Prose and beginning of Khadiboli poetry

गद्य और खड़ीबोली कविता का प्रारम्भ

भारतेन्दु और उनका मण्डल


जिन ऐतिहासिक परिस्थितियों में हिन्दी गद्य का निर्माण हो रहा था उन्हें में बेंगला-मराठी-गुजराती तथा अन्य भारतीय भाषाओं का गद्य भी विकसित और निर्मित हो रहा था। इसलिये अपनी अलग-अलग विशेषताओं के बावजूद उनके साहित्य में एक प्रकार का अदूभुत साम्य भी दिखाई देता है। देशभक्ति तथा अंग्रेजों की शोषण-नीति के विरोध में सभी एकमत हैं।

इस समय ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो इतिहास की प्रगति का साथ देते और साहित्य के माध्यम से उसकी गतिशीलता को और भी शक्तिशाली ढंग से अग्रसतारित करने। हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बैंगला में ईश्वरचन्द्र विधासागर, मराठी में विष्णु शाख्री चिपलूणकर और गुजराती में नर्मदाशंकर ने यही कार्य किया और इसमें ही इनकी महत्ता भी है।


इन सभी व्यक्तियों की रघनाओं को, अपने आप में, साहित्य की उच्चतर कोटि में नहीं रखा जा सकता, फिर भी ये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व गिने जाते हैं। इन्होंने ऐतिहासिक गतिविधि के अन्तःसंघर्षों को परखा और उसके गतिशील जीवंत तत्वों को आगे बढ़ाने में भरपूर सहायता की | आर्थिक व्यवस्था में जिस पूँजीवाद का उदय हो रहा था वह राष्ट्रीय चेतना का उम्नायक था। इसके कारण जिस व्यक्तिवाद का आविर्भाव हुआ वह पहले पहल
निबन्धों में प्रकट हुआ।

इस राष्ट्रीय चेतना को पहले पहल भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (१६५०-१८६८६४) ने पहचाना और हिन्दी गद्य के माध्यम से उसे अभिव्यक्ति भी दी। उनका जन्म सन्‌ १८९० ई० में काशी के एक अतिशय समृद्ध कुल में हुआ धा। उनके पिता बाबू गोपालचन्द्र स्वयं साहित्यकार और विद्यानुरागी थे। इनके यहाँ कवियों का जमघट लगा रहता धा। पण्डित ईश्वरीदत्त, सरदार कवि, दीनदयाल गिरि, कन्हैयालाल, लक्ष्मीशंकर व्यास, गुलाबराय नागर आदि उनके सभा सदस्य थे। बालक हरिश्चन्द्र पर इस साहित्यिक वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ा। “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल’ उनके जीवन का बीज मंत्र धा। इसके लिए उन्होंने कई पत्रिकाएँ निकालीं। १८७० ई० में ‘कविता वर्धिनी सभा’ की नींव पड़ी । इसके माध्यम से नए कवियों को प्रोत्साहित करना उनका लक्ष्य था। १८७३ में उन्होंने ‘पेनी रीडिंग क्लब! की स्थापना की। इस क्लब में लेख-पाठ होता था।

इस क्लब में पढ़े गए लेख ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ और हरिश्चन्द्र यच्धिका में छपते थे। धर्म और ईश्वर सम्बन्धी विचारों के प्रचारार्थ में उन्होंने ‘तदीय समाज” की स्थापना की, वे वल्‍्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित वैष्णव थे, किन्तु वाह्याडंवरों में बिल्कुल विश्वास नहीं रखते थे। वे जन्म से उच्चवर्ग के व्यक्ति थे किन्तु कर्म से जन सामान्य के साथ थे। बे महारानी विक्टोरिया के प्रति श्रद्धावान थे पर अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध थे। वे एक ओर रीतिकालिक रसिक थे तो दूसरी ओर आधुनिक चेतना से सम्पन्न। इस प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति की कुल ३४ वर्ष की अल्पकालिक अवस्था में– सन्‌ १८८५ ई० में–इहलीकिक लीला समाप्त भी हो गई। पर इतने थोड़े समय में ही उन्होंने जो कुछ किया वह सर्वदा अविस्मरणीय रहेगा।

सन्‌ १८५७ ई० में देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए जनता एक प्रकार की क्रान्ति से गुजर चुकी थी । इसके फलस्वरूप महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र निकला और कम्पनी के राज्य की परिसमाप्ति हो गई। लेकिन इससे अंग्रेजों की नीति में कोई मौलिक अन्तर नहीं आया। थोड़े ही दिनों में लोग इस कपटपूर्ण घोषणापत्र की वास्तविकता को समझ गए और राष्ट्रीय चेतना को आगे बढ़ाने में संलग्र हो गए ।

इससे भी बड़ा काम उन्होंने यह किया कि साहित्य को नवीन मार्ग दिखाया और उसे वे शिक्षित जनता के साहचर्य में ले आए। विचारधारा बदल चली थी। उनके मन में देशहित, समाजहित आदि की नई उमंगें उत्पन्न हो रही थीं। काल की गति के साथ उनके भाव और विचार तो बहुत आगे बढ़ गये थे, पर साहित्य पीछे ही पड़ा था — इस प्रकार हमारे जीवन और साहित्य के बीच जो ‘विच्छेद पड़ रहा था उसे उन्होंने दूर किया।

भारतेन्दु के कार्यों का लेखा-जोखा अथवा उनके ऐतिहासिक रोल का आकलन करने के लिए, उनके द्वारा संचालित, प्रकाशित तथा सम्पादित तीन पत्रिकाओं– कविवचन सुधा (१८६८ ई०), हरिश्चन्द्र मेगजीन (१८७३ ई०) तथा हरिश्चन्द्र चन्द्रिका (१८७३ ई०) के पन्नों को उलटना पड़ेगा– चन्द्रिका के मुख पृष्ठ पर अंकित है-.. “नवीन प्राचीन संस्कृत भाषा और अंग्रेज़ी में गद्य पध मय काव्य, प्राचीन वृत्त, राज्य सम्बन्धी विषय, नाटक, विद्या और कला पर लेख, लोकोक्ति, इतिहास, परिह्ठास, गद्य और समालोचना सम्भूषिता |

” इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक शब्दावली के निर्माण का कार्य भी जारी था, जिसे भारतेन्दु के सहयोगी विहारी चौवे निष्पन्न कर रहे थे। चौबे जी भाषा विज्ञान विषयक लेख भी लिख रहे थे। इण्डियन एंटिक्वेरी टाइम्स आदि से सम्बद्ध प्रसंगों का चयन भी किया जाता था, ग्राउस आदि के हिन्दी सम्यन्धी वक्तव्यों पर विचार-विनिमय भी प्रकाशित होता था। ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ में धर्म, भाषा आदि विषयक व्याख्यानों की रिपोर्ट छापी जाती थीं। मध्यवर्गीय समाज पर विचार का कार्य उसी समय आरम्भ हो गया था।

कानून की पुस्तकों के अनुवाद की योजना का प्रकाशन भी होता था। इसके साथ-साथ पुराने ढंग की कविताएँ समस्यापूर्तियाँ, नायिक-भेद पर क्रमशः लेख भी प्रकाशित होते रहते थे।
उनकी पत्रिकाओं से साफ है कि गद्य के क्षेत्र में वे पूर्णतः आधुनिक थे तो काव्य के क्षेत्र में परम्परावादी। इसके मूलभूत कारणों की व्याख्या यथाप्रसंग आगे की जायगी। अभी हम अपने को गद्य के विकास तक ही सीमित रखना चाहेंगे।

गद्य को विविध विषयों की ओर ले जाने के साथ-साथ उन्होंने पूर्ववर्ती गद्य की श्रुटियों का परिह्ठार करते हुए उसे नए विचारों की वाहकता के अनुरूप संस्कृत किया। सन्‌ १८७३ में उन्होंने स्वयं लिखा कि ‘हिन्दी नए चाल में ढली सन्‌ १८७३ ई० ।’ इसी को हरिश्चन्द्री हिन्दी भी कहा जाता है। भारतेन्दु, हिन्दी गद्य के सम्बन्ध में राजा शिवप्रसाद और ग़जा लक्ष्मण सिंह के अतिवादों से बचते हुए मध्यम मार्ग के पक्षपाती थे। यह मध्यम मार्ग केवल मेल-जोल की भाषा ही लेकर नहीं आया उसने भाषा को सजीव बनाकर लेखक और पाठक के बीच आतीय रिश्ता भी जोड़ा। आचार्य शुक्ल, हरिश्चन्द्र तथा उनके मण्डल की भाषा-शैली की ‘स्वच्छन्दता’, ‘चपलता’ और ‘“उमंग’ पर मुग्ध हैं। यह उमंग जितनी भाषिक है उतनी ही सामाजिक भी |

भारतेन्दु का व्यक्तित्व अपनी उदारता, गुणग्राहकता आदि के कारण इतना आकर्षक और लोकप्रिय था कि उनके आस-पास लेखकों का अच्छा खासा मंडल तैयार हो गया। उनमें बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, ठाकुर जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी, मोहनलाल विष्णु लाल पंड्या, काशीनाथ खत्री, राधाकृष्णदास आदि प्रमुख हैं। स्वयं भारतेन्दु अपने परिवेश को अन्तरप्रान्तीय बनाना चाहते थे। चन्द्रिका के सहायक सम्पादकों में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, बंगाल, दामोदरशाखी, बिहार, राधाकृष्ण, लाहौर, नवीनचन्दराय, पंजाब आदि का नाम छपता था। इससे भारतेन्दु के व्यापक भारतीय दृष्टिकोण का पता चलता है।

अपनी इस व्यापक चेतना के फलस्वरूप उन्होंने हिन्दी गद्य को अनेक रूपों — निवन्ध, नाटक, उपन्यास, यात्रा-वर्णन इतिहास आदि में ढाला। उनके सहयोगियों ने भी अपने ढंग से उनका हाथ मजबूत किया। इन लेखकों में विषय सम्बन्धी एकरूपता का पाया जाना स्वाभाविक है, क्‍योंकि वे सभी एक ही युग-चेतना के सूत्र में बेँंघे थे। पर अपनी वैयक्तिक विशिष्टता के कारण वे एक-दूसरे से काफी भिन्न भी थे।

भारतेन्दु सही अर्थ में आधुनिक हिन्दी गद्य के जन्मदाता हैं। निबन्ध तो आधुनिक गद्य की अपनी खास चीज है। कविता और नाटक की अपनी ही परम्परा कम दीर्घ नहीं है। उपन्यास और कहानी-लेखन के मूल में बैंगला की प्रेरणा हो सकती है पर निबन्ध उस समय की उस वैयक्तिक स्वच्छन्द्ता की देन है जो उस ऐतिहासिक परिवेश के कारण उत्पन्न हुई थी। इसीलिये अपने विचारों और मान्यताओं को जितने खुले और वैचित्र्यपूर्ण ढंग से उन लोगों ने निबन्धों में व्यक्त किया उतने खुले ढंग से अन्य किसी रचना-प्रकार के माध्यम से नहीं।

भारतेन्दु के पूर्व हिन्दी निबन्ध के नाम पर कुछ धार्मिक उपदेश, प्रवचन, तिद्धात-परिचय तो मिल जाता है पर साहित्यिक निवन्ध नहीं मिलता। भारतेन्दु के निवन्धों में उनकी प्रगतिशील मान्यताएँ, व्यंग्य-विनोद, उदारता, सजीवता सब कुछ के दर्शन होते हैं। निबन्ध चाहे ऐतिहासिक हो अथवा गवेषणात्क, सामाजिक हो अथवा यात्रा परक, सर्वत्र उनके व्यक्तित्व की झाँकी देखी जा सकती है जो अपनी व्यापकता में सम्पूर्ण युग-धेतना को समेटे हुए है। अकबर और औरंगजेब का तुलनात्मक निबन्ध अकबर की ओर उनके झुकाव का द्योतक है। ‘स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन’ में स्वामी दयानन्द और केशवचन्द्र सेन के सम्बन्ध में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है उसमें केशवचन्द्र को अधिक उदाराशय और आलनिएपेक्ष बतलाया गया है। यह भी उनके अधिक उदारवादी और प्रगतिशील होने का ही प्रमाण है।

नई चेतना के फलस्वरूप उन्होंने मरणोन्मुखी रूढ़ियों को सर्वत्र झटका दिया है। ‘काशी” नामक निबन्ध में हिन्दुओं के अंधविश्वास और अज्ञान का बुरी तरह पर्दाफाश किया गया है। “तदीय सर्वस्व’ अधस्पृश्यता और बाह्याइम्बर का उद्घाटन करने में किसी तरह की कोर कसर नहीं करता। बलिया के व्याख्यान में उन्होंने मुसलमानों की संकीर्णताओं पर भी गहरा प्रहार किया है। यात्रा-वर्णन के बीच-बीच जहाँ कहीं उन्हें अवकाश मिला है रुढ़ियों पर चोट करने से बाज नहीं आए हैं। एक व्यक्ति का पिता पानी में डूब कर मर गया है। पंडित जी ने जिस मंत्र से पिण्डा कराया उसका उल्लेख भारतेन्दु ने यों किया है- “आर गंगा पार गंगा बीच में पड़ गई रेत। तहाँ पर गए गाय को चले बुजयुला देत। धर दे पिण्डवा | ‘ “सबै जात गोपाल की” शीर्षक से ही जातिपाँति के विभेद का विरोध किया गया है।

अपने देशवासियों के अज्ञान, संकीर्णता आदि की घोर भर्त्सना करते हुए वे उन्हें जगाने का प्रयास भी करते हैं। “भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है’ में वे लिखते हैं — वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलाने बाला हो तो ये क्‍या नहीं कर सकते? इनसे इतना कह दीजिए “का चुप साधि रहा बलवाना’ फिर देखिये हनुमान जी को अपना यल कैसा याद आता है।’ यह कार्य स्वयं भारतेन्दु कर रहे थे। उन्होंने उसी में और आगे कहा है– ‘जो लोग अपने को देश हितैषी लगाते हों। वह अपने सुख को होम करके अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखा देखी थोड़े दिनों में सब हो जायगा– जब तक सौ दी सी आदमी बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जायेंगे, दरिद्र नहीं जायेंगे, कैद न होंगे बरंच जान से न मारे जायेंगे तब तक कोई देश नहीं सुधरेगा। ” वस्तुतः यह सुधार की थात नहीं बल्कि एक क्रान्तिकारी परिवर्तन का घोतक है। देश की गरीबी, कर-क्लेश, अपने देश की बनी हुई वस्तुओं के उपयोग का उल्लेख तो उन्होंने जगह-जगह किया है।

‘जातीय संगीत” नामक निबन्ध में पुस्तक लिखने के लिए अनेक विषयों का निर्देश किया है जो तत्कालीन जागरूकता का प्रमाण है–बाल्य निकेतन, जन्मपत्री कि विधि, बालकों की शिक्षा, अंग्रेजी फैशन, स्वधर्म चिन्ता, भ्रूणहत्या और शिशुहत्या, फूट, बैर, मैत्री और ऐक्य, यहुजातित्व और बहुभक्तित्व, योग्यपूर्वज आर्यों की स्तुति, जन्मभूमि, आलस्य और सन्तोष, व्यापार की उन्नति, नशा, अदालत, हिन्दुस्तान की वस्तु हिन्दुस्तानियों को व्यवहार करना, भारतवर्ष के दुर्भाग्य का वर्णन। ये विषय स्वयं भारतेन्दु की चतुर्मुखी जागरूकता के परिचायक हैं। इनमें से कुछ विषय शिक्षालक हैं पर अधिकांश जन्मभूमि तथा उनकी समस्याओं से सम्बद्ध हैं। सच पूछिए तो भारतेन्दु के निवन्ध, नाटक, काव्य सभी कुछ इहीं विषयों को दृष्टि में रवकर लिखे गये हैं, अतः वे सोद्देश्य हैं।
भारतेन्दु ने सतर्कतापूर्वक अपने पूर्बवर्ती गद्य की त्रुटियों का भरसक परिहार किया | यों तो आवश्यकतानुसार भाषा का परिष्कार-संस्कार होता चला आ रहा था। राजा शिवप्रसाद ने राजा भोज का सपना’ में जिस पुष्ट भाषा-शैली का व्यवहार किया था अथवा राजा लक्ष्मण सिंह ने अपने अनुवादों में भाषा-गैेली की जो सरसता उत्पन्न की थी वह इस बात का द्योतक है कि भारतेन्दु के पूर्व हिन्दी गद्य का निखार हो चला था, पर भारतेन्दु ने उसे व्यवस्था देकर आगे बढ़ाया भारतेन्दु को अनेक विषयों पर सोह्देश्य लिखना था, उक्त दोनों अनुवादों में पूर्व

निश्चित विचारों और भावों को ढालना था। पर हरिश्चन्द्र को दोनों दृष्टियों से मीलिक प्रयात्त करना था। उन्हें अपने विधारों को जन साधारण तक पहुँचाना था, उनको जगाना था, उनमें पूर्ण चेतना को विकसित करना धा। इसलिये उनकी शैली पर व्याख्यानामकता की छाप साफ देखी जा सकती है! किन्तु यह धार्मिक व्याख्यानों से भिन्न है क्योंकि इसमें लेखक का व्यक्तित्व भी किन्‍्हीं अंशों में प्रतिफलित हुआ है।

उन्हें इतिहास का अद्भुत बोध था। मुसलमानी शासन के अत्याचार से मुक्त होकर हिन्दू जनता को राहत का अनुभव हुआ। इस तथ्य का भारतेन्दु ने खुद उल्लेख किया है। इसके आधार पर कुछ लोग, जिनमें तथाकथित प्रगतिवादी भी शामिल हैं, भारतेन्दु की रचनाओं में हिन्दू राष्ट्रवाद सूँघ लेते हैं। ऐसे लोगों को अपनी प्राण-शक्ति ठीक करने के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के “अकबर और औरंगंजेब’, ‘महात्मा मुहम्मद’, “बीबी फातिमा’ आदि निबन्ध पढ़ना चाहिए जिनमें मुसलमानी धर्म के प्रति उनका आदर और सम्मान व्यक्त हुआ है।

अंग्रेजी राज्य में कुछ अच्छाइयाँ भी थीं–प्रेस, मुद्रणयन्त्र, यातायात के नए साधन आदि। धार्मिक दृष्टि से भी वे उदार थे। अतः उसकी प्रशंसा न करना भी प्रशंसा की बात नहीं है। लेकिन वे मुसलमानी राज को प्लेग और अंग्रेज राज्य को क्षयी का रोग कहते थे। अंग्रेजों की शोषण नीति के सख्त खिलाफ थे। इसके प्रतिरोध में उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग का समर्थन किया, उद्योगीकरण की माँग की और निजभाषा को सब उम्नति का मूल कहा। सामंतवाद और साम्राज्यवाद के इजारेदारों–पण्डों, पुरोहितों, मौलवियों, राजों, जमींदारों, अमलों पर गहरा प्रहार किया। ‘राष्ट्रीय’ के अर्थ में ‘जातीय’ शब्द का प्रयोग पहली बार उन्होंने ही किया।

भाषा के सम्बन्ध में जो आदर्श” उन्होंने प्रस्तुत किया है, यघ्यपि उसका निर्वाह वे सर्वत्र नहीं कर सके फिर भी भरसक उसको पूरा करने के लिए प्रयलशील रहे। सामान्यतः उनके वाक्य छोटे, व्यंजक और भावपूर्ण होते हैं। भाषा की यह सफाई और सरसता उनके समसामयिक किसी अन्य लेखक में नहीं मिलेगी। हास्य और व्यंग्य के लिए उनका ‘अद्भुत अपूर्व स्वप्र’ देखा जा सकता है। ठेठ बनारसी ठाट के उन्मेष से मुहावरों और लोकोक्तियों में अदूभुत सप्राणता आ गई है।

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