सबसे अधिक उनके ‘स्वदेश संगीत’ में बिखरे पड़े हैं। यदि संक्षेप में कहना चाहें तो राजनीति में मैथिलीशरण गुप्त ने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का प्रचार किया है । हिंदी में प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त गांधीवाद के दो प्रबल समर्थक रहे है-जैसे साहित्य में ये उनके दाहिने-बायें हाथ हों | 

सन्‌ 1921 से 1947 तक महात्मा गांधी के नेतृत्व में काँग्रेस जिस मार्ग से गयी है, उन समस्त आंदोलनों की ध्वनि गुप्त जी के काव्य में पायी जाती है । उनके ‘अनध’ में ‘मघ’ तो महात्मा गांधी की ही प्रतिमूर्ति है। वहाँ धरना देना, मद्य-पान को रोकना, अहिंसा से काम लेना, अछूतोद्धार करना, गाँवों की ओर लौटना, अपराधी से घृणा न करके उसे क्षमा करना, सब कुछ पाया जाता है ।

महात्मा गांधी के स्वर में मघ कहता है-

न तन सेवा, न मन सेवा,

न जीवन और धन सेवा,

. मुझ्ले है झट कन-सेवा,

सदा सच्ची. भुकन-सेवा ।

मैथिलीशरण गुप्त ने एक दर्जन सफल प्रबंध-काव्य हमें दिए हैं। उनके “जयभारत’ और ‘साकेत’ दोनों हिंदी के महाकाव्यों की परम्परा में बहुत ऊँचा स्थान रखते हैं। 

“यशोधरा’ भी उनकी बड़ी ही लोक-प्रिय रचना है। ऐसी ही मार्मिक कृतियाँ “विष्णुप्रिया’ और ‘रलावली” है | उनके खंड-काव्यों में ‘जयद्रथ-व्ध’, ‘पंचवटी’ और “नहुष’ की गणना सफल कृतियों में होगी । इन काव्य-प्रंथों में सैकड़ों ही ऐसे मार्मिक स्थल हैं, जहां पाठकों का हृदय बार-बार अभिभूत होता है । एक प्रसंग लीजिए-

सो, अपने चंचलपन, सो।

सो, मेरे अंचल थन, सो।

पुष्कः सोता है निज सर में,

प्रम॑ सो रहा है पुष्कर में,

गुंजज सोया कभी प्रमर में,

सो, मेरे गृह-गृंजज सो।

सो, मेरे अंचल-धन, सो।

रहे मंद ही दीपक-माला,

तुझे कौन भय-कष्ट-कसाला?

जाग रही है मेरी ज्वाला,

सो, मेरे आश्वासन, सो।

सों, मेरे अंचल-बन, सो।

तेरी साँसों का सुस्पंदन,

मेरे तल हृदय का चंदन,

सो, में कर लूँ जी भर कंदन,

सो, उनके कुल-नंदन, सो।

सो, मेरे अंचल-धन, सो।

-यशोधरा

बहुत पहले श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने “काव्येर उपेक्षिता’ नाम से एक लेख लिखा था जिसमें भारतीय कवियों द्वारा काव्य की कुछ उपेक्षिताओं के प्रति सहृदयों का ध्यान आकृष्ट किया गया था। इनमें से एक को विचार का केन्द्र बनाकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने एक दूसरा लेख लिखा जिसका शीर्षक था.“कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता ।” 

ऐसा प्रसिद्ध है कि ‘साकेत’ के निर्माण के मूल में इस लेख का बहुत बड़ा हाथ है । इस प्रबंध-काव्य की गणना खड़ी बोली के तीन महाकाव्यों-कामायनी, प्रिय प्रवास, साकेत-में होती है. साहित्यदर्पणकार के अनुसार साकेत में महाकाव्य के बहुत से लक्षणों की पूर्ति हुई है । प्रारंभ में गणेश को लेकर मंगलाचरण है और सरस्वती को लेकर वंदना । 

कथा लोक-प्रसिद्ध नायक की है जो सद्धंशजात क्षत्रिय है। आठ के स्थान पर बारह सर्ग हैं। नवम सर्ग को छोड़कर प्रत्येक सर्ग में एक ही छंद का प्रयोग है और सर्ग के अन्त में छंद बदल जाता है । प्रधान रस श्रृंगार (विप्रलंभ) है । वीर, करुण आदि आए हैं पर गौण रूप से | धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में से धर्म की सिद्धि होती है । 

वर्णनों में नगर (साकेत), प्रेम, यात्रा, प्रभात, संध्या, रजनी, सरिता (सरयू और गंगा), पर्वत (चित्रकूट), बट्‌ ऋतुओं, मृगया, वन, रण-सज्जा, युद्ध आदि के वर्णन हैं। इनके अतिरिक्त, कला, देश-प्रेम, पति-पत्नी-संबंध, भौतिकवाद, राजा-प्रजा के संबंध, उपयोगितावाद वथा नारी की महत्ता आदि पर भी व्याख्यान है। प्रबंधवद्ध कथानक, चरित्र-चित्रण, दृश्य वर्ण और रस, चारों दृष्टियों से यह महाकाव्य करीब-करीब खरा उतरता है ।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि प्रबंध-काव्य की दृष्टि से लक्ष्मण- उर्मिला साकेत के नायक-नायिका नहीं हैं। नायक-नायिका हैं राम और सीता । सामान्य दृष्टि से उर्मिला प्रारंभ, मध्य और अंत में सभी कहीं दिखाई देती है और उसने इस काव्य-प्रंथ के बहुत पृष्ठ घेरे हैं, पर उसे केवल मुख्य पात्री का पद उसी प्रकार दिया जा सकता है जैसे प्रसाद के चंद्रगुप्त नाटक में चाणक्य को | 

महाकाव्य में एक “कार्य’ होता है | साकेत का कार्य “उर्मिला का विरह-वर्णन” नहीं है, “आर्य सभ्यता की प्रतिष्ठा’ है । असंटिग्ध शब्दों में मैथिलीशरण जी ने अपने इस दृष्टिकोण को व्यक्त किया है | संदेह न रह जाय, अतः बार-बार इस बात को स्पष्ट करते चले हैं। राम को वन भेजते समय जब दशरथ विह्ल होते हैं, तब वे विपद्‌-भंजन कहते है-

मुझे था आप ही बाहर विचरना,

घरा का धर्म-भय था दूर करना ।

साकेत से विदा होते समय गुरु वशिष्ठ भी इसका स्मरण दिलाते हैं-

हरो भूमि का भार भाग्य से ल्य तुम,

करो आर्य सम कन्‍यचरों को सभ्य तुम ।

चित्रकूट-प्रसंग में यह उद्देश्य और भी स्पष्ट हो गया है । राम और सीता के वार्तालाप का मुख्य विषय यही है । रावण की बर्बरता से दबी यज्ञ-प्रथा को फिर प्रचलित देखने और वेद-वाणी को फिर गूँजते सुनने का जो स्वप्न राम देखते हैं, उससे ऐसा प्रतीत होता है मानो राम-रावण का युद्ध दो सभ्यताओं का युद्ध है-

आर्य सभ्यता और अनार्य सभ्यता का संघर्ष है-

में दूँगा अब आर्यत्व उन्हें निज कर से 

यहीं तक नहीं, एकादश सर्ग में शत्रुघ्न राम के कार्यों का विवरण देते-देते प्रूम-फिरकर इस बात पर आते हैं-

जय-जयकार किया मुनियों ने,

दस्युगुज॒ यों ध्वस्त हुआ,

आर्य-सभ्यतगा हुई प्रतिष्ठित,

आर्य-धर्म आश्वस्त हुआ ।

और साकेत के अंत में विरहिणी उर्मिला जब खोये यौवन का स्मरण कर विकल होती है, तब लक्ष्मण उसकी तुलना में एक महान्‌ लाभ की ओर संकेत करते हुए अत्यन्त हर्ष-पूर्वक घोषित करते हैं-

धरा-धाम को राम-राज्य की जय गाने दो ।

ग्रंथ का नाम साकेत है। इससे यह ध्वनि निकलती है कि घटनाएँ साकेत (अयोध्या) में घटी है। कवि को विवश होकर चित्रकूट जाना पड़ता है-

सम्प्रति साकेत-समाज वहीं है सारा । नहीं तो स्थान परिवर्तित न हो, इसके लिए गुप्त जी ने साकेत में ही संजीवनी जड़ी मेगा दी, साकेत में ही शत्रुघ्न के मुख से राम की बन-यात्रा की कथा कहला दी और साकेत में ही वशिष्ट की योग-शक्ति से लंका में राम की विजय दिखला दी । |

गुप्त जी संयोग-काल के कवि हैं । साकेत में उर्मिला-लक्ष्मण के तीन मिलन- स्थल है-प्रथम, अष्टम और द्वादश के उत्तरार्ट । तीनों ही अत्यंत सजीव हैं। नवम में भी झयोग की स्मृति से सम्बन्धित चित्रों को सरसता की दृष्टि से हम पृथक कर सकते हैं ।

विरह-वर्णन की जो रूप-रेखा है, यदि उसे विस्तार न दिया जाता तो साकेत की मार्मिकता द्विगुणित हो जाती । उर्मिला के विरह-वर्णन में कई स्थानों पर सुन्दर भाव झलक मारते हैं | उर्मिला की सहानुभूति पशु-पक्षियों तक विस्तृत है । 

शिशिर मानस के जल को जमा देता है, यही सोचकर उर्मिला उससे प्रार्थना करती है कि वह उसके मानस-भजन में नयन-नीर को जमा दे | इसे वह मोती-सा सुरक्षित रखेगी और लक्ष्मण को भेंट करेगी | 

विशाल दुःख को छोटे से छोटे रूप में समेट कर रखने का इससे सरल और कौन-सा उपाय हो सकता था? वह चरण-धूति स्पर्श करने के लिए लक्ष्मण के निकट वन में छिपकर रहने की कामना करती है ।

इस अभिलाषा में कितना सुख है, कितना दुःख । भूली-भूली उर्मिला ने अपनी तूली से जो विरहिणी की चिंता पर देर से पहुँचे प्रेमी को रुलाकर प्रेमिका की मुखाकृति का पुष्प उगाया है, उससे पाठकों के इृदय पर कितनी गहरी चोट पहुँचती है । 

उर्मिला की विक्षिप्तावस्था में वन से लौटे लक्ष्मण का चित्र उपस्थित कर कवि ने प्रेम और कर्तव्य का जो संघर्ष दिखलाया है, वह भी विलक्षण मार्मिकता लिए हुए चरित्रों में सबसे अधिक सफलता मिली गुप्त जी को कैकेयी की मूर्ति खड़ी करने में । उनके अन्य सभी चरित्र सरल हैं | हम चाहें तो एक-एक शब्द में हम उनका चरित्र-चित्रण कर सकते हैं । 

राम पुरुषोत्तम हैं, सीता और मांडवी पतिप्राण, कौशल्या माता है, सुमित्रा क्षत्राणी, दारथ धर्म-संकट हैं, भरत-लक्ष्मण भ्रातृ-स्नेही, परन्तु कैकेयी के सम्बन्ध में कुछ पता नहीं कि वह किस समय क्‍या कर बैठे । 

उसके भावों का उतार-चढ़ाव बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से कवि ने दिखाया है । साकेत में गुप्त जी ने कला पर अपने विचार प्रकट किए हैं । भाषा साकेत की कहीं चिकनी, कहीं खुरदरी और कहीं नुकीली है-पथ के रोड़ों को सरिता ने जैसे कुछ घिस दिया हो, कुछ न घिसा हो । 

पंक्तियाँ व्याकरण-सम्मत हैं। छंद भावानुकूल हैं और अंत्यानुप्रास पर उनका पूर्ण अधिकार है । अर्थ की दृष्टि से दुरूहता कहीं नहीं । खड़ी बोली के कवियों में मैथिलीशरण जी की रचनाओं में जो प्रसाद गुण हैं, वह ईर्ष्या की वस्तु है । 

साकेत खड़ी बोली का अत्यन्त लोक-प्रिय ग्रंथ है । इसमें उन्होंने भारत की धर्म-प्राण, आदर्श-प्रिय एवं राम-स्नेही जनता के मर्म को स्पर्श किया है ।

“जयभारत” की रचना व्यास के महाभारत के अनुकरण पर हुई है। जिसमें कौरव-पांडवों के पारस्परिक कलह और उससे उत्पन्न उस महायुद्ध का वर्णन है जिसमें प्राचीन भारत का सब कुछ नष्ट हो गया | ‘जय भारत’ प्राचीन भारत की हिंदू संस्कृति का स्वच्छ दर्पण है | इसका मुख्य विषय धर्म और अधर्म का युद्ध है जिससे प्रारम्भ में अधर्म प्रबल होता दिखाया गया है, पर अंत में जय होती है धर्म ही की । 

इसी आधार पर इसके पात्र भी दो स्पष्ट भागों में विभाजित हो गए हैं । एक ओर है सत्‌ पात्र, जिनमें युथधिष्ठिर, उनके भाई, कृष्ण और विदुर आते हैं, दूसरी ओर है असत्‌ पात्र, जिनमें दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि, जयद्रथ और अश्वत्थामा आदि है। भीष्म और द्रोण ने यद्यपि असत्‌ का साथ दिया पर उनका झुकाव सत्‌ की ओर ही था | “जय भारत’ के पात्रों में मनोवैज्ञानिक जटिलता कहाँ नहीं पायी जाती । 

जो जैसा है, अंत तक वह वैसा ही रहता है। केवल दो पात्र ऐसे हैं जिनमें थोड़ा अंतर्द्धद्ध दिखलाया-गया है | इनमें से एक है कुंती, दूसरा है कर्ण । पर ये बहुत साधारण उदाहरण है । ‘जय-भारत’ में एक भी सत्‌ पात्र ऐसा नहीं हैं जिसका अंत में घोर पतन हुआ हो और न कोई दुष्ट पात्र ऐसा है जो पश्चाताप करके सुधर गया हो अर्थात इसके पात्र चारित्रिक उत्थान-पतन की सम्भावनाओं से दूर हैं। 


ये प्रबल मानवीय भावनाओं के प्रतीक है-भीष्म त्याग, शक्ति और समदृष्टि के, द्रोण वीरता और पांडित्य के, धृतराष्ट्र अंध वात्सल्य के, कृष्ण विवेक और गौरव के, युधिष्टिर धर्म और मानवता के, भीम शारीरिक बल के, अर्जुन निष्ठा, शौर्य और स्वाभिमान के, विदुर नीति के, दुर्योधन द्वेष, कुटिलता और हठ का, दुःशासन नीचता और अंध भ्रातृ-भक्ति का, कर्ण पुरुषार्थ का, शकुनि छल का, जयद्रथ लंपटता और कायरता का ।

युधिष्टिर इस महाकाव्य के नायक हैं । वे धर्म-प्राण हैं । धर्म तीन बार उनकी कठिन परीक्षा लेता है और वे तीनों बार उत्तीर्ण होते हैं । वे मानवीय दुर्नलताएँ उनके चरित्र में भी हैं । दुःख को सहकर वे अंत में निखर उठे हैं, यह ठीक है, पर उनकी सहनशीलता के लिए उनके आश्रितों को कितना मूल्य चुकाना पड़ा, यह भी किसी से छिपा नहीं है । 

उन्होंने जीवन भर धर्म-मर्मज्ञता का नहीं, धर्म-भीरुता का परिचय दिया । “जय भारत’ में धर्म का वास्तविक ज्ञाता कोई है, तो केवल कृष्ण । भीष्म पितामह और विदुर भी गंभीर विचारक और नीतिज्ञ ही कहे जा सकते हैं, धर्म-मर्मज्ञ नहीं, क्योंकि कृष्ण के समान वे धर्म के व्यवहार-पक्ष पर बल नहीं देते । 

पांडवों के पक्ष में यदि कृष्ण न होते, तो यह कहना कठिन है कि धर्म की जिस जय का स्वप्न युधिष्टर जीवन भर देखते रहे, वह पूरा होता भी या नहीं । स्त्री पात्रों में कुन्ती का चरित्र प्रारंभ से ही गंभीर है । जीवन में उससे एक भूल हो गयी थी, जिसके लिए पता नहीं, ठसका मानस कितना व्यधित और आंदोलित रहा | पर वह क्षत्राणी माँ थी। 

महाभारत की समाप्ति पर जब सब शोक-मग्न है, तब कुन्ती ही युधिष्टिर को समझाती है कि उन्हें प्रजा की ओर ध्यान देना चाहिए | गांधारी पतिपरायण होने पर भी अपने को विवेकहीन सिद्ध नहीं करती । जिस सभा में पांचाली से अभद्र व्यवहार किया जा रहा है, वह वहीं जाकर अपने पति और पुत्रों को फटकारती है । सुभद्रा सरल और विनीत है । द्रौपदी इस प्रबन्ध-काव्य की प्रधान पात्री है | 

वे सच्ची गृह-लक्ष्मी है । जीवन में उन्होंने बहुत दुःख सहे । अपने अपमान का ध्यान कर कभी-कभी अपने वीर पतियों के प्रति वे व्यंग्यमयी हो उठती थीं, पर फिर स्वयं पछताने लगती थीं। अपने पतीत्व को उन्होंने सदैव विवेक की दृष्टि से देखा | वे हेंसकर कहा करती थीं कि पुरुषों में जो बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित है, उसका सारा बदला उन्होंने ले लिया है ।यह महाकाव्य कई महत्वपूर्ण समस्याएं हमारे सामने ठठाता है । एक समस्या है जीवन में नारी के स्थान की । गुप्त जी ने नारी के मंगलम गृहिणी रूप को प्रमुखता दी है । दूसरी समस्या है ऊँची-नीची जाति वाले लोगों के बीच विवाह-सम्बन्ध की, जिसे हिडिम्बा की कथा सामने लाती है । 

तीसरी है शुद्रों को वेद- विद्या-दान की । इसे एकलव्य के प्रसंग द्वारा उठाया गया है | चौथी है पशु-हिंसा की जो वन-मृगी की याचना द्वारा अत्यंत मर्म-स्पर्शी ढंग से अंकित की गयी है । घर इन सबसे प्रसुख समस्या है युद्ध कौ और एक प्रकार से पूरा जय भारत” ही युद्ध की व्यर्थता सिद्ध करता है । ‘साकेत’ और जय भारत” में से कौन अधिक सफल है, यह कहना एकदम सरल नहीं है । 

काव्यत्व साकेत में अधिक है, पर जहाँ तक कथानक की विशालता और कथा-वस्तु की गठन, यथार्थ जीवन की विविधता और चरित्र की सम्भावनाओं, संवादों की नूतनता और मनोवृत्तियों की पकड़, दार्शनिक विचारों की प्रौढ़का और धर्म के प्रति उत्कट अनुराग, व्यापक सांस्कृतिक चेतना और कवि- संदेश की गंभीरता का प्रश्न है, जय भारत’ बहुत आगे बढ़ जाता है। 

अपनी जीवन-व्यापी साधना में केवल यहाँ ही गुप्त जी विराट जीवन के दृष्टा, विश्लेषक और संदेश-वाहक बन सके हैं । “जय भारत’ की केन्द्रीय चेतना है धर्म । ‘रामचरित मानस” की सिद्धि, भक्ति, “कामायनी’ की समरसता और “जय भारत” की पर-कल्याण में है। 

तीनों ही महाकाव्य सामूहिक मंगल पर बल देते हुए व्यक्ति-प्रधान हैं। तीनों ही महाकाव्यकारों का दृष्टिकोण आध्यात्मिक है। वे भौतिकता को जीवन का चरम लक्ष्य नहीं मानते । इस प्रकार तुलसी और प्रसाद के साथ मैथिलीशरण गुप्त भी संस्कृति की आध्यात्मिक परंपरा को आलोकित करने वाले एक आलोक-स्तंभ हैं ।

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सबके पढ़ने योग्य है। अश्लीलता उसमें कहीं नहीं । हिंदू-सभ्यता और संस्कृति को उन्होंने अत्यंत उज्जवल रूप में संसार के सामने रखा है | नारी की गरिमा को वे कभी विस्मरण नहीं करते ।’ 

उसके प्रति अन्य कवियों का सा हल्का दृष्टिकोण उन्होंने कहीं नहीं प्रदर्शित किया । उर्मिला, यशोधरा, राधा विष्णुप्रिया और रलावली उनके अमर नारी पात्र हैं । अपने काव्य-प्रन्थों में गुप्त जी ने सैकड़ों छंदों, अगणित अलंकारों और सभी रफों का प्रयोग किया है। करुणा के चित्रण में तो वे बड़े सिद्धहस्त हैं। 

उन्होंने सबसे पहला और सबसे बड़ा काम भाषा को निरंतर निखारने का किया हैं बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही ब्रजभाषा के रसिकों ने शोर मचाया कि खड़ी बोली में कविता हो ही नहीं सकती और यदि हो सकती है तो उसमें वह माधुर्य नहीं आ सकता जो ब्रजभाषा में है । 

ऐसी स्थिति में मैधिलीशरण के व्यक्तित्व के महत्व को समझा जा सकता है। आधुनिक-काल के अन्य कवियों जैसे प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी ने गुप्त जी के उपरांत लिखना प्रारंभ किया । इनके पूर्व के खड़ी बोली के जो कवि हैं, उनकी भाषा या तो रूखी है या उसमें व्याकरण की अशुद्धियों भरी पड़ी हैं। आज जिस खड़ी बोली का प्रयोग हम करते हैं, वह टकसाली हो गयी है। 

उसमें जो सरसता, जो मधुरता, जो कोमलता और जो शक्ति है, वह हिन्दी के अनेक साधकों के प्रयत्त का फल है और इसमें संदेह नहीं कि भाषा के इस परिमार्जन में मैथिलीशरण गुप्त ने बड़ा परिश्रम किया है। 

मौलिक ग्रंथों का सृजन करने से पूर्व ही गुप्त जी ने बंगला, फारसी और संस्कृत के कुछ प्रसिद्ध ग्रंथों के अनुवाद किए थे, अतः उनकी भाषा में और भी निखार आ गया, उनकी शैली में और भी प्रवाह ।इस प्रकार गुप्त जी भाषा के प्रयोक्ता ही नहीं है, उसके निर्माता भी हैं । बीसवीं शताब्दी का ऐसा कोई युग नहीं है, जब मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी ने विश्राम लेना जाना हो, अतः जो लोग उन्हें केवल द्विवेदी युग का कवि कहते हैं। 

वे उनके प्रति बड़ा अन्याव करते हैं। हिंदी-काव्य को उनकी देन इतनी महत्वपूर्ण है कि संक्षेप में उसका विवेचन करना संभव ही नहीं है । 

अपने प्रबंध- काव्यों में उन्होंने सुख-दुःख के असंख्य तानों-बानों से विशाल जीवन का जो पट बुना है, विराट मानवीय चेतना और वैविध्यपूर्ण भाव-जगत के जो चित्र अंकित किए हैं, रामायण-काल से लेकर गांधी-युग तक भारतीय संस्कृति का जो बोध अपनी परिपूर्णता में कराया है तथा राम, कृष्ण, युधिष्टिर, बुद्ध और चैतन्य महाप्रभु के व्यक्तित्वों के योग से चरित्रों की, हिमालय के शिखरों जैसी गरिमा का जो आभास हमें दिया है, उसकी कल्पना मात्र से चकित रह जाना पड़ता है ।

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