Jagannath-Das-Ratnakar

Jagannath Das Ratnakar Biography

जगन्नाथदास ‘ रत्नाकर’

बाबू जगन्नाथदास “रत्नाकर’ का जन्म सन्‌ 1866 में वाराणसी में हुआ । जाति के ये दिललीवाल अग्रवाल वैश्य थे । इनके पूर्वज पानीपत जिले के रहने वाले थे और अकबर के शासन-काल से ही उच्च सरकारी पदों पर नियुक्त थे। 

मुग़ल-साप्राज्य के फ्तन पर इनके प्रपितामह सेठ तुलाराम पहले जहाँदारशाह के साथ लखनऊ आए और फिर काशी में आकर स्थायी रूप से बस गए। इनके पिता बाबू पुरुषोत्ततददास फ़ारसी और हिन्दी कविता के बड़े प्रेमी थे । उनके यहाँ उस काल के शायरों और कवियों का आना-जाना बन रहता था। 

इन आने वालों में उनके समकालीन और सम्बन्धी भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र भी थे। जगन्नाथदास पर इस वातावरण का पूरा प्रभाव पड़ा  इन्होंने अपनी किशोरावस्था में ही भारतेन्दु का ध्यान आकृष्ट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया । सन्‌ 1892 में इन्होंने बी० ए० पास किया । 

इनके विषयों में एक फ़ारसी थी। पहले ये “’जकी’ तखल्लुस से उर्दू में गज़लें लिखा करते थे । बाद में ब्रजभाषा के प्रति ऐसा प्रेम उमड़ा कि ये अपने काल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाने लगे | हिंदी में इन्होंने अपना उपनाम ‘रलाकर’ रखा ।

सन्‌ 1900 में इनकी नौकरी अवागढ़ स्टेट में लगी । जहाँ ये दो वर्ष रहे । सन्‌ थी | पहले ये ‘जकी’ तखल्लुस से उर्दू में गज़लें लिखा करते थे। बाद में ब्रजभाषा के प्रति ऐसा प्रेम उमड़ा कि ये अपने काल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाने लगे | हिंदी में इन्होने अपना उपनाम ‘रलाकर’ रखा | 

सन्‌ 1900 में इनकी नौकरी अवागढ़ स्टेट में लगी । जहाँ ये दो वर्ष रहे । सन्‌ 1902 में अयोध्या नरेश सर प्रतापनारायण सिंह के ये प्राइवेट सेक्रेटरी हो मए । उनकी मृत्यु के उपरांत सन्‌ 1906 में अयोध्या की महारानी जगद॑बादेवी ने इन्हें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी नियुक्त किया । 

इस पद पर ये आजीवन रहे । स्वभाव से रत्लाकर’ जी बड़े सरल, रसिक और हँसमुख थे । व्यायाम के ये बड़े प्रेमी थे और वैद्यक में इनकी विशेष रुचि थी । “रलाकर’ जी ने “साहित्य सुधानिधि’ नामक मासिक-पत्र का संपादन कई वर्षों तक किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के कार्य-भार संभालने से पूर्व सरस्वती” के सम्पादक-मंडल में इनका भी नाम था। 

इन्होंने चंद्रशेखर के “हम्मीरहठ’, कृपाराम को ‘हित-तरंगिनी और दूलह कवि के “कंठभरण’ का संपादन किया । “बिहारी-रतल्नाकर” नाम से इन्होंने बिहारी सतसई” व; अत्यंत प्रामाणिक टीका प्रस्तुत की । ‘सूरसागर” के संपादन का काम भी इन्होंने प्रारम्भ किया था, जो इनकी मृत्यु के कारण अधूरा रह गया । “गंगावतरण” पर अयोध्या की महारानी से प्राप्त एक हजार रुपये की धन-राशि इन्होंने ब्रजभाषा काव्य पर पारितोषिक देने के लिए नागरी-प्रचारिणी सभा को भेंट कर दी | 

इस निधि के ब्याज से तीसरे वर्ष जो दो सौ रुपये का पारितोषिक दिया जाता है, उसका नाम ‘रलाकर-पुरस्कार”’ है । इसके अतिरिक्त अपना अमूल्य संग्रहालय भी इन्होंने सभा को दे दिया । 22 जून सन्‌ 1932 को हृदय की गति रुक जाने से हरिद्वार में इनका देहांत हो गया ।


इनके ग्रन्थों की सूची इस प्रकार है-

  • गंगावतरण, 
  • उद्धव-शतक, 
  • हरिशवंद्र, 
  • साहित्य-रत्नाकर, 
  • घनाक्षरी-नियम-रत्नाकर, 
  • समालोचनादर्श (अनुवाद) ।
  • हिंडोला, 
  • कालकशी, 
  • श्रीनगरलहरी, 
  • गंगाविष्णु-लहरी  रलाष्रक, 
  • वीराष्टक |

उद्धव शतक (1929) गोपी-उद्धव-संवाद पर आधारित एक प्रबंध-काव्य हैं इस प्रसंग को सूरदास और नंददास ने अपने प्रमर-गीतों में बहुत पहले उठाया था ‘रत्वाकर’ जी के अन्य का विषय तो वही पुराना है, पर प्रस्तुतीकरण में एक प्रकार की ताजगी और नूतन कला के दर्शन होते हे कृष्ण यमुना में स्तान करने जाते हैं । उसमें कहीं दूर से एक मुरझाया कमल बहता हुआ आता है । वे उसकी गंध लेने के लिए ठसे नासिका से लगाते हैं कि मूर्च्छित हो जाते हैं । शायद उसकी गंध राधा के शरीर की गंध की स्पमृति में उन्हें लीन कर देती है। 


संयोग से उद्धव हाथ में ठोते का पिंजड़ा लेकर उधर से निकलते हैं और उन्हें खींचकर तीर तक लाते हैं । तोता जब राधा का नाम लेता है, तब कृष्ण की चेतना लौटती है । दूसरे दिन उद्धव कृष्ण को देखने जाते हैं । उस समय वे अपने अंतर की व्यथा उन्हें रो-रोकर सुनाते हैं। लेकिन उद्धव तो थे विरक्त प्राणी । वे ब्रजवासियों की भावना को न समझते हुए, उन्हें स्वार्थी घोषित करते हैं और इस बात का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लेते हैं कि वे गोपियों को प्रेम-भाव से विरत कर सकेंगे । 

कृष्ण संदेश देकर उन्हें विदा करते हैं । ब्रज में पहुंचने पर गोपियाँ कृष्ण-सखा का स्वागत करती हैं और उनके ज्ञान के वचन सुनकर अपनी प्रतिक्रिया इस रूप में व्यक्त करती हैं—

जोगिन की, भोगिन की, ब्रिकल वियोगिन की,

जग में न जागती जमातें रहे जाहँगी।

कह ?लाकर! न सुख के रहे जो दिन,

तो ये दुख द्वद्वध की न रातें राहि जाहगी।

प्रेम-नेम छोड़े, ज्ञान-भ्ेम जो बतावत सो,

भीती ही नहीं तो कहाँ छातें रहे जाहँगी।

पाते रहे जाहोगी ने कान की कृपा तें इती,

ऊधषा कहिबे को बस बाते रहि जाहंगी।

परिणाम यह होता है कि उद्धव इस प्रेम के प्रवाह में बह जाते हैं। मथुरा लौटने पर वे कृष्ण के सामने हृदय की परिवर्तित दशा का निष्कपट भाव से वर्णन करते हैं, जिससे कृष्ण को आंतरिक संतोष होता है । “उद्धव शतक’ प्रेम की गंभीरता का उज्जवल प्रतीक है। गोपियाँ प्रेम के लिए प्रेम करती हैं। प्रेम के इस गौरव के सामने योग की शक्ति क्षण और उसके आलोक के सामने ज्ञान की आभा फीकी प्रतीत होती है । ,

“उद्धव-शतक’ में भी सूर के ‘भ्रमर गीत’ के समान ज्ञान के ऊपर प्रेम की विजय का प्रयल पाया जाता है | इसमें उद्धव ज्ञान के पक्ष में है, गोपियाँ प्रेम के पक्ष में । गोपियों के अनुसार ज्ञान का मार्ग कठिन है, वह युवतियों के स्वभाव के अनुकूल नहीं और उसमें व्यक्तित्व का विनाश हो जाता है । उनके तर्क भावना का आधार लेकर चलते हैं, अकः सरल होने पर भी, एक दृष्टि से अकाटघ है-

वे तो बस बसन रंगावे, मन्र रंगत ये,

भसम रमावे वे, वे आपु हीं भसम हैं ।

साँस-साँस माहिं बहु बासर बितावन वे,

इनके फ्रतेक साँस जात ज्यों जनम हैं।

हवैके जगमुक्ति सो विरक्त मुक्ति चाहत वे,

जानत ये प्रुक्ति-मुक्ति दोऊ विब्र-सम हैं ।

करिके विचार ऊधा-सू्ौँ मन माहिं लखो,

जोगी सो वियोग- भोग- भोगी कहाँ कम हैं?

उद्धव पर सबसे पहला प्रभाव ब्रज के वातावरण का पड़ता है। गोपियों के सम्पर्क में आकर तो उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे प्रेम की प्रतिमाओं के सामने ही बैठे हों । यों गोपियों के व्यंग्य बड़े तीखे हैं, पर सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, ये उनके इृदय की निश्छलता से । प्रेम के आवेग और उसकी अधीरता के चित्रण में कवि ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी है-

दीन दसा देखि ब्रज-बालनि की ऊषव को,

गरि गौर गुमान ज्ञान गौरव गृदने से।

कहे रलाकर/ न आए मुख बैन, नैन,

नीर भरि लाए. भए सक़ुचि सिहाने से।

सूखे से, समे से, सककक्‍के से, सके से, थके,

भूले से, प्॒रमे से, भभरे से, भकुवाने से ।

हाले से, हले से, हूले-हूले से हिये में हाय,

हारे से, हरे से, रहे हेरत हिराने से ।

“उद्धव शतक’ से 118 कवित्त पाए जाते हैं। सूरदास और नंददास की भाँति कथानक में अनुपात का ध्यान इन्होंने भी नहीं रखा है। रचना का रस भिन्न-भिन्न छंदों में उनकी उक्तियों तक सीमित है, पर गठन इसकी प्रबंध काव्य जैसी ही है । 

कथा के सूत्र बीच-बीच में शीर्षक देकर जोड़े गए हैं-जैसे मंगलाचरण, उद्धव का मथुरा से ब्रज जाना, उद्धव की ब्रजयात्रा, उद्धव का ब्रज में पहुंचना, उद्धव के ब्रजवासियों से वचन, उद्धव की ब्रज-विदायी उद्धव का मथुरा , उद्धव के वचन श्री भगवान के प्रति आदि । 

इनके वर्णनों में चित्रमयता विद्यमान है। अपनी बात समझाने के लिए गोपियों ने कहीं दर्पण, कहीं पिंजड़ा, कहीं लंगर, कहीं गठरी, कहीं पारे की भस्म और कहीं आतिशी शीशे का उल्लेख किया है । 

श्लिष्ट शब्दों का प्रयोग यहाँ-कहाँ हुआ है जैसे रस, नारी, योग, पाती, सुदर्श आदि | विरह के दुःख का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण है और कहीं-कहीं उसमें कृत्रिमता की झलक पायी जाती है, विशेष हरूप से वहाँ जहाँ ‘रत्वाकर’ जी ने सभी ऋतुओं को गोपियों के शरीर पर घटा दिया है, पर कुल मिलाकर यह ग्रंथ मार्मिक और कलापूर्ण बन पड़ा है ।

“गावतरण, (1923) में पृथ्वी पर गंगा के अवतरण को काव्यबद्ध किया गया है । इसमें कपिल के शाप से सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म होने तथा गंगा ड्रारा उनके उद्धार की कथा वर्णित है । भगीरथ घोर तपस्या करके ब्रह्मा को प्रसन्न करते हैं । उनके कमंडल से गिरे जल को शिव अपनी जटाओं में धारण कर लेते हैं। वे तब शंकर की आराधना में लीन होते हैं और उनसे वरदान प्राप्त कर उस पवित्र जल को हिमालय से समतल पर लाते हैं।

“गंगावतरण’ 13 सर्गों में समाप्त एक प्रबंध-काव्य है | इसके प्रारंभ में गंगा की स्तुति के उपरांत सरस्वती और गणेश की वंदना की गयी है और अंत की ओर इसकी समाप्ति की तिथि भी दे दी गयी है- संवत्‌ उनइस सौ असी गुरु पूनौ भूगवार, गंग-अववरन काव्य यह पून भयौ उदार । हिमालय से उतर कर प्रयाग होते हुए समुद्र तक गंगा की गति बैग का वर्णन बड़ा ओजस्वी और भव्य बन पड़ा है। उदाहरण के लिए विधाता के कमंडल से ब्रह्मद्रव के गिरने के इस वर्णन को लीजिए—

निकसि कमंडल तें उम्ंडि नभ-मंडल खंडति ।

धाई धार अपार बेग साँ बाहु बिहंडति । ।

भया घोर अति सब्द धमक साँ त्रिभुवन तरजे ।

महामेघ मिलि मनहु एक संगहि सब गरजे ।।

बिपुल वेग साौँ कबहुँ उमगि आगे का धावति ।

सौ-साँ जोजन ला सुढार ढरतिहि चलि आवति । ।

फटिकसिला के वर विसाल मन विस्मय बोहत ।

मनहु बिसद ढर अनाधर अंबर मैं सोहत ।।

छहरावति छवि कबहूँ कोऊ सित सघन घटा पर ।

फवति फ़ैलि जिमि जोन्ह-छटा हिम-प्रचुर-प्टा पर 1

तिहि धन पर लहराति लुराति चएला जब चमकै ।

जल-प्रतिबिंवित दीप-दाम दीप्ति सी दमकै ॥

हरिशंद्र’ में अयोध्या के महाराज हरिश्नंद्र का चरित्र वर्णित है। इसमें इंद्र नारद से हरिअंद्र की प्रशंसा सुन विश्वामित्र द्वारा उनके सत्य की परीक्षा लेते हैं । इस परीक्षा में महाराज पू उतरते हैं। हरिश्चंद्र के अतिरिक्त शैव्या और रोहिताश्व इसके प्रमुख पात्रों में से है । यह प्रबंधकाव्य चार सर्गों में ही समाप्त हो गया है । कथानक की दृष्टि से ‘हरिश्ंद्र’, ‘उद्धव-शतक’ तथा “गंगावतरण” की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित है । श्मशान का यह वर्णन देखिए-

कहूँ सुलगति कोउ चिता, कहूँ कोठ जाति बुझाई ।

एक लगाई जाति एक की राख बहाई।

विविध रंग की उठति ज्वाल दुर्गधनि महकति ।

कहुँ चरबी साँ चटचटाति कहूँ दह-दह दहकति । ।

कहूँ फूकन हित करयोँ म्रतक तुरतहि तहाँ आयी ।

परयौ अंग अधजरयाँ, कहूँ। कोऊ कर खाया । ।

कह स्वान इक अस्थिरखंड लें चाटि चिचोरत ।

कहूँ कारी महि काक ठोर सौं ठोेकि टटोरत । ।

कहूँ सगाल कोठ मृतक-अंग पर॒ ताक लगावत ।

कहूँ कोउ सब पर॒बैठि गिद्ध चट चोच चलाकत । ।

जहँ – तहँ मज्जा माँस रुधिर ललि परत बगारे ।

जित-तित छिटके हाड़ स्वेत कुक रक्‍नारे । ।

हरहरात इक दिसि प्रीपर पेड़ पुरातन ।

लटकत जामें घंट घने माटी के बासन

वरवा ऋतु के काज और हू लगत भयानक ।

सरिता बहति सबेग करारे गिरत अचानक /

‘समालोचनादर्श’ अलेक्जेंडर पोप के आलोचना-संबंधी काव्य-ग्रंथ का पद्चबद्ध अनुवाद है। यह अनुवाद ब्रजभाषा में होने से कुछ अस्पष्ट-सा प्रतीत होता है। खड़ी बोली अथवा गद्य में होने से संभवतः पाठकों को अधिक ग्राह्म होता । 

रतलाकर’ जी ने भारतीय रूप देने के लिए इसके बीच-बीच में वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति, भरत,जयदेव और हरिश्वंद्र आदि के नाम अपनी ओर से बढ़ा दिए हैं। फिर भी बात कुछ बन नहीं पायी । पोष के अनुसार समीक्षकों को अपनी सम्मति प्रकट करते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

सम्मति-दान माहि, कबहूँ न सूमपन ठानो,

कृपिनाइनि में बुद्धि-कृपितता अथम अमानों

छुद्र-तोष-हित,निज कर्तव्य कदापि न छोरोँ,

होहु न इमि सुसील, कै मुख न्यायहिं सौं मोरां ।

करहु नैक़ू भय नाहि बुधनि के क्षद्ध करन को ।

या अधिकार बिवेचक थारि सकै जौँ नित प्रति,

तो यम संसय नहिं होय जगत कौ हित अति ।

बाबू जगन्नाथदास ‘रत्नाकर ‘ खड़ी बोली के युग में ब्रजभाषा के सबसे बड़े कवि थे। भाषा-संबंधी उनका अध्ययन बड़ा विशाल था। ब्रजभाषा के प्रति अत्यधिक अनुराग के कारण पे रुचि पौराणिक कथाओं के नवीनीकरण की और  हुई . बीसवीं  शताब्दी  में  रहते  हुए  भी  हर्दय से  वे  मध्यकाल  में  रहते  थे .

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