आधुनिक हिंदी का इतिहास

Modernism in Hindi Literature

आधुनिक हिंदी का इतिहास
आधुनिकता

हिन्दी साहित्य का पिछला दशक (१६६०-७०) आधुनिकता से विशेष प्रभावित है। आधुनिक और आधुनिकता में अन्तर है। ‘आधुनिक’ ‘मध्यकालीन’ से अलग होने की सूचना देता है। ‘आधुनिक’ वैज्ञानिक आविष्कारों और औद्योगीकरण का परिणाम है जब कि “आधुनिकता” औद्योगीकरण की अतिशयता, महानगरीय एकरसता, दो महायुद्धों की विभीषिका का फल है। वस्तुतः नवीन ज्ञान-विज्ञान, टेक्नोलॉजी के फलस्वरूप उत्पन्न विषम मानवीय स्थितियों के नये, गेर-रोमेटिक और अमिथकीय साक्षात्कार का नाम “आधुनिकता! है।

एक समय तक इहलीकिक होकर, आधुनिक दृष्टि प्रगतिशील बनी रही। प्रत्येक देश में पुनजागरण (रेनेसो) आया, बहुत से परतंत्र देश स्वतंत्र हुए, अपने-अपने सपने लेकर उन्होंने अपने दंग की सरकारें बनाईं। एक बिन्दु पर खड़े होकर मनुष्य ने पाया कि जिस आध्ोगीकरण और प्रविधीकरण के महारे उसने परी-देश का सपना देखा था, वह साकार नहीं हो सका, सरकोरें स्थिर व्यवस्था में बदल गई। लोकतन्त्र तथा साम्यवादी सरकारें समान रूप से निराशाजनक सिद्ध हुईं। व्यक्ति या तो व्यवस्था का पुर्जा हो गया या प्रविधि का। उसका अपना व्यक्तिव और पहचान खो गयी। इस खोये हुए व्यक्तिब्व की खोज-प्रक्रिया का नाम आधुनिकता है।

आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने मनुष्य को बहुत कुछ बुद्धि-सम्मत यना दिया था। नीछी की इस घोषणा से कि ‘ईश्वर मर गया’ बीद्धिक जगत्‌ में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन आया; यथार्थ का स्वरूप ही बदल गया। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, अच्छे-युरे की जो कसौटियाँ धर्मग्रन्थों में निर्धारित की गयी थीं, उनकी प्रामाणिकता प्षमाप्त हो गयी; पुराने मूल्य विघटित हो गये। मनुष्य ने पाया कि वर्तमान परिस्थिति (सिचुएशन) में वह असहाय, क्षुद्र और निरर्थक प्राणी है।

विज्ञान की प्रगति ने भी निश्चयतावादी तिद्धान्त को खोखला सिद्ध कर दिया। फ्लैंक के क्वांटम-सिद्धान्त और आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद से सिद्ध हो गया कि न तो कोई सार्वभीम सत्य होता है और न शाश्वत नैतिकता। अणुओं की सत्ता के असिद्ध हो जाने के बाद अणु शक्ति (एनर्जी) में बदल जाता है और शक्ति अणु में। निश्चवा्मकता की समाप्ति की अन्तिम घोषणा हो गयी। अत्तित्ववादी दर्शन ने इस पर अपनी मुहर लगा कर इसे और भी पुष्ट कर दिया ।

अस्तित्ववादी दर्शन ने अपने पूर्ववर्ती दर्शन और विज्ञान की अमूर्तता पर आक्रमण किया। उसने अपने को ठोस अनुभवों तथा प्रत्येक व्यक्ति के बुनियादी सवालों के साथ जोड़ा। ये बुनियादी सवाल हैं–व्यक्ति की व्यग्रता, दुःख, निराशा, अकेलापन, मृत्यु-बोध, स्वतन्त्रता, त्रास आदि। इसके साथ ही वह सामूहिकतावाद और निश्चयवाद के विरुद्ध भी खड़ा हुआ। वह उन समस्त विचारों के विरुद्ध है जो व्यक्ति को अ-मनुष्य और अल्तित्वहीन बनाते हैं।

उसकी दृष्टि में मनुष्य स्वतन्त्र है वह न वस्तु है न मशीन है ; वह क्रियालक शक्ति है। वह स्वतन्त्र निर्णय लेने में समर्थ है और इसके लिए खुद जिम्मेदार है। कीक्केगार्ड, हेडगर, जैस्पर्स, मार्सेल, सार्त्र आदि के अस्तित्ववादी विचारों का प्रभाव आधुनिक पश्चिमी साहित्य पर खूब पड़ा है। आधुनिक चित्रकला भी इससे कम प्रभावित नहीं है। सेजोँ, बान गोग, पिकासो आदि पर इनका स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है|

आधुनिकतावादी साहित्य एक विशेष प्रकार का साहित्य है। समसामयिकता का सम्बन्ध ‘काल’ से है तो आधुनिकता का संवेदना, शैली और रूप से। यह स्थापित संस्कृति, मूल्य और संवेदना को अस्वीकार करती है। यह दुनिया की मान्यताओं को मंजूर नहीं करती, परम्परा को वेड़ी के रूप में लेती है। आधुनिकतावादी अन्तर्यात्रा करता है, मूल्यों का मखौल उड़ाता है, वह विद्रोही होता है। भीड़ का विरोध करता है, बह व्यक्ति की मुक्ति का विश्वाती है।

वह अपने को अ-मानव की स्थिति में पाता है, और स्रेह, कृतज्ञता आदि को निष्कासित कर देता है। संयम की कमी, प्रयोग, साहित्य रूपों की तोड़-फोड़, शॉक देने की मनोवृत्ति, आक्रीश-क्षोभ-हिंसा की आकांक्षा आदि इसकी विशेषताएँ या ‘मोटिफ’ हैं।

सातवें दशक के हिन्दी-साहित्य में अ-कविता में अ-कहानी, अ-नाटक, अ-उपन्यास की जो चर्चाएँ हुईं (चर्चाएँ कहना अधिक उपयुक्त है क्‍योंकि इन्होंने आन्दोलन का रूप नहीं लिया। अत्यन्त अल्प काल के लिए अ-कबिता का एक आन्दोलन चला पर वह शीघ्र ही काल के गाल में समा गया) उनके आधार पर लिखा गया साहित्य आज के अनिश्चय, व्यर्थवता, अकेलेपन, अजनवियत, आलनिर्वासन आदि को व्यक्त करता है। यह साहित्य अपने रूप-संवेदना में किस दर्जे का है, यह अलग बात है।
आधुनिकता का यह बोध एक वास्तविकता है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता |

इस देश में इसे ले आने की बहुत कुछ जिम्मेदारी हमारी भ्रष्टाचारी लोकतन्त्र को है। पर आठवें दशक के आरम्भ में हमारे साहित्यकारों में इससे छुटकारा पाने की बेचैनी दिखाई पड़ने लगी है। सबसे पहले यह बोध कविता में दिखाई पड़ा। इन रचनाओं को नव-वामपन्थी रचनाएँ कहा जा सकता है। वस्तुतः नव-वामपन्थी आन्दोलन ‘न्यू लेफ्ट मूवमेंट’ का अनुवाद है। अपने देश में इसका जन्म साम्यवादी दल के पारस्परिक विरोध और विघटन के कारण हुआ।

इसे अधिक रैडिकल समझ कर नए साहित्यकार भी इस ओर उन्मुख हुए। इन रचनाओं में अधिकांश सूडो नव-चामपन्थी हैं। किन्तु कुछ ऐसे भी हैं जिनके पास दृढ़ आदर्श हैं पर राजनीतिक दृष्टि से वे शोर-शराबा के इर्द-गिर्द अधिक चक्कर काटते हैं। इन लोगों ने कुछ अर्थवान रचनाएँ दी हैं। पर इनके अपने निश्चित मुहावरे बन गए हैं। इसलिए, डर है कि तथ्य बनने के पहले आधुनिकतावादी निहिलिस्टों की तरह, ये इतिहास की वस्तु न बन जायें।

उत्तर आधुनिकता

इधर कुछ अरसे से पश्चिम में उत्तर-आधुनिकता-वाद की चर्चा हो रही थी, पुस्तकें निकल रही थीं, गोष्टियाँ आयोजित की जा रही थीं। किन्तु सोवियत संघ के विखवराव के ठीक बाद उत्तर-आधुनिकता पर हिन्दी में बहस शुरू हो गई है। क्या यह आकत्मिक है ? या संघ के विखराव के याद एक स्वप्न टूटा है, एक अनिश्चयता की स्थिति आई है।

उत्तर-आधुनिकता की दो विशेषताएँ हैं–दिशाहीनता और उपभोक्ताबादी समाज का उदय और सुखवाद का चरम विस्तार। प्रगति के प्रत्यय को आधुनिकतावादियों ने पहले ही मिथक कह दिया था पर अनिश्चय का धुंधलका इतना घनीभूत नहीं हुआ था। ज्योति की चिनगारियाँ जहाँ-तहाँ दिखाई पड़ जाती थीं। सोवियत संघ का विघटन उत्तर आधुनिकतावाद का एक सशक्त उपलक्षण है। उसके पराभव के मूल में उपभोक्तावाद के साथ उसके तालमेल का न बैठना है।

संचार माध्यमों ने सिद्ध कर दिया है कि आज का समाज दूरदर्शन की माप के बाहर नहीं है। सुपरमार्केट का स्थान स्वतन्त्र बाजार (फ्री-मार्केट) ले रहा है। बाजार में रंग-बिरंग माल की ढेर लगी है। यहाँ केवल क्रय का सुख प्राप्त होता है। इसमें दूरदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
अद्भुत युग आया है–न कोई तारतमिकता न किसी विचार के प्रति आस्था, स्वयं आस्था में भी आस्था नहीं। उस इन्द्रामकता का कहीं पता नहीं जो इतिहास के गन्तव्य का निर्णय करती थी। नीरन्ध्र तार्किकता में भी अतार्किकता ने अपनी जगह यना ली है।

सर्वत्र अनेकान्तता है, अनिश्चयता है, अस्पशण्ता है, अनित्यता है। कोई सत्यान्वेषण का दावा नहीं कर सकता। इतिहास एक अंतहीन छद॒म क्रीडा या नाटक -हो गया है, वह एक फूहड़ राजनीति का शिकार हो चुका है। एक दिशाहीन चक्राकार यात्रा। यह समृद्ध समाज की नई मंजिल है! यह एक मंजिल है। मुक्त बाजार के संघर्ष और निर्धन व्यक्तियों का एक बहुत बड़े वर्ग के असंतोष को उत्तर आधुनिकता के नाम पर सदा के लिए दबाया नहीं जा सकता। साठोत्तरी साहित्य में विशेष रूप से आठवें दशक पर उत्तर आधुनिकताबाद की ध्यनि न सही प्रतिध्यनि सुनाई पड़ने लगी है।

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