History of Modern Hindi

भारतीय जागरण (रैनेसां) : पश्चिम की चुनौती

आधुनिक हिंदी का इतिहास


अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कारण यहाँ की अर्थनीति में बुनियादी परिवर्तन आया। इसके फलस्वरूप धर्म, समाज, आचार-विचार की जड़ता को एक धक्का लगा। ईसाई मजहब की प्रगति के कारण हिन्दुओं, मुसलमानों की धर्म-संस्कृति की सुरक्षा का प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ। ऐसी स्थिति में धार्मिक-सामाजिक परिष्कार की ओर लोगों का उन्मुख होना स्वाभाविक हो गया। आर्थिक परिवर्तन, नई शिक्षा, यातायात के नए साधनों के फलस्वरूप समाज का जो आधुनिकीकरण आरम्भ हुआ था वह पुराने धार्मिक संस्कारों, रीति-नीतियों, संघटनों के मेल में नहीं था। नए यधार्थ और पुराने संस्कारों के बीच नए सामंजस्य की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। इस सामंजस्य के साथ ही नए भारतीय समाज के निर्माण की प्रक्रिया. आरम्भ होती है।

पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर आधारित होती है। पूर्व-पूँजीवादी समाज में व्यक्ति-स्वातंत्रय के लिए कोई स्थान नहीं होता। व्यक्ति जन्म और लिंग के आधार पर एक विशेष सामाजिक व्यवस्था का अंग हो जाता है। पर नया पूँजीवादी समाज इन बन्धनों से मुक्त होकर ही विकसित हो सकता है। भारतीय पुनर्जागरण के मूल में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का विशेष महत्त्य है| ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, आर्यसमाज ने पुराने धर्म को नए समाज के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। ब्रह्मसमाज और प्रार्थना समाज ने तो स्पष्ट रूप से नए परिवर्तनों को अंगीकार कर लिया था। पर आर्यसमाज वैदिक धर्म के मूल स्वरूप को बनाए रखना चाहता था। किन्तु इसका मतलब नहीं है कि वह वैदिक युग की रीति-नीतियों में लौट जाना चाहता था। उस समय की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विचारधारा पर आर्यसमाज का विशेष प्रभाव पड़ा।

मध्यकाल में नए परिवेश के फलस्वरूप जाति प्रथा, छुआछूत, बाह्याडम्बर आदि के विरोध में भक्ति आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था। मुसलमानों के प्रतिष्ठित हो जाने पर इस आन्दोलन के माध्यम से सामंजस्य का प्रयास दिखाई पड़ा। किन्तु नए युग में नए प्रकार के सामंजस्य की जरूरत पड़ी। मध्यकाल का सामंजस्य भावनामूलक था। उस काल के बहुत से भक्त-सन्त अन्तर्विरोधों के भी शिकार थे। अब भावना से काम नहीं चल सकता था। भावना के स्थान पर तर्क, विवेक और बुद्धि से काम लेना अनिवार्य हो गया था। कहना न होगा कि ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज और आर्यसमाज की मान्यताएँ बहुत कुछ बुद्धि-विवेक और तर्क पर ही आधारित हैं।

ब्रह्मसमाज (१८२६)

आधुनिक भारत की नींव का पहला फ्त्थर राजा राममोहन राय ने रखा। आधुनिकीकरण के सिलसिले में ही उन्होंने (9७७२-१८३३) सन्‌ १८२८ में ब्रह्मसमाज की स्थापना की। अरबी और फारसी का उन्हें बहुत गहरा ज्ञान था। अरबी अनुवाद के माध्यम से ही वे अफलातून, अरस्तु, पलाटीनस आदि प्राचीन यूनानी विचारकों से परिचित हुए। बनारस जाकर कुछ वर्षों तक गीता उपनिषद्‌ आदि का भी गहन अध्ययन उन्होंने किया। उनकी विचारधारा पर इस्लामी एकेश्वरवाद का भी स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

ईसाई मजहब से भी ये कम प्रभावित नहीं थे। ये समस्त विचारधारायें उन्हें पुराने औपनिषदिक दर्शन में मिल गई–विशेष रूप से तैत्तितिय और कौषीतकी में । कर्मकांड और अंधविश्वास का विरोध करने के लिए उन्होंने उपनिषदों का उपयोग किया। मूर्तिपूजा को उन्होंने धर्म का बाह्याडम्बर माना और इसके समर्थन में जितने तर्क दिये जाते थे उनका खण्डन उपनिषदों के आधार पर किया। अन्धश्रद्धा और परम्पराबादिता को उन्होंने खतरनाक बताया | परम्परा में ऐसी बहुत-सी चीजें जोड़ दी जाती हैं जो अविवेकपूर्ण हैं।

उनके मतानुसार परम्परा का प्राचीनतम रूप शुद्ध ब्रह्म की उपासना है न कि मूर्ति-पूजा । आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले वे अकेले व्यक्ति थे जो अन्धविश्वासों और रूढ़ियों के विरुद्ध लड़ रहे थे। उनकी विचारधारा में तर्क की प्रधानता थी जो लाक, द्यम और रूसो के मेल में थी। उनका मत था कि व्यक्ति को स्वयं दार्शनिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए और उनके सिद्धान्तों को अपने तर्क की कसीटी पर कस कर खरा उतरना चाहिए। जो अंश तकनिमोदित न हों उन्हें अस्वीकार करना आवश्यक है। धर्म हिन्दूसमाज की रीढ़ है। हिन्दूसमाज की रचना धर्म के आधार पर ही की गई है। इसलिए धार्मिक सुधार सामाजिक सुधार से अनिवार्यतः सम्बद्ध हो जाता है। राजा राममोहन राय तथा अन्य धर्म सुधारकों ने इसे अच्छी तरह पहचान लिया था। अतः राजा राममोहन राय के नेतृत्व में ब्रह्मसमाज ने कई प्रकार की सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया |

जाति प्रथा को उन्होंने अमानवीय और राष्ट्रीयवा विरोधी कहा। सती प्रथा के विरोध में उनका प्रयास सर्वधा स्मरणीय रहेगा। उन्होंने विधवा विवाह तथा खी-पुरुष के समानाधिकार का भी समर्थन किया।
राजा ने पाश्चात्य संस्कृति को भी मूल्यवान समझा। इसीलिए अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के प्रसार में उचित योग भी दिया। उस समय के ब्रिटिश राज्य की अच्छाइयों की उन्होंने प्रशंसा की। बस्तुतः १६वीं शती के पूर्वार्द्ध तक अंग्रेजों ने जो कुछ किया वह ऐतिहासिक- दृष्टि से प्रगतिशील ही कहा जायगा।

ब्रह्मममाज को देवेन्द्रनाथ टैगोर (१६१७-१६०५) और केशवचन्द्र सेन (१६३८-८४) ने आगे बढ़ाया। देवेन्द्रनाथ वेदों की अपौरुषेयता पर विश्वास नहीं करते थे, उनकी आस्था अन्तःप्रज्ञा पर अधिक थी। केशवचन्द्र सेन बहुत कुछ प्रयोगवादी थे। उन्होंने ब्रह्मधर्म के प्रसार के लिए दूर-दूर तक यात्राएँ कीं। उनकी प्रेरणा के फलस्वरूप मद्रास में वेद-समाज और बम्बई में प्रार्थना-समाज की स्थापना हुईं | वे राजा राममोहन राय की तार्किकता और बौद्धिकता तक ही अपने को सीमित न रख करके बैष्णवों के भजन-कीर्तन की ओर आकृष्ट हुए। ईसाई धर्म की ओर भी वे अधिकाधिक झुकते गए। केशव के कारण समाज में दो बार फूट पड़ी और दोनों बार उन्होंने अलग संस्थाएँ स्थापित कीं–साधारण ब्रह्मसमाज और नव वेदान्त | केशव के बाद ब्रह्मसमाज में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ जो शिक्षित समाज को प्रभावित करता |

प्रा्थनासमाज (१८६७)

सन्‌ १८६४ में बम्बई और पूना में केशवचन्द्र सेन का आगमन हुआ। उनके प्रभाव से १८६७ में प्रार्थनासमाज की स्थापना हुई। इसके प्रनुख उन्नायक महादेव गोविन्द रानाडे थे। वे उम्नीसवीं शताब्दी के चोटी के बुद्धिजीवी, विधियेता और मेधावी व्यक्ति ये। देश और तमाज का कोई ऐसा पक्ष नहीं था जिसकी ओर उनकी दृष्टि न गई हो। वे चालीस वर्षो तक सामाजिक रूढ़ियों और अन्धविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।

उन्होंने धार्मिक और सामाजिक समस्याओं पर तर्कपूर्ण ढंग से विचार किया। उन्हें हिन्दू होने का गर्व था और वे भागवत धर्म के अनुयायी थे। वे संकीर्ण विचारधारा को कभी भी प्रश्रय नहीं देते थे। वे प्रगति, विकास के विश्वासी थे।

उन्होंने शंकरायार्य के अद्वैतवाद का विरोध करते हुए रामानुज के द्वैतवाद का समर्थन किया। मध्यकालीन मराठा संतों के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। वे ईश्वर को सार्वभीम और स्रष्टा मानते थे। आत्मा की अमरता में उन्हें विश्वास था। पर वे अपने विधारों में कहीं भी प्रतिक्रियाबादी नहीं हैं और न तो उनमें कोई पूर्वग्रह ही है |

अतीत के प्रति उनके मन में आदर था। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि वे अतीत को उसके उसी रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना चाहते थे। पुराने आचार-विचार और संस्थाओं को उनके मूल रूप में पुनः स्थापित करने बाले पुनरुत्थानवादियों से वे अनेक प्रश्न पूछते हैं। “हम किस चीज का पुनरुत्थान करें ? क्‍या हम अपने पूर्वजों के पशुतुल्य भोजन और सुरापान को पुनरुत्यापित करें ? क्‍या हम बारह प्रकार के पुत्र और आठ प्रकार के विवाहों को पुनः शुरू करें ? क्‍या पशु यज्ञ या मानव यलि का पुनरारम्भ किया जाय ? क्‍या सती प्रथा को पुनः जारी करना चाहिए ? क्‍या आज भी जगन्नाथ के रथ से कुचलकर मर जाना श्रेयस्कर घोषित करना चाहिए ?”

रानाडे अतीत के मृततत्त्व को मृत मानकर चलने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि मृत अतीत को कभी भी जीवित नहीं किया जा सकता। समाज जीवित अवयवों का संघटन है। इसमें परिवर्तन की प्रक्रिया बरावर चलती रहती है। इस प्रक्रिया के बन्द हो जाने पर समाज मुर्दा हो जायगा।

रानाडे ने जिस एक सुधार पर बार-बार जोर दिया है वह है मनुष्य की समानता। वे जाति-पाँति की प्रथा के विरुद्ध और अन्तर्जातीय विवाह के पक्षधर थे। खी-शिक्षा पर उन्होंने बराबर बल दिया है। उनका वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण, तर्कपद्धति और सामाजिक परिष्कार के प्रति अभिरुचि आदि से स्पष्ट है कि थे पाश्चात्य विधारधारा से प्रभावित थे। किन्तु पाश्यात्य मत को भी उन्होंने बिना वितर्क के स्वीकार नहीं किया। जाहिर है कि वे भी भारतीय संस्कृति को नवीन वैज्ञानिक विचार-प्रणाली के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रहे थे ।

रामकृष्ण मिशन (१८६७)

रामकृष्ण परमहंस अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में परमहंस थे। उनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि इस गरीब, अपड़, गैवार, रोगी, अर्धमूर्तिपूजक, मित्नहीन हिन्दू भक्त ने बंगाल को बुरी तरह हिला दिया। उनके योग्य शिष्य विवेकानन्द ने उन्हें बाहर से भक्त और भीतर से ज्ञानी कहा है। स्वयं विवेकानन्द के सम्बन्ध में ठीक इसका उलटा कहा जा सकता है। रामकृष्ण परमहंस के देहावसान के वाद विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन की सन्‌ १८६७ में
स्थापना की |

सन्‌ १८६३ में विश्व-धर्म संसद्‌ में सम्मिलित होने के लिए वे शिकागो गए। उनकी वक्तृता से प्रभावित होकर न्यूयार्क हेराल्ड ट्रिब्यून ने लिया था–” विश्वधर्म संसद्‌ में विधेकानन्द सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति थे। उनको सुनने के बाद ऐसा लगता है कि उस महान्‌ देश में धार्मिक मिशनों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता थी।” विश्वविजय करने के बाद इस देश में उनका अत्यन्त भव्य स्वागत हुआ।

यद्यपि उनका मुख्य प्रयोजन रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों का प्रचार करना था फिर भी सामाजिक कार्यों में उनकी गहरी रुचि थी। माननीय समता के विश्वासी होने के कारण उन्होंने जाति, सम्प्रदाय, छुआछूत आदि का विरोध किया। गरीबों के प्रति उनकी सहानुभूति अत्यन्त प्रगाढ़ थी। उन्होंने कहा है– “पूजा के सभी उपकरणों को फेंक दो–शंख, घण्टा-घड़ियाल, दीप को प्रतिमा के सम्मुख डाल दो–वैयक्तिक मुक्ति के लिए की गई साधना, शास्त्रों के अध्ययन का अहंकार छोड़ दो। गाँव-गाँव जाओ और गरीबों की सेवा में अपने को निछावर कर दो। “

शिक्षितों तथा उद्चवर्ग की भर्सना करते हुए उन्होंने लिखा है– “जब तक देश के हजारों लोग भूखे हैं, अज्ञानी हैं, मैं प्रत्येक शिक्षित बर्ग को धोख्वेबाज कहूँगा। गरीबों के पैसे से पढ़कर भी वे उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते। भारत को केवल जनता से आशा करनी चाहिए। उद्चवर्ग शारीरिक और नैतिक दृष्टि से मर चुका है। धर्म वह है जो शारीरिक, बीद्धिक और आध्यात्रिक शक्ति दे, जो आत-सम्मान और राष्ट्रीय गौरव प्रदान करने में सहायता करे। धर्मगत ध्यान यदि व्यक्ति को प्रमादी और निष्क्रिय बनाता है तो उसे त्याग देना चाहिए। तुम्हारे रामकृष्ण की धिन्‍ता कौन करता है ? तुम्हारी भक्ति और मुक्ति को कौन देखता है ? तुम्हारे धर्मग्रन्यों की परवाह किसे है ? अगर मैं अपने देशवासियों को कर्मयोग में दीक्षित कर सर्कूं और इसके लिए मुझे हजारों बार नरक जाना पढ़े तो मुझे प्रसन्नता होगी। “

विवेकानन्द ने हीनता की भावना से ग्रस्त देश को यह अनुभव कराया कि इस देश की संस्कृति अब भी अपनी श्रेष्ठता में अद्वितीय है, इस देश का आध्यात्रिक चिन्तन असमानान्तर है। आध्यालिक स्तर पर मनुष्य-मनुष्य की समता, एकता, बन्धुत्व और स्वतन्त्रता की ओर भी उन्होंने हमारा ध्यान आकृष्ट किया। पश्चिम की भौतिकता से चमत्कृत देशवासियों को पहली बार यह एहसास हुआ कि हमारी अपनी परम्परा में भी कुछ बस्तुएँ हैं जिन्हें दुनिया के सामने गौरवपूर्ण ढंग से रखा जा सकता है।

आर्यसमाज (१८६७)

गुजरात, उत्तर प्रदेश और पंजाब में आर्य समाज का प्रभाव था। इन प्रदेशों का मिजाज यंगाल से भिन्न है। यंगाल की भावुकता के स्थान पर इन्हें पीरुष और अक्छड़ता अधिक प्रिय है। बंगाल और महाराष्ट्र के पुनर्जागरण में मध्यकालीन सन्‍्तों की वाणी का भी योगदान है। पर आर्यसमाज में उनका कोई स्थान नहीं है। सन्‌ १८६७ में दयानन्द सरस्वती ने वम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की | दयानन्द असाधारण व्यक्ति थे। वे संस्कृत के चोटी के विद्वान, वाग्गी और अत्यन्त मेधावी थे। उनका व्यक्तित्त अतिशय दृढ़ और असमझौतावादी था। उनके विचारों में कहीं भी अस्पष्टता और रहस्यवादिता नहीं मिलेगी। विवेकानन्द को छोड़कर इतना अटूट आत्म-विश्वास अन्यत्र नहीं दिखाई देगा।

उन्होंने आर्य समाज के लिए बेदों को आधार माना। वे वेदों को शाख् और अपीरुषेय मानते थे। वैदिक धर्म ही सत्य और सार्वभीम है। दूसरे धर्म अधूरे हैं। इसलिए समाज का कर्त्तव्य है कि अन्य धर्मावलम्बियों को हिन्दू धर्म में दीक्षित करे।

आर्यसमाज ने सामाजिक और नैतिक मूल्यों को देखते हुए एक आचार संहिता बनाईं। इसमें जाति भेद, मनुष्य-मनुष्य या ख्री-पुरुष में असमानता के लिए कोई स्थान नहीं था। निश्चय ही यह एक लोकतान्त्रिक दृष्टि थी। वैदिक धर्म के व्याख्याता होने के बावजूद वे पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक थे। समाज की भीतिक उन्नति के लिए वे पाश्चात्य ज्ञान-विश्ञान की शिक्षा आवश्यक समझते थे। १८८६ में दयानन्द एंग्लो-वैदिक कालेज की स्थापना हुईं। आगे चलकर प्रत्येक महत्त्वपूर्ण स्थान पर दयानन्द स्कूल-कालेज खोले गए।

अपने हिन्दूबादी दृष्टिकोण के बावजूद आर्यसमाज ने राष्ट्रीय विचारधारा को आगे बढ़ाने में आश्चर्यजनक योगदान किया। कुछ समय तक ब्रिटिश सरकार इसे दवाने के लिए भरपूर चेष्ा करती रही। “दी टाइम्स” की ओर से १६०७ के याद होनेवाले राष्ट्रीय आन्दोलनों की जाँच करने के लिए एक प्रतिनिधि आया था। उसने आर्यसमाज को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सबसे अधिक खतरनाक तत्त्व बतलाया |

उत्तर भारत के आचार-विचार, रहन-सहन, साहित्य-संस्कृति पर आर्यस्तमाज का गहरा प्रभाव पड़ा। गद्य की भाषा के परिष्कार में भी इस आन्दोलन का अभूतपूर्व योग है। छूआछूत पर जितना प्रबल आघात इस आन्दोलन ने किया उतना और किसी अन्य ने नहीं किया। बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के आन्दोलन उच्च और उद्य-मध्यवर्ग तक ही सीमित रहे । पर आर्यसमाज का प्रसार मुख्यतः मध्यवर्ग के बीच हुआ। इसलिए इसका कार्य अधिक क्रान्तिकारी सिद्ध हो सका।
आर्यसमाज के कार्य एक ओर प्रगतिशील थे तो दूसरी ओर प्रतिक्रियावादी। जहाँ तक मानवीय समता, अस्पृश्यता आदि का सम्बन्ध है, इसे प्रगतिशील माना जायगा। किन्तु मुसलमानों के प्रति इसका आक्रामक रुख प्रतिगामी प्रवृत्ति का सूचक है। वेद को अपीरुषेय और अतर्क्य मान लेने के कारण मुक्त व्यक्तिगत चिन्तन के लिए इसमें अवकाश नहीं रह गया।

थिओसोफी (१८७९)

थिओसोफिकल आन्दोलन भारतीय धार्मिक परम्पता पर ही आधारित था।थिओसोफिकल सोसाइटी की स्थापना मदाम व्लावल्की और कर्नल ओल्काट द्वारा न्यूयार्क में सन्‌ १८७९ में हुई। सोसाइटी के संस्थापक जनवरी १८७६ में भारतवर्ष पहुँचे। १८८२ ई० में अड्डयार (मद्रास) में इसकी शाखा खोल दी गई। श्रीमती एनी बेसेंट सन्‌ १८८८ में इस संस्था की इंग्लैण्ड शाखा से सम्बद्ध हो गई। १८६३ में वे भारत आई और सोसाइटी के विकास में तन-मन से जुट गईं। उन्होंने घोषित किया कि “मैं अपने विगत के संस्कारों के कारण हृदय से तुम्हारे साथ हूं।” अपने गत्यात्मक व्यक्तित्व और असाधारण वक्तृत्व शक्ति के कारण उन्होंने अनेक शिक्षित भारतीयों को आकृष्ट किया।

श्रीमती वेसेंट ने समस्त देश का दौरा किया और हिन्दू धर्म के आध्यात्िकता के पक्ष में ओजस्वी भाषण दिए। थियोसोफी में उन्होंने अपने आदर्शों को मूर्त रूप देने के लिए शिक्षा संस्थाएँ भी खोलीं। बनारस का सेंट्रल हिन्दू कालेज इसी तरह का कालेज था। इस आन्दोलन के कारण उदारता और समन्ययवादी दृष्टि का विकास हुआ। किन्तु यह बहुत कुछ उद्य वर्ग तक ही सीमित रहा। पतिक्रियाएँ बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर भारत में नए धार्मिक आन्दोलनों के विरुद्ध पुनरुत्थानवादी प्रतिक्रियाएँ आरम्भ हुईं। बंगाल में राधाकान्त देव ने राजा राममोहन राय के ब्रह्मसमाज के विरोध में धर्मसभा (१८३०) की स्थापना की। पर ५७ के विद्गेह तक वह समाज का प्रभाव कम नहीं कर सकी |. किन्तु ४७ के विद्रोह के बाद सुधारवादी रेडिकल्स का जोर कम हो गया और पुरातनवादी मनोवृत्तियों उभरकर सामने आई।

१८६४ के अनन्तर बंगाल में दो प्रवृत्तियों का ज्यादा जोर था, राष्ट्रीयावादी और स्वच्छन्दतावादी। दोनों के मूल में वैयक्तिकता, अतीत के प्रति गौरव का भाव, विदेशी सत्ता के विरुद्ध आक्रोश, गाँव की बढ़ती हुई गरीबी के प्रति सहानुभूति, स्वतन्त्रता और समानता के प्रति आग्रह आदि क्रियाशील थे।
अतीत के गौरब के प्रति जाग्रति फैलाने का श्रेय उन पुरातत्त्ववेत्ताओं और पुरालेखविदों के मुद्राशाख््रियों को है जिन्होंने विस्मृति के गर्भ में बिलीन भारतीय साहित्य, कला, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, वास्तुकला आदि का पुनरुद्धार किया। इसके फलस्वरूप संसार में भारत का गौरव बढ़ा और इस देश के निवासियों में आल-सम्मान का भाव जाग उठा।

अब पाश्चात्य संस्कृति के सामने डटकर छड़ा हुआ जा सकता था। नवीन हिन्दूवाद का जन्म हुआ। इसमें मुख्यतः दो दल थे, एक प्रत्येक प्रकार के सुधार का विरोधी था, दूसरा यधास्थान नए विचारों के सन्निवेश का पक्षपाती था। किन्तु मुख्य धारा में यह किसी प्रकार के मौलिक परिवर्तन का आकांक्षी नहीं था। बंकिमथन्द्र चैटर्जी ऐसे ही व्यक्ति थे। वे गीता के निष्काम कर्मयोग के हिमायती थे। उन्होंने धर्मतत्थ पर दो जिलों में पुस्तकें लिखीं, कृष्ण के सम्बन्ध में कृष्ण-चरित्र ग्रन्य लिखा।

वे धर्म सुधारकों की भाँति टुकड़ों-टुकड़ों में समाज सुधार के हिमायती नहीं थे। उनका विश्वास था कि धर्म और नैतिकता के समग्र पुनर्जागरण में ही समाज-सुधार समाविष्ट हो जाता है। बंकिम के विचारों और उपन्यासों में देशप्रेम का स्थान बहुत ऊँचा था। वे देशप्रेम को धर्म और धर्म को देशप्रेम कहते थे।

महाराष्ट्र की स्थिति बंगाल से भिन्न थी। एक तो वह अंग्रेजों के अधिकार में बंगाल से ६० वर्ष पीछे आया और दूसरे पेशवा राज्य की परिसमाप्ति का दर्द उसे बना हुआ था। अपनी परंपराओं के प्रति उसे अधिक अनुराग था। महाराष्ट्र ने देश की गरीबी, भुखमरी आदि का पूरा दायित्व अंग्रेजी राज्य पर डाल दिया। चिपलूणकर के निवन्धों में देश के पराभव का एकमात्र जिम्मेवार विदेशी शासन को ठहराया गया। तिलक ने रानाडे के सुधारों का विरोध किया ।

उनकी दृष्टि में इन सुधारों से समाज विभक्त होगा और इससे राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने में बाधा पहुँचेगी। जनता को एक करने के लिए उन्होंने गणेश पूजा की शुरुआत की। उत्तर भारत में आर्यसमाज के विरोध में सनातन धर्मावलम्बियों ने अपना स्वर बुलंद किया। इन विरोधी स्वरों के कारण सुधार का कार्य तो मन्द पड़ा किन्तु राष्ट्रीयगा को और अधिक बल मिला।

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