Progressive-and-Experimentalism

Progressive and Experimentalism

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद 

छायावाद के बाद 1936 में प्रगविवाद का प्रवर्तन हुआ और 1943 में प्रयोगवाद का। प्रगतिवादी साहित्य मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रभावित साहित्य है। यह धारा जनवादी साहित्य या प्रगतिवादी साहित्य के नाम पर आज भी चल रही है। यह केवल साहित्यिक धारा नहीं है बल्कि राजनीति से भी इसका गहरा लगाव है।

चूँकि आज की मानवीय संस्कृति में राजनीति की प्रमुख भूमिका है, इसलिए प्रगतिवादी कविता आज की प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में मान्य है। स्वतन्त्रता के बाद राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए हैं। पिछड़े, गरीब एवं उपेक्षित लोगों के आर्थिक एवं सामाजिक ठत्थान का दावमित्व लोकतांत्रिक प्रणाली से निर्मित सरकारों के ऊपर आ गया है।

राजनीति में पुराने राजाओं सामंतों तथा सेठ साहूकारों का वर्चस्व बढ़ता गया। सामान्य व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका अपेक्षा से बहुत कम रही। निचले तबके के जो नेता राजनीतिक दृष्टि से सफल हुए वे भी अपने समकक्ष लोगों के ठत्थान में न लगकर निजी स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय आर्थिक संसाधनों का शोषण करने लगे। राजनीति में भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदाववाद और धनबल एवं बाहुबल हावी होते गये। फलस्वरूप आम आदमी को जीवनवापन के लिए, अति आवश्यक साधनों को जुटाने में भी, घोर कठिनाई होने लगी। गरीबों और अमीरों के बीच का अन्तराल बढ़ता गया। शोषण के नये-नये तरीके ईजाद किये गये। जन की पक्षधरता करने वाली कविता और कवि के सामने और बड़ा दायित्व आ गया।

ठसे केवल पूँजीपतियों के खिलाफ ही नहीं बल्कि सामान्य जन को पीड़ित करने वाले अनेक पक्षों के विरुद्ध भी मोर्चा लेना पड़ा। प्रगतिवादी या जनवादी रचनाकार एक ओर सत्ता की दुर्बलताओं और विडम्बनाओं के विरुद्ध अपने शब्दों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर, औद्योगीकरण एवं व्यवसायीकरण के कारण मनुष्य की सूखती हुई संवेदना एवं अमानवीयता के बथार्थ को अंकित करके मानवीय चेतना को जगाने की चेष्टा करते हैं। मजदूरों, किसानों, दलितों और स्त्रियों की समस्याओं और उनके नये संभों को कविता में निरूपित करने की चेष्टा अधिकांश रचनाकार करते हैं। मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवि आरम्भ से ही गरीबी एवं अव्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द करते रहे। से ही गरीबी एवं अव्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द करते रहे।

इनकी रचनाओं में लोकजीवन, लोकसंस्कृति, श्रमजनित प्रकृति के सौन्दर्य का चित्रण प्रभावशाली ढंग से हुआ है। 1965 तक प्रगतिवादी कविता में पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई और सत्ता की दमनकारी नीतियों का विरोध हुआ। आरम्भ में रूस के गुणगान भी खूब हुए। सोवियत रूस के विघटन के बाद प्रशंसा का स्वर पूरी तरह दब गया। उत्तर आधुनिकता में उभरने वाले नव-उपनिवेशवाद, नव पूँजीवाद से उभरने वाली प्रवृत्तियों की ओर कवियों का ध्यान आकर्षित हुआ। हिन्दी कविता में धूमिल के आगमन के बाद से सामाजिक एवं राजनीतिक यथार्थ के चित्रण में तल्खी आयी। धूमिल ने कविता के मुहावरे को ही नहीं बल्कि व्याकरण को भी परिवर्तित किया। अपनी खीझ, आक्रोश एवं मानसिक उत्तेजना को व्यक्त करने के लिए उन्होंने भाषा के

अभिजात्य को चुनौती दी। भदेस भनिति के द्वारा समाज के नग्न यथार्थ को उद्घाटित करके इन्होंने हिन्दी कविता की परम्परा में नया मोड़ ला दिया। इसके बाद लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल आदि कवियों ने इसी परम्परा में नये प्रतीकों और बिम्बों के जरिये उपेक्षित, तिरस्कृत लोगों के जीवन के यथार्थ को शब्दबद्ध किया। अरुण कमल सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत स्वभाव के कवि हैं।

इनमें गाली-गलौज की भाषा तो नहीं है, लेकिन यथार्थ को प्रत्यक्ष करने की शिष्ट एवं धारदार भाषा इनके पास अवश्य है। वरिष्ठ कवियों में चन्द्रकान्त देवताले, श्रीकांत वर्मा के नाम इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। चन्द्रकान्त देवताले ने आदिवासी महिलाओं के जीवन को नजदीक से देखा है और मजदूरों के संघर्ष को परखा है। वे अपनी मध्यवर्गीय सोच के साथ गरीबों की दुनिया में प्रवेश करते हैं और तदनुरूप उनके जीवन के मर्म को उदघाटित करते हैं। 1962 के बाद हिन्दी कविता में अनेक आंदोलन उभरकर आये। जिनमें सनातन सर्वोदवी कविता, अ-कविता, ऐन्टी कविता आदि उल्लेखनीय है। इन काव्यान्दोलनों की समाप्ति भले ही थोड़े समय में हो गयी हो, लेकिन इनका प्रभाव समकालीन रचनाकारों में किसी न किसी रूप में बना रहा। अकविता ने भोगवाद व्यवितिवाद या वीभत्स यौनवाद को प्रमुखता दी। श्रीकान्त वर्मा पर अकविता का कुछ न कुछ प्रभाव है।

प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय ने भारतेन्दु की तरह कोई मंडल नहीं बनाया। उन्होंने प्रत्येक कवि को यह छूट दी कि वह अपने-अपने तरीके से मानवीय सच्चाई को समझे और ठसे अपनी भाषा में व्यक्त करें। अज्ञेय का कहना है कि प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है वह साधन है और दोहरा साधन है। क्योंकि एक तो यह उस सत्य को जानने का साधन है जिसे कवि प्रेषित करता है, दूसरे वह उस प्रेषण की क्रिया को और उसके साथनों को जानने का भी साधन है अर्थात्‌ प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अच्छी तरह जान सकता है और अच्छी तरह पहचान सकता है। प्रयोगवाद यद्यपि नई कविता संज्ञा के प्रचलन के बाद समात हो गया, लेकिन प्रयोग की प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई, हो भी नहीं सकती क्योंकि प्रयोग कविता में नवीनता लाने की सतत्‌ और शाश्वत प्रक्रिया है।

नई कविता को वैचारिक एवं रचनात्मक तरीके से प्रतिष्ठित करने वाले प्रमुख कवियों में डॉ .   जगदीश  गुप्त , लष्मीकांत  वर्मा , धर्मवीर  भारती,  भवानी  प्रसाद  मिश्र  रघुवीर सहाय, श्री नरेश मेहता, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, शमशेर बहादुर सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं। सप्तकों के माध्यम से हिन्दी कविता के प्रस्थान को आसानी से समझा जा सकता है। तारसप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक में संकलित कवियों को हिन्दी जगत में विशेष ख्याति मिली। चौथा सत्तक जिसका प्रकाशन 1979 में हुआ में संकलित कवियों को

पूर्ववर्तियों की तुलना में कम महत्व मिला। इसका प्रमुख कारण है कि हिन्दी के प्रतिष्ठित समीक्षक मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े हुए हैं, प्रगतिवादी या जनवादी मंचों से जुड़े हुए कवियों की रचनाओं को वे जितना महत्व देते हैं उतना अन्य कवियों को नहीं, बल्कि उन्हें काव्य जगत के दायरे से भी बाहर रखना चाहते हैं। पहले संकेत किया जा चुका है कि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र की नवीन बनावट में व्यक्तिवादी या भाववादी या कलावादी काव्य प्रवृत्तियाँ स्वतः अप्रासंगिक हो गयी हैं।

औद्योगीकरण एवं उपभोकतावादी संस्कृति का प्रभाव केवल निम्नवर्ग पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवीय समाज पर है। धर्म की अमानवीय व्याख्या, स्वार्थपरकता, अर्थलोलुपता, विज्ञान के द्वारा विकसित विनाश के विभिन्‍न

साधन आदि के कारण सम्पूर्ण मनुष्यता के लिए ही संकट पैदा हो गया है। अतः मनुष्य को बचाना सबके लिए प्राथमिक दायित्व है। अभी भी मनुष्य जीवन और मृत्यु के अनेक प्रश्नों से टकरा रहा है। परिवर्तन की गति इतनी तेज है कि यह आशंका होने लगती है कि मनुष्य मनुष्य की पहचान कराने वाले लक्षण ही न लुप्त हो जायें। अशोक बाजपेयी ऐसे रचनाकार हैं जो मनुष्यता के व्यापक प्रश्नों से टकराते हैं और नई परिस्थितियों में मानवीय सभ्यता को रचना के माध्यम से स्थापित करते हैं। नयी कविता से जुड़े अनेक कवियों ने अपनी निजी अनुभूति और शिल्प के द्वारा रचनात्मक ऊँचाई हासिल की। उनकी रचनाधर्मिता को काव्यधारा के दायरे में पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है, बल्कि उनका अलग-अलग विवेखन अपेक्षित है।

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