आधुनिक कविता

Modern Poetry


आधुनिक कविता

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य भाग से कविता एक नया मोड़ लेती है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म सन्‌ 1850 में हुआ । यह ऐसा वर्ष है जब रीति-काल समाप्त होता है और एक नया युग प्रारंभ । भारतेन्दु इसी से आधुनिक युग के जनक कहलाते हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राजनीति, धर्म, विज्ञान, शिक्षा, समाज, सभी क्षेत्रों में आन्दोलन के लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। इसी काल में सिपाही-विद्रोह हुआ, इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई, आर्य-समाज की नींव पड़ी, रेल, तार, डाक और सड़कों का जाल बिछा, विश्वविद्यालय खुले, जविधवा-वियाह, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह और स्त्री शिक्षा की समस्याओं पर गम्भीरता से विचार-विमर्श हुआ । 

इन फरिस्थितियों का प्रभाव उस युग के कवियों-भारतेन्दु हरिश्चंद्र, बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ और प्रत्पनारायण मिश्र-की रचनाओं पर पड़ा | देश में नवीन चेतना की लहर व्याप्त हो गयी है, इसका आभास उस युग के काव्य से स्पष्ट मिलता है ।

कविता की भाषा यद्यपि प्रमुख रूप से भ्रज ही रही पर उस युग के गद्य-उपन्यास, नाटक, आलोचना, निबंध-में खड़ी बोली को स्वीकार कर लिया गया । यह इस बात का संकेत था कि गद्य और पद्च दोनों की भाषा बहुत दिन तक भिन्न न रह सकेगी-किसी दिन एक हो जायेगी। आगे चलकर ऐसा ही हुआ ।


पिछले सौ वर्ष के हिन्दी-काव्य का काल-विभाजन हम इस प्रकार कर सकते है । 

  • भारतेन्दु-युग 1850-1900
  • दिवेदी-युग 1900-1915
  • छायावाद-युग 1915-1935
  • प्रगतियाद-युग 1935-1943
  • प्रयोगवाद-युग 1943-

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी एक ऐसे साहित्य-सेवी थे, जिन्होंने अपने युग के काव्य को गहराई से प्रभावित किया ।

सन्‌ 1903 से “सरस्वती” पत्रिका के संपादक के रूप में द्विवेदी जी ने हिंदी की अविस्मरणीय सेवा की । इसी से यह युग द्विवेदी-युग कहलाता है । इस युग की एक बहुत बड़ी विशेषता है-काव्य में खड़ी बोली का ग्रहण । राजनीति के क्षेत्र में इस युग में बंग- भंग के कारण स्वदेशी-आन्दोलन ने जोर पकड़ा ।

इसी युग में प्रथम महायुद्ध  आरंभ हुआ | धर्म में आर्य-समाज के अतिरिक्त ध्योसोफिकल सोसाइटी और रामकृष्ण मिशन आदि क्रियाशील रहे ।

कांग्रेस के सुधारवादी प्रयत्न चलते रहे । राज-भक्ति के स्थान पर देश-भक्ति कौ भावना कुछ तीत्र हुईं। अछूतों और किसानों की दीन दशा की ओर लोगों का ध्यान वेग से आकर्षित हुआ |

इन परिस्थितिये। से प्रभावित होकर इस युग के कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, गोपालशरण सिंह, गवाप्रसाद शुक्ल, ‘सनेही” और नाथुराम शंकर शर्मा आदि ने खड़ी-बोली-काव्य के विकास में महत्वपूर्ण योग दिया ।

सन्‌ 1915 से आधुनिक काव्य फिर एक नयी दिशा की ओर मुड़ता है और 1935 तक एक धारा में बंधकर चलता है | इस युग में भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र अथवा महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाँति कोई एक ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सब पर छा जाय और अन्य व्यक्ति उससे प्रेरणा ग्रहण करें ।

इसी से इस काल का नामकरण किसी व्यक्ति के नाम पर न होकर एक प्रमुख प्रवृत्ति के नाम पर हुआ है । बीस वर्ष के इस काल को छायावाद-काल कहते हैं ।

यह काल खड़ी-बोली- कविता का स्वर्ण-युग है । राजनीति के क्षेत्र में महात्मा गांधी का अवतरण इस युग को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण घटना है । इसी युग में असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलन चले, जिन्होंने आगे चलकर ब्रिटिश साप्राज्य की नींव हिला दी ।

लेकिन जिन कवियों के कारण यह युग प्रसिद्ध हुआ उनकी दृष्टि राजनीतिक से अधिक दार्शनिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी थी | गांधीवाद के वे समर्थक और पोषक तो अवश्य रहे, पर यह “वाद’अपनी सीमा में उन्हें बाँधकर नहीं रख सका ।

छायावाद के ये चार आलोक-स्तम्भ हैं-जयशंकर प्रसाद”, सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी वर्मा । सन्‌ 1935 से आगे के कुछ वर्ष प्रगतिवाद-युग के वर्ष हैं।

प्रगतियाद मार्क्सवादी दर्शन के आधार पर चलता है | ऐसा समझना चाहिये कि राजनीति में जो मार्क्सवाद है, काव्य में वही प्रगतिवाद । प्रगतिवाद मार्क्सवाद का साहित्यिक संस्करण है ।

यों इस वाद ने छायावाद और उत्तर-छायावाद-काल के कुछ कवियों को भी प्रभावित किया जैसे पंत, निराला, नरेन्द्र शर्मा और अंचल को, पर ये मूलतः कम्यूनिस्ट लेखक नहीं हैं । 

शुद्ध प्रगतिवादी कवियों के ही नाम हमें लेने हों तो हम नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह ‘सुमन” और गजानन माधव मुक्तिबोध आदि के नाम लेंगे । खेद की बात है कि इस काव्य का विकास जैसा होना चाहिए था, विशेष कारणों से, वैसा नहीं हो पाया ।

प्रयोगवादी काव्य का इतिहास तार सप्तक’ (1943) के प्रकाशन के साथ प्रारम्भ होता है । इस नये आन्दोलन का नेतृत्व श्री सच्चिदानन्द ‘अज्लेय” ने किया । तार सप्तक की परम्परा में उन्होंने दूसरा सप्तक (1951) और तीसरा सप्तक (1959) का संपादन कर इस प्रवृत्ति को बल प्रदान किया ।

प्रगतिवादी कविता पर जैसे मार्क्स का प्रभाव है, वैसे ही प्रयोगवादी कविता पर फ्रायड का । प्रयोगवादी कविता में भावना की अपेक्षा बौद्धिकता का प्राधान्य है। कहीं-कहीं तो यह काव्य आवश्यकता से अधिक बौद्धिक और शुष्क हो उठा है । जटिल भी यह कम नहीं ।

इस कविता के दुबोध होने का मुख्य कारण यह है कि कवि सामान्य भाव-बोध से संतुष्ट न होकर अवचेतन और अचेतन की गहरी अंधेरी घाटियों में उतरता है । कला की दृष्टि से प्रयोगवादी रचनाएं अब गद्य और बातचीत के स्तर पर उतर आयी है ।

अज्ञेय के अतिरिक्त इसके अन्य कवियों में कुंवरनारायण, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, लक्ष्मीकांत वर्मा, गिरिजाकुमार माथुर, वीरेन््रकुमार जैन और केदारनाथ सिंह आदि को समझना चाहिए ।

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के समानान्तर बहने वाली उत्तर-छायावाद-काल की एक और प्रवृत्ति है जिसे नया गीति-काव्य कह सकते हैं। इस धारा का आरंभ हरिवंशराय ‘बच्न’ से समझना चाहिए ।

छायावाद की अलौकिकता और सूृक्ष्मता के प्रति विद्रोह करने वालों में “बच्चन’ प्रमुख है । छायावाद की अति भावुकता, अशरीरी कल्पना और स्वणमय विचारों का अंत अकेले “बच्चन’ की मांसल भावना, ठोस कल्पना और व्यावहारिक विचार-पद्धति ने किया।

इस धारा के कवियों को हम नए गीतिकार इसलिए कहते हैं कि प्रगतिवादियों और प्रयोगवादियों की भाँति इन्होंने भी नए युग की नयी चेतना को आत्मसात्‌ किया । अपने क्षेत्र में इन्होंने नए विषय, नयी भावनाएँ, नए विचार और नयी अभिव्यंजनाएँ दीं।

“बच्चन’ के अतिरिक्त नए गीतकारों में नरेन्द्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, शंभूनाथ सिंह, सुमित्राकुमारी सिन्हा और गिरिधर गोपाल आदि ने बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की । 

बीसवीं शताब्दी पिछले नौ सौ वर्ष की तुलना में इसलिए भिन्न दिखाई देती है कि इसमें काव्य के विषय और टेकनीक दोनों में आमूल परिवर्तन हो गया। आधुनिक कविता में भाव और कला संबंधी इतने मौलिक परिवर्तन हुए कि सबका ठीक-से लेखा-जोखा लेना कठिन काम हो गया है ।

आधुनिक कविता में सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ प्रकृति-वर्णन के क्षेत्र में वीरगाथा-काल में प्रकृति प्रायः उपेक्षा का विषय रही । संतों और ये ने उसे आध्यात्मिक संकेतों के लिए ग्रहण किया ।

भक्तों ने उसे उपदेश और व्यंग्य का माध्यम बनाया । रीति-काल में उद्दीपप और अलंकरण के लिए उसे स्वीकार किया गया । आश्चर्य का विषय है कि जिस देश में प्रकृति का वैभव कण-कण में बिखरा पड़ा हो, वहाँ के कवि स्वतंत्र रूप से उसके सौंदर्य का वर्णन नहीं कर पाए ।

आधुनिक युग की विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति वर्णन’ का एक स्वतन्त्र विषय ही बन बैठा । मनुष्य से भिन्न उसकी स्वतन्त्र सत्ता घोषित हुई। आकाश, समुद्र, पर्वत, पृथ्वी, पक्षी, फूल, सरोवर, झरने, वर्षा, बसंत, पतझ्नर, ग्रीष्म, छाया, चाँदनी, उषा, संध्या आदि पर सैकड़ों कविताएँ लिखी गयीं । 

इस युग में प्रकृति को इतने रूपों में देखा गया, जितने रूपों में पिछले एक हजार वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं देखा गया था। सभी कवि प्रकृति-वर्ण की अपनी-अपनी विशेषताएँ लेकर आए ।

इनमें प्रकृति के रम्य दृश्यों के वर्ण के लिए पंत और उसके उपेक्षित सामान्य वर्णनों के लिए गुरुभक्तसिंह ने अपने-अपने क्षेत्र चुने । उपाध्याव जी सरल यथार्थवादी वर्णनात्मक दृश्यों तथा गुप्त जी और गोपालशरणसिंह ग्रामीण चित्रों के लिए प्रसिद्ध रहे |

प्रसाद और महादेवी की दृष्टि प्रकृति के वैभवशाली पक्ष पर अधिक रही । निराला ने प्रकृति के श्रृंगारी और विद्रोही रूप को चुना । यों इस युग के प्रायः सभी कवियों ने प्रकृति को चेतना से युक्त देखा है । दूसरा परिवर्तन प्रणय की भावना में दृष्टिगोचर हुआ ।

प्रेम में व्यक्तिवादी स्वर इतना तीव्र कभी नहीं हुआ था । वीरगाथा-काल में कवियों ने आश्रयदाताओं के प्रेम का वर्णन तो किया ई, पर अपने हृदय कौ चिन्ता करते वे नहीं दिखाई देते. भक्ति-काल में जीवन केवल पूजा का फूल बनकर रह गया ।

रीति-युग में भी अपने इृदय की बात कम कही गयी है-कही भी गयी है तो राधा-कृष्ण के प्रेम की ओट में, जिसका कहना न कहना बराबर है। व्यक्तिगत प्रेम की चर्चा भारतेन्दु और द्विवेदी-युग में भी नहीं के बराबर हुई |

लेकिन झयावादी युग के प्रारंभ होते ही व्यक्तिपरक रचनाओं की भरमार हो उठी । प्रसाद” के आँसू और पंत की “ग्ंथि’ प्रेम की पीड़ा की बड़ी तीखी पुकारें है। अपनी प्रिया को संबोधित “निराला” की स्फुट रचनाएं भी कम मार्मिक नहीं ।

ऐसी ही करुण मधुर कृतियाँ ‘बच्चन’ की “निशा निमंत्रण” सतरंगिनी’ और ‘मिलन-यामिनी’ है | इनके अतिरिक्त भगवतीचरण – वर्मा, रामकुमार वर्मा, नवीन, नरेन्द्र शर्मा, तारा पोडेय, अंचल, चन्द्रमुखी ओझा सुधा” और “नीरज” आदि की रचनाओं में प्रेम की अक्षय निधि रक्षित है। 

प्रयोगवाद के व्यापक प्रचार के बीच भी लौकिक प्रेम की पुकार कभी मंद नहींपड़ी । पत्र-पत्रिकाओं में प्रेम-संबंधी ऐसी मार्मिक रचनाएँ पढ़ने को मिल जाती हैं कि कभी तो इृदय-कमल की पंखुड़ियाँ एकदम खिल उठती है और कभी मन सहसा उदासी में डूब जाता है।

रूप और प्रतिभा के सम्पर्क से इन नवयुवक कवियों ने प्रेरणा ग्रहण कर काव्य का जो दान दिया है, आगे आने वाले युग में ही उसका उचित मूल्यांकन हो सकेगा ।

राष्ट्री- भावना का विकास जैसा इस युग में हुआ, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था । सिपाही-विद्रोह के शान्त होने पर देश में कुछ दिन शांति छा गयी थी, पर यह शांति ऊपरी थी | किसी भी देश के स्वतन्त्र-चेता कवि विदेशी शासन का समर्थन हृदय से नहीं कर सकते ।

हरिश्चंद्र-युग में इसी से राजभक्ति और देश-भक्ति साथ-साथ चलती है । धीरे-धीरे अंग्रेजी-शासन के प्रति असंतोष का स्वर तीव्र होता चला जाता है । द्विवेदी-युग में मातृभूमि के प्रति अनुराग स्पष्ट रूप से उमड़ता दिखाई देता है।

श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, मैथिलीशरण गुप्त आदि ने स्वदेश-वंदन में रचनाएँ लिखीं। सन्‌ 1921 में महात्मा गाँधी के देश की बागडोर संभालते ही देश प्रेम को एक दिशा मिली ।

देश में राष्ट्र-प्रेम की एक लहर उठी जिसमें प॑.  माखनलाल चतुर्वेदी, प॑० बालकृष्ण शर्मा ‘नीवन’, सुभद्राकुमारी चौहान और  सोहन  लाल  द्वेदी  ने  अपनी  साहस  वाणी  सुनाई. इनमे  गुप्त   जी , चतुर्वेदी  जी  नवीन जी तथा श्रीमती चौहान को जेल कौ करनी पड़ी |

आधुनिक युग एक प्रकार से वादों का युग है। बीसवीं शत्तब्दी में जिन साहित्यिक वादों का प्रचार हुआ, उनमें छायावाद, रहस्थवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद मुख्य है ।

छायावाद बीसवीं शताब्दी का सबसे विवादग्रस्त वाद हैं प्रारंभ में आधुनिक कविता का मजाक उड़ाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया । 

पर यह शब्द कुछ ऐसा प्रचार पा गया कि विशेष अर्थ का द्योतक बन बैठा । यही कारण है कि प्रारंभ में इसकी जो व्याख्याएं की गयीं, वे बहुत अनिश्चित ढंग की थीं। सबसे पहले इस शब्द से यह आशय ग्रहण किया गया कि जो समझ में न आवे, उसे छायावाद कहते हैं।

लेखकों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मनोविकारों पर लिखी गयी रचनाओं को छावावाद के अंतर्गत मानता था। मनोविकार एक तो वैसे ही सूक्ष्म होते हैं और जब उनकी अभिव्यक्ति व्यंजनात्मक शैली में की गयी, तो वे और भी दुर्बोध हो उठे । दुर्भाग्य से इस दुरूहता को छायावाद का लक्षण माना जाने लगा |

कुछ आलोचकों ने सूक्ष्म भावनाओं से युक्त समस्त आधुनिक-काव्य को छायावाद की संज्ञा दी । हिन्दी के कई आलोचक छायावाद को शैली का एक भेद मानते रहे ।

उनकी दृष्टि से केवल ऐसी रचनाओं को छायावद की संडा मिलनी चाहिए जिनमें अमूर्त उपमानों, लाक्षणिक प्रयोगों, चित्रमयी भाषा, अप्रस्तुत विधान और. प्रतीक शैली का आधिक्य हो। इन सारी व्याख्याओं को आगे चलकर अस्वीकार कर दिया गया |

छायावाद प्रकृति-वर्णन का एक प्रकार है। आधुनिक-युग में प्रकृति को एक नयी ही दृष्टि से देखा गया । कवियों ने उसकी स्वतल्र सत्ता घोषित की, उसके व्यक्तित्व को स्वीकार किया, उसे चेतन माना और इसके साथ ही उसे भावों के आदान-प्रदान के योग्य समझा ।

इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि प्रकृति में चेतना की अनुभूति को छायावाद कहते हैं । छायावाद में प्रकृत्रि के जीवन का चित्रण बिल्कुल वैसे ही होता है, जैसे सामान्य नर-नारी के जीवन का ।

जैसे छायावाद प्रकृति-वर्णन का एक प्रकार है, वैसे ही रहस्यवाद प्रेम-वर्णन का । व्यक्ति का प्रेम या तो लौकिक वस्तु के प्रति होगा या अलौकिक तत्व के अलौकिक में भी भावना या तो सगुृण का आश्रय लेकर चलेगी जैसे तुलसी और सूर की या निर्गुण का जैसे कबीर और जायसी की ।

अठः प्रेम जब ब्रह्म के प्रति व्यक्त होता है तो ठसकी संज्ञा रहस्यवाद होती है | इस प्रकार काव्य में आत्मा परमात्मा के पारस्परिक प्रणय-व्यापार को रहस्यवाद कहते हैं।

आधुनिक रहस्यवाद में ईश्वर की कल्पना कहीं पुरुष रूप में हुई है, कहीं नारी रूप में और कहीं उसे आलोक के रूप में भी देखा गया है ।

प्रवृत्तियों के अनुसार आज के  रहस्यवादियों को हम निम्नलित वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-

  • दार्शनिक रहस्थवादी– निराला ।
  • प्रकृतिमूलक रहस्थवादी– सुमित्रानंदन पंत ।
  • प्रणयमूलक रहस्यवादी– महादेवी, प्रसाद ।
  • विविध– रामकुमार वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन आदि ।

रहस्यवादी कवि का प्रेम एक ओर सामान्य प्रेम से भिन्न है, क्योंकि थह लौकिक के प्रति न होकर अलौकिक के प्रति होता है, वह भक्त की भावना से अवतार भिन्न है, क्योंकि वह किसी अवतार अथवा देवी-देवता के प्रति न होकर सृष्टि के संचालक के प्रति होता है, वह छायावादी प्रेम से भिन्न है, क्योंकि वह प्रकृति के प्रति न होकर, ब्रह्म के प्रति होता है और वह अध्यात्म-वृत्ति से भिन्न है, क्योंकि अध्यात्मवाद बुद्धि-व्यापार है, उसके लिए परम तत्व का प्रणयी होना-आवश्यक नहीं है ।

पीछे कह चुके हैं कि द्विवेदी-युग में काव्य के लिए ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को स्वीकार किया गया | भाषा के अतिरिक्त दूसरा परिवर्तन छंदों के क्षेत्र में हुआ |

चौपाई और वरवै को छोड़कर प्राचीन कवियों में दोहे, कवित और सवैयों की भरमार रही । कबीर, सूर और मीरा ने राग-रागिनियों के आधार पर पद्ध लिखे |

इधर इन छंदों का चलन बहुत कम हो गया | कवित्त-सवैयों को पकड़े रहने का आग्रह द्विवेदी-युग के कवियों में ठाकुर गोपालशरणसिंह में ही अधिक पाया जाता है ।

उपाध्याय जी ने संस्कृत के वर्ण वृत्तों में अपना प्रसिद्ध प्रबंध-काव्य ‘प्रिय-प्रवास/ लिखा । दूसरी ओर मात्रिक छंदों पर सबसे अधिक अधिकार श्री मैथिलीशरण गुप्त ने प्रदर्शित किया |

छायाबाद युग में प्रगीतों का अधिक प्रचार हुआ । गीति-काव्य के लेखकों में प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, रामकुमार, दिनकर, बच्चन और नरेन्द्र शर्मा को बड़ी ख्याति मिली ।

ग्राम्य गीतों की टेक और लय लेकर भी हमारे कुछ कवियों ने बहुत ही मधुर गीतों की रचना की है । इधर उर्दू गजलों और सिनेमा-संगीत का अशुभ प्रभाव हमारे कुछ नवयुवक कवियों पर पड़ता दिखाई दे रहा है ।

कोरे चमत्कार-विधायक अलंकारों का प्रयोग जान-बूझ्कर आज कोई नहीं करता । जो अलंकार स्वयं आ जाते हैं, उन्हें आ जाने दिया जाता है। अलंकारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति और समासोक्ति की अधिकता है।

आज की कविता में प्रतीकों का प्रयोग बहुत होता है। कवि बात सीधी न कहकर किसी प्रतीक के माध्यम से कहता है। इसके अतिरिक्त अमूर्त वस्तु को मूर्त रूप देने, शब्दों के लाक्षणिक प्रयोग करने, सूक्ष्म भावनाओं का मानवीकरण करने में बीसवीं शताब्दी का कवि विशेष रुचि रखता है ।

आधुनिक पर गीतों का युग अवश्य है, पर प्रबंधों की ओर से उपेक्षा हुई हो, ऐसी  बात  नहीं  है . प्रबंध  के  छेत्र  में  उपाध्याय  जी  का  प्रिय -प्रवास , गुप्त  जी  का  साकेत और प्रसाद की कामायनी खड़ी-बोली-काव्य की समृद्धि के परिचायक ग्रंथ हैं ।

नूरजहों नामक एक प्रेम-परक ऐतिहासिक प्रबंधकाव्य अत्यंत सरस शैली में गुरुभक्तसिंह ने लिखा | पं० श्यामनारायण पांडेय के दो प्रबंध-काव्य-हल्दीघाटी और जौहर-प्रकाशित हुए ।

दोनों राजपूत-काल से संबंध रखते हैं और वीर रस से सराबोर हैं। प्रबंध-काव्यों में इधर ‘दिनकर’ के कुरुक्षेत्र रामकुमार वर्मा के एकलव्य और “नवीन’ की उर्मिला को भी अच्छी ख्याति मिली |

खंड-काव्यों में प्रसाद का आँसू, निराला का तुलसीदास, पंत की ग्रंथि वथा गुप्त जी की पंचवटी ने भी पाठकों का ध्यान समय-समय पर आकर्षित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन सभी प्रबन्ध-काव्यों में आधुनिकता का पुट किसी न किसी रूप में विमान है । इन्हें पढ़कर लगता है कि ये बीसवीं शताब्दी की ही देन हो सकते हैं.

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