Makhanlal-Chaturvedi

Makhan Lal Chaturvedi

माखनलाल चतुर्वेदी



माखनलाल चतुर्वेदी : होशंगाबाद के ऐसे कवि और पत्रकार जिन्होंने ठुकरा दी थी CM की कुर्सी

पं० माखनलाल चतुर्वेदी जी का जन्म सन्‌ 1888 में मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के अंतर्गत बाबई नामक स्थान में हुआ । जाति के ये ब्राह्मण हैं। इनके पिता का नाम पं० नंदलाल चतुर्वेदी और माँ का सुन्दरबाई था । 


पिता गाँव की पाठशाला में अध्यापक थे | पहले ये गाँव के स्कूल में प्रविष्ट हुए। मिडिल पास करने के उपरांत इन्होंने सन्‌ 1903 में नार्मल परीक्षा पास की और फिर सन्‌ 1904 में खंडवा मिडिल स्कूल में अध्यापक नियुक्त हो गए। 


सन्‌ 1912 में इन्होंने अध्यापन-कार्य से त्याग-पत्र दे दिया | सन्‌ 1914 में इनकी पत्नी ग्यारसीबाई का देहान्त हो गया, जिससे इनके हृदय को गहरा आघात लगा। उस समय ये पच्चीस-छब्बीस वर्ष के थे । अपने जीवन में इन्होंने तीन पत्रिकाओं-प्रभा, प्रताप और कर्मवीर-का संपादन किया है। कर्मवीर का प्रकाशन पहले सन्‌ 1919 में जबलपुर से हुआ । उस समय पं० माधवराव उसके संचालक थे । 

माधवराव जी की मत्यु के उपरांत सन्‌ 1925 में असुर्णेदी जी इसके स्वामी हो गए। इनका शव्यक्तित्थ इसी साप्ताहिक के माध्यम से प्रस्फुटित, पल्‍लवित और प्रतिफलित हुआ । इस पत्र ने इन्हें कवि, सम्पादक और राष्ट्र-सेवी के रूप में प्रतिष्ठित किया । माखनलाल जी पहले क्रांतिकारी दल के सदस्य थे, बाद में महात्मा गाँधी के अभाव में आए | अपने जीवन में ये लोकमान्य तिलक, गणेश-शंकर विद्यार्थी और माथवराज सप्रे से बहुत प्रभावित रहे हैं। 


स्वाधीनता-संग्राम के सम्बन्ध में इन्हें सन्‌ 1921, 1923 और 1930 में तीन जार जेल हुई । इनकी बहुत-सी कविताएँ कारागृह में लिखी गयी है। “एक भारतीय आत्मा” इनका दूसरा नाम है, जिसे इन्होंने अपनी राष्ट्रीय रचनाओं द्वारा सार्थक करके दिखा दिया है । इनकी प्रारंभिक रचनाएँ “प्रभा’ में प्रकाशित हुईं । लिखते तो ये द्विवेदी-युग से ही चले आ रहे हैं, पर प्रकाशन की ओर से बहुत ठदासीन रहे । 


यही कारण है कि इनका प्रथम कविता-संग्रह “’हिम-किरीटिनी” सन्‌ 1943 में उस समय प्रकाशित हुआ, जब दविवेदी-युग, छायावाद-युग और प्रगतिवाद-युग, तीनों समाप्त हो चुके।

पं० माखनलाल चतुर्वेदी त्याग और तपस्या की मूर्ति है। स्वभाव से वे स्पष्टवादी और स्वाभिमानी है। उनकी गणना हिंदी के श्रेष्ठतम वक्ताओं में होनी चाहिए ।

चतुर्वेदी जी की ‘हिम-किरीटिनी’ पर देव-पुरस्कार प्राप्त हो चुका है । सागर- विश्व-विद्यालय ने उन्हें आनरेरी डाक्टरेट प्रदान की है और राष्ट्रीय सरकार ने उन्हें सन्‌ 1963 में “पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया है ।

माखनलाल जी के निम्नलिखित काव्य-प्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं-

  • हिम-किरीटिनी 1943 ‘
  • हिम-तरंगिनी 1949
  • माता 1951
  • युग-चरण 1956
  • वेणु लो, गूंजे धरा 1960
  • मरण-ज्वार 1963

माखनलाल चतुर्वेदी ने जिस युग में लिखना प्रारम्भ किया, यह राष्ट्रीय-चेतना का युग था, जिन लोगों के सम्पर्क में ये रहे, उनकी नस-नस में राष्ट्र-प्रेम कूट-कूट कर भरा था । इस परिवेश में प्रभावित हो, इनकी आत्मा में जो स्फुरण हुआ, ठसने इन्हें वाणी से ही नहीं, कर्म से भी राष्ट्र-सेवी बना दिया । इन्होंने जो कहा, व्यवहार में उसे पूरा करके भी दिखा दिया। 


अपने देश-प्रेम के लिए ये विदेशी-सख्त के कोप-भाजन बने । कई बार इन्होंने जेल का कष्टमय जीवन व्यतीत किया । “कैदी और कोकिला’ इनकी अत्यंत प्रसिद्ध रचना है जिसमें जेल का वातावरण एकदम सजीव हो उठा है। 


रात के अंधकार में जब कोकिल कृक उठती है, तो राजनीतिक बंदी का दुःख और भी घनीभूत हो उठता है, पर क्योंकि वह दुःख अपने लिए नहीं, देश के लिए है, इसी से उसके अंतर में विद्रोह की भावना भी उसी मात्रा में तीब्र हो उठती है । कविता का आशावादी अंत भविष्य के प्रति कवि की आशावादी दृष्टि का परिचायक है | इस रचना का यह अंश देखिए-

फ़िर कुहू अरे क्या बंद ने होगा गाना?

इस अंधकार में मधुरा। दफनाना?

नम सीख चुका है कमजोरों को खाना,

क्यों बगा रही अपने को उसका दाना?

फ़िः भी करणा-गाहक बच्दी सोते हैं!

सएव्णों में स्मृतियों की बसे थोते हैं!

इन लोह-सीखनचों की कठोर पाज्ञों में,

क्या भर दोगी? बोलो न-िद्वित लाशों में!

क्या, घुस जायेगा रुदने तुम्हारा

निश्चासों के द्वारा?

कोकिल बोलो तो!

उलट-पुलट जग सारा ?

कोकिल बोलो तो !

इनकी राष्ट्रीय रचनाओं का विश्लेषण करने पर कई तत्व उभर कर सामने आते हैं । इनकी मूल वृत्ति देश-प्रेम है। कवि अपने देश को प्यार ही नहीं करता, उस पर गर्व भी करता है। इस प्रेम और गर्व की मिली-जुली अनुभूति के कारण उस पर अत्याचार करने वालों के प्रति उसके मन में आक्रोश की भावना है और उन्हें खुलकर ललकारने का साहस । 


यह निर्भीकता क्रूरता का पर्याय नहीं है | वीरता की यह भावना ठसे विद्रोह की ओर ले जाती है। इस विद्रोह में आत्म-दान की भावना है। कवि बीज के समान स्वयं मिटकर वृक्ष की हरी-भरी शाखाओं के समान जग के संतप्त प्राणियों को सुख देना चाहता है । 


इस विनाश में चिरंतन विकास के सूत्र हैं। इस प्रकार देश-प्रेम उसे वीर-भाव की ओर ले जाता है, वीर-भाव विद्रोह की ओर, विद्रोह आत्म-त्याग की ओर। हम चाहें तो कह सकते हैं कि माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रीय कविताएँ एक भिन्न ही प्रकार के प्रगतिशील तत्वों से ओतप्रोत है। 


इनकी राष्ट्रीय भावना पर लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी दोनों के सम्मिलित प्रभाव की छाया पड़ी है। इसी से ठसमें एक ओर आग है, दूसरी ओर त्याग । इसमें निर्भीकता, आवेश और विद्रोह्ठ के तत्व हैं, तो आत्म-दान, सेवा और शांति के भी। 


कुल मिलाकर इनकी रचनाओं का केन्द्रीय भाव उत्कट देशानुराग  है. राष्ट्रीय  भावना  का  विकास  इनकी  ‘घर  मेरा  है ‘ दुरगम  पथ’ और  विद्रोही! आदि रचनाओं में देखा जा सकता हैं इनके जीवन का आदर्श निम्नलिखित रचना में अत्यंत स्वच्छ रूप से प्रतिबिंबित हुआ है-

पुष्प की अभिलाबा-

चाह नहीं, में सुरबाला के गहनों में गूँवा जाऊँ।

चाह नहीं, ग्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं ।

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊं ।

चाह नहीं, देवों के सर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊ ।

मुझे तोड़ लेना बनमाली,

उस पफथ में देना तुम फ़ेंक,

मातू-भूमि पर शीक्ष | चढ़ाने,

जिस पथ जावें वीर अनेक ।

प्रेम-वर्णन में खी-पुरुष दोनों के इृदय का स्पंदन मिलता है | नारी के मन के रहस्थ का उदघाटन करते हुए उसकी भावनाओं के विकास का चित्रण यौवन के उन्माद और प्रणय के माधुर्य के सहारे किया गया है | मिलन के चित्रों में आनंद और उल्लास की सहज अभिव्यक्ति पायी जाती है। अन्य सभी कवियों के समान चतुर्वेदी जी भी प्रेम की सार्थकता, उसकी सफलता में मानते हैं । भेंट का एक चित्र लीजिए-

तुम मिले तो प्रणण पर छटा छा गई।

चुस्ननों, सॉक्ली-सी घटा छा गई।

एक युग, एक दिन, एक पल, एक क्षण-

गगन से उतर चंचला आ गई 

प्राण का दान दे, दान में आण ले,

अर्चा की अधर चाँदनी छा गई 

तुम मिले आरण में रागिनी छा गई!

इनकी प्रकृति भी स्पंदनशीला है। स्वतंत्र विषयों में इन्होंने संध्या प्रभाव एवं पतझ्नड़ बसंत आदि को लिया है, पर सबसे अधिक रचनाएँ बादल और वर्षा पर हैं । 


यह संभवतः इसलिए कि बादल निर्माण के प्रतीक हैं और यह बात इनकी लोक-हित की भावना के मेल में है | इनके प्रकृति वर्णन में कहीं उल्लास और विषाद की भावना है, कहीं करुणा और आकर्षण की, कहीं श्रृंगार और दिव्यता की । 


गंगा की विदा’ इनकी एक लंबी और विशिष्ट रचना है जिसमें गंगा को इन्होंने भौगोलिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सभी दृष्टियों से देखा है । 

इस रचना के दो छंद लीजिए-

(1)

शिवर-शिखर हिम-अश्वु गल रहे,

मलय पका धीमी सांसें,

बन-गर्ज में शोक भरा,

अंपड़ों… उमड़ती॑. निश्वापे,

बन-जीवन के सतन-सनन में,

गूंड। रही व्याकुल॒ वाणी

संभ्यापू॑ शृंगगय कर रहीं,

ऊषा तिलक किए मानी,

लहर लहर कर नि नदियाँ, उसके बल बेहाल चलीं।

अगम नगाधिराज मत रोढ़ो, बिटिया अब समुराल चली ।

(2)

ठहुम ऊंचे उठते हो रह-रह

यह नीचे को दौड़ी जाती,

तुम देवों से बतियाते, यह

प्‌. से मिलने को अढ़लाती,

रजत-मुकुट तुम धारण करते,

इसकी थारा, सब कुछ बहता,

हुम हो मौन विराट,

क्िप्र यह, इसका वाद रानी कहता,

तुमसे लिपट, लाज से सिमटी, लज्ञा-विनत निहाल चली ।

अगम नगाधिराज मत रोको, बिटिया अब ससुराल चली ।

इनके आध्यात्मिक विचारों का एक व्यवहार-पक्ष है। इनकी दृष्टि से ईश्वर रहस्यमय होने पर भी ठदार है और मनुष्य को प्रेम करता है । संसार में सौंदर्य की सृष्टि उसी ने की है, पर जहाँ आराधना का प्रश्न उठता है, वहाँ ये उसका रूप कुछ बदलना चाहते हैं। ये पूजा को सेवा से भिन्न नहीं मानते । कहीं-कहीं तो सेवा को अर्जना से श्रेहतर घोषित कर दिया है-

पूजा से कहो

कि सेवा के चरणों पर हो,

आनंद कि श्रम के

स्नेह- भरे करणों पर हो ।

कथ्य की दृष्टि से माखनलाल जी ने छायावाद-युग के विषय-राष्ट्रीयता, प्रेम, अध्यात्म और प्रकृति-चुने हैं, पर अभिव्यक्ति की आत्मा द्विवेदी-युग की है । अतः मैथिलीशरण गुप्त के समान उन्हें भी द्विवेदौ-युग का कवि समझना चाहिए । 

भाषा इनकी बहुत अनगढ़ है | उसमें हिंदी के तदभव और प्रादेशिक शब्दों, ब्रजभाषा के चलते शब्दों और ग्रामीण शब्दों का प्रयोग खुल कर हुआ है। सौंह, निगोड़ा, तलक, पिन्हाना, बिरमाना, अजी, आगे, ऊगों, दूख उठे, बोल उट्टे आदि यहाँ- वहाँ बिखरे पड़े हैं। 

फारसी-अरबी के शब्दों को ये निस्संकोच भाव से स्वीकार कर लेते हैं । जैसे हस्ती, खतरा, एहसान, कुरबानी, गुमराह, फरियाद, मासूम, दफनाना, नजर, ईप्रान आदि । 

अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए ये कभी-कभी ऐसी शब्दावली गढ़ते हैं जिससे विलक्षण चित्र आँखों के सामने आते हैं जैसे बोल का डोला, प्राण का झोला, क्षणों का डोल, नयन का बँगला, पलक की चिक । कहीं-कहीं इनकी कल्पनाएं अत्यधिक सीधी और सपाट हो गयी हैं जैसे-

(1).धरा  यह तरबूज है,

दो फ़ॉक कर दे ।

(2). चांदनी से दूध ब्नरता है .

पला, वे स्तन कहाँ हैं?

चतुर्वेदी जी की रचनाओं में ओज और कोमलता, आवेग और शांति उक्ति-वैचित्रय और लाक्षणिकता के एक साथ दर्शन होते हैं । संक्षेप में, वे प्रलय और प्रणय के कवि हैं ।

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