Hindi of Sindh

Prose of Nath, Siddh and Niranjani

आधुनिक हिंदी का इतिहास


खड़ीबोली में साहित्य की रचना १३वीं शताब्दी में शुरू हुई. उचद्योतन सूरि रचित कुबलयमाला कथा (७७८ ई०) में एक हाट प्रसंग का उल्लेख मिलता है। उसमें एक मध्यदेशीय वणिक के मुख से सुने हुए मेरे तेरे आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। इससे पता लगता है कि खड़ीबोली मध्यप्रदेश की बोली है। इसके अतिरिक्त इसमें पुष्छह, अल्लया, तुज्झे ऐसे शब्द भी प्रयुक्त
हैं जिन्हें खड़ीबोली शैली का कहा जा सकता है।

वस्तुतः १६वीं शताब्दी तक खड़ीबोली गद्य-परम्परा का कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं मिलता। प्रो० हामिद हसन कादरी ने उर्दू साहित्य के इतिहास में १४वीं शताब्दी के किसी ख्याजा सैयद अशरफ जहाँगीर समनीनी की सूफीमत विषयक रचना का उल्लेख किया है, किन्तु उसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध नहीं है। नाथ सिद्धों की कुछ ऐसी रचनाएँ मिली हैं जिनमें ब्रजभाषा, राजस्थानी, पंजाबी और पूर्वी के मेल के साथ खड़ीबोली का मिश्रण मिलता है। किंतु ये रचनाएँ १७वीं-१८वीं शताद्दी की हैं। दक्खनी हिन्दी के प्रामाणिक नमूने भी १६वीं शताब्दी के पहले के नहीं मिलते।

नाथ-सिद्धों और निरंजनी संप्रदाय के साधुओं की प्राप्त गद्य-रचनाओं में गेशोस गोसठ (गोरख गणेस गुष्टि), महोदय गोरष गुष्टि, गोरक्षा शतम-टिप्पण अभैमात्रा जोग, रामावली, गोरखनाथ के सत्ताईस पदों का तिलक, योगाभ्यास मुद्रा-टिप्पण, परवत सिद्ध का कह्या और भोगुल पुराण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये १७वीं शताव्दी के उत्तरार्ध और १चवीं शताब्दी की रचनाएँ हैं।

गणेस गोसठ या गोरष गणेस गुष्ि की प्रतिलिपियाँ बड़थ्वाल जी को प्राप्त हुई थीं। उनके आधार पर उन्होंने इसका पाठ-शोधन कर गोरखबाणी के परिशिष्ट में प्रकाशित किया था। यह १७वीं शताब्दी के पूर्वार्ध की रचना ज्ञात होती है, क्योंकि उसमें प्रतिलिपि सं० १७१४ लिखा गया है। भाषा का नमूना निम्नलिखित है. .,

“गेणेस बुज गोरष कहै। स्वामी जी तूम का हां त आया। काहा तुमाहारा नाव | अवधू हम निरत्रतं आया। जोगी है मारा नाव। स्वामी जी जोगी ते तो कून बोलिवे। जीन येता मेर भेषला रचिआ। तूम कून गह न चेलो। अमें अभधू नीरंजन जोगी। अतीत गुरु न चेला।’

इसमें अपभ्रंश का द्वित्व व्यंजन नहीं है। अपभ्रंश के घेरे से भाषा निकल चुकी है। पर पुराने ढड़ के तुमाहारा, अमें, तुम मारा, कून आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। इसमें खड़ी- बोली के शब्द रूप और शैली दोनों हैं– आया, रचिआ, तो आदि को उदाहरणार्थ पेश किया जा सकता है। खड़ीवोली का ओकारान्त भी यहाँ मीजूद है। महादेव गोरष गुष्टि, अभे मात्रा जोग आदि में भी खड़ीबोली के शब्दों और शैली को देखा जा सकता है।

“नाथसिद्धों की बानियाँ” पुस्तक के परिशिष्ट में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘श्रीपरवत सिद्ध का कहया भूगोल पुराण” नामक गद्य-रचना संकलित की है। इसकी भाषा को उन्होंने काफी पुराना बताया है। नमूना निम्नलिखित है :–

‘मुमेर पर्वत ऊपरि चारि दिशा पुरीआ है न। कउणु पुरी-कठणु कउणु दिसा है। पूर्व दिशा आगे ऊपरि प्रिथमी ऊपरि चउबीस सहंश्न जोजन अंग्रित पुरी उची है। तहां राज़ा इन्द्र राज करता है। तेतीस कोटि देयते हैं। अठासी हजार सहस्न भूपीसुर है। दछिन दिशा आगे प्रियमी ऊपरि। पचीस सहस्नर जोजन जमपुरी ऊची है ।–!

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