Ramnaresh Tripathi

Ram Naresh Tripathi Biography

रामनरेश त्रिपाठी

पं० रामनरेश त्रिपाठी का जन्म सन्‌ 1889 में जौनपुर जिले के कोइरीपुर ग्राम में हुआ | जाति के ये सरयूपारी ब्राह्मण थे। इनके पिता पं० रामदत्त त्रिपाठी रामचरितमानस के अनन्य प्रेमी थे। 


इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव कौ पाठशाला में हुई । पाठशाला के प्रधान अध्यापक ब्रजभाषा के कवि थे । उनकी प्रेरणा से ये भी ब्रजभाषा में समस्यापूर्ति करने लगे | खड़ी-बोली-कविता की ओर इनका झुकाव ‘सरस्वती’ पत्रिका के कारण हुआ । गाँव से ये जौनपुर चले गए । 


वहाँ के हाई स्कूल में इन्होने नवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की । सन्‌ 1908 में ये घरवालों को बिना सूचित किए कलकत्ता भाग गए । यहाँ इन्हें संग्रहणी के रोग ने आ घेरा । किसी सज्जन के समझाने पर ये मारवाड़ चले गए और शेखावटी के फतहपुर नामक नगर में रहने लगे । 


यहाँ ये रोग-मुक्त हो गए । यहीं इन्होंने हिंदी, संस्कृत, गुजराती और अँग्रेजी का अभ्यास किया । साहित्य-साधना और साहित्य सृजन का काम यहीं प्रारम्भ हुआ । |

सन्‌ 1915 में इनके पिता का स्वर्गवास हो गया । इसके उपरान्त ये प्रयाग चले आए । सन्‌ 1921 के असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण इन्हें डेढ़ वर्ष कारावास का दंड भोगना पड़ा । जेल से मुक्त होने पर प्रयाग में इन्होंन॑ प्रकाशन की योजना चालू की । 

इसके अनुसार सन्‌ 1924 में “हिंदी मंदिर प्रयाग’ की स्थापना की और सन्‌ 1931 में हिंदी मंदिर प्रेस” खोला । इसी वर्ष इन्होंने बच्चों के लिए “बानर’ नामक एक पत्र का संपादन प्रारम्भ किया ।

कुश्ती लड़ने और बागबानी करने के अतिरिक्त त्रिपाठी जी को तैरने का शौक था । बाबू श्यामसुन्दरदास का कहना है कि इन्होंने भारतवर्ष की प्रायः सभी बड़ी नदियों को तैरकर पार किया था । 

त्रिपाठी जी ने सुलतानपुर में अपना एक घर भी बनवा लिया था, लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में वे फिर अपने ग्राम कोइरीपुर में आकर रहने लगे ।

जरिपाठी जी के दो पुत्र हैं-आनन्दकुमार और बसन्तकुमार | इनमें से आनन्द का नाम इन्होंने ‘मिलन” में और बसंत का ‘स्वप्त’ में दिया है । 

बम्बई के नेवटिया परिवार से इनके घनिष्ठतम सम्बन्ध रहे हैं। श्री केशवदेव नेवटिया के साथ इन्होंने दक्षिण में श्री रामेश्वरम्‌ की यात्रा की और “नवनीत’ के संचालक श्रीगोपाल नेवटिया के साथ काश्मीर की | ‘परथिक’ में इन्होंने रामकुमार नेवटिया का नाम छिपा दिया है। 

उसकी “मधुर स्मृति” में इन्होंने स्वयं लिख! है-श्री रामकुमार नेवटिया का नाम भी ‘पथिक में है और वह प्रत्येक सर्ग के प्रथम अक्षर जोड़ने से निकलता है । त्रिपाठी जी ‘सरस्वती” पत्रिका की ‘हीरक-जय॑ती’ में सम्मिलित होने के लिए प्रयाग आये थे । 

तभी सुना गया कि वे अस्वस्थ हो गये हैं। सहसा 16 जनवरी 1962 को प्रातकाल 6 बजे “साहित्य-सम्मेलन’ के सत्यनारायण कुटीर में उनका देहान्त हो गया ।

बाल-साहित्य और विद्यार्थियों के लिए लिखी गयी रीडरों के साथ यदि सम्पादित कृतियों को भी सम्मिलित कर लिया जाय, तो इनके ग्रन्थों की संख्या चालीस के ऊपर बैठती है | 

‘रामचरितमानस’ के टीकाकारों में ये भी हैं । गोस्वामी जी के सम्बन्ध में बुलसीदास लसीदास और उनकी कविता’ शीर्षक से इन्होंने एक समीक्षा- ग्रन्थ प्रस्तुत किया रे इनकी विशेष ख्याति “कविता कौमुदी’ के सात भागों के संपादन के कारण हुई। 

इनमें से पहले दो भागों में चन्दवरदाई से लेकर सुभद्राकुमारी चौहान तक की रचनाएं संकलित हैं। सबसे अधिक परिश्रम इन्होंने ग्राम-गीतों के संग्रह में किया । 

इसके लिए ये पूरे पंद्रह वर्ष (1925-39) भारतवर्ष के गाँव-गाँव में घूमे । आज जो लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति की इतनी चर्चा सुनाई देती है, उसके मूल में त्रिपाठी जी की निष्काम साधना है ।

इनके  प्रमुख  काव्य  चार  है – 

  • मिलान , 
  • पथिक , 
  • स्वपन  और  
  • मानसी.

श्री रामनरेश त्रिपाठी के खंड-काव्य-मिलन, पथिक, स्वप्न- उनकी राष्ट्रीय चेतना के वाहक हैं। मिलन में एक विदेशी शासक ठसके क्रूर कर्मचारियों, इन कर्मचारियों के अत्याचारों, इन अत्याचारों से पीड़ित प्रजा की दीन दशा का वर्णन किया गया है । 


ये सभी बातें स्वतंत्रता पूर्व भारत पर लागू होती है । इसके उपरान्त इसके नायक आनन्दकुमार और उसकी पली विजया का देश में भ्रमण कर देशवासियों में जागृति उत्पन्न करने का काम भी महात्मा गांधी और उनके देश-भक्त नेताओं के कर्म के मेल में है। 


जनता में विद्रोह की भावना का उदय होने पर राजा-प्रजा के बीच युद्ध होता है जिसमें साधु की मृत्यु हो जाती है और विदेशी भाग जाते हैं। इस प्रकार देश को जो जय सन्‌ 1947 में मिली, ठसकी कल्पना तजरिपाठी जी ने अपनी अंतर्येतता से सन्‌ 1918 में ही कर ली थी | 

‘पथिक’ का कथानक कुछ जटिल है । इसका कर्मशील नायक देश की दशा से अवगत होकर राजा से मिलता है पर राजा उसकी बात पर ध्यान न देकर ठसे सभा से निकलवा देता है। 


अपने संदेश में विफल होने पर वह प्रजा से असहयोग करने की बात कहता है और तब राजद्रोह का झूठा लांडन लगाकर पथिक को प्राण दंड दे दिया जाता है । उसके पुत्र का वध करा दिया जाता है । 

उसकी पत्नी विष के ठस प्यालेको जो उसके पति के सामने रखा है, दौड़कर पी लेती है| गुरु समाधि लगाकर प्राण दे देते हैं । इस प्रकार इस काव्य-अन्थ में सभी प्रमुख पात्रों की मृत्यु करा दी गयी है। 

इस महान्‌ बलिदान का परिणाम शुभ होता है। इससे प्रजा ही नहीं, राज-कर्मचारी भी राजा से विरक्त हो जाते हैं और अन्त में उसे देश-निकाला दे दिया जाता है। 

देश में प्रजा के प्रतिनिधियों का शासन हो जाता है। “स्वप्न! में मातृभूमि पर विदेशियों के आक्रमण की कहानी कही गयी है। इसका नायक बसंत प्रारम्भ में तो विलासी और कायर प्रतीत होता है, पर अपनी पत्नी सुमना के प्रेम के कारण अंत में आक्रमणकारियों के प्रयत्त को विफल करके अनन्त यश काशी बनता है । 

राजा प्रसन्न होकर ठसे अपने स्थान पर सिंहासनासीन कर देता ह. इस प्रकार त्रिपाठी जी के तीनों खंड-काव्य राष्ट्रीय भावधारा से प्रभावित राजनीतिक चेतना के उज्जवल प्रतीक हैं । इनकी विचारधारा पर गांधी दर्शन का गहरा प्रभाव है | तीनों ही में आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान के कल्याणकारी प्रभाव को चित्रित किया गया है। 

तीनों का ही अंत मंगलमय है। कहने की आवश्यकता नहीं कि तीनों ही कहानियों कवि की मौलिक ठदभावना की परिचायिका है । “मिलन! का नायक और साधु-जो वास्तव में नायक का पिता है-पिलन नगर के निवासी हैं। 

साथ ही कहानी के अंत में नायक-नायिका का मिलन वन की उसी कुटी में होता है, जहाँ से बिछुड़कर वे देश-सेवा के काम में संलग्न हो गए थे, अत: इस कृति का नाम ‘मिलन’ ठीक ही रखा गया है। 

‘पथिक’ का नायक देश-सेवा का व्रत लेने के उपरांत एक वर्ष तक समस्त देश का भ्रमण कर उसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दशा का अध्ययन करता है । वह अपने समाज की दरिद्रता और दीनता तथा राजा के स्वार्थ, छल और कूटनीति से परिचित होता है । 

इस प्रकार पथिक के रूप में नायक के घर-घर घूमने के कारण इसका नाम भी सार्थक प्रतीत होता है । वैसे भी इसमें नायक का कोई नाम नहीं दिया गया । उसे केवल पथिक कहकर पुकारा गया हैं.

‘स्वप्म” के नायक बसंत की पत्नी की इच्छा है कि जैसे देश के अन्य युवक स्वतंत्रता के संग्राम में कूद पड़े हैं, वैसे ही उसका पति भी यदि देश-सेवी होता, तो वह गर्व का अनुभव करती । सुमना का यह स्व एक दिन सफल होता है। अकः यह कृति भी अपने नाम को सार्थक करती है ।

तीनों खंड-काव्यों में नायक-नायिका पति-पत्नी हैं, अतः इनमें दाम्पत्य-भाव का प्राधान्य है, स्वच्छन्द प्रेम का नहीं। ‘पथिक’ के प्रारंभ में गार्हस्थ्य-प्रेम और प्रकृति-प्रेम में संघर्ष दिखाया गया है, स्वप्न में पत्नी-प्रेम और देश-प्रेम में, पर मिलन में पति-पत्नी प्रारंभ से एक ही पंथ के पथिक हैं, 


अतः सांसारिक प्रेम और राष्ट्र-प्रेम का द्वन्द् मिट गया हैं ‘मिलन’ और ‘स्वण’ के अंत में नायक-नायिका दोनों का सुखद परिस्थितियों में एक बार फिर मिलन होता है पर “पथिक’ में दोनों की मृत्यु संघर्ष में हो जाती है। ‘

पथिक’ का नायक अपनी पत्नी से विरक्त है, ‘म्रिलन’ में प्रेम सम भाव का है, पर स्व” का नायक खैणता की सीमा तक अपनी पत्नी में आसक्त है। इनके खंड-काव्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि दाम्पत्य-जीवन केवल सांसारिक सुख-भाग के लिए नहीं है, उसका उपयोग किसी महत्वपूर्ण कर्म के लिए होना चाहिए । 


इन कृतियों में यह महत्वपूर्ण कर्म देश की सेवा है । बहुत संभव है त्रिपाठी जी का यह विचार अपने युग की परिस्थितियों से प्रभावित हो । तीनों नायिकाएँ अपने पतियों को अत्यधिक प्रेम करती हैं । तीनों सुंदरी और सती हैं । ‘पथिक’ को छोड़कर शेष दोनों खंड-काव्यों में पत्नियाँ अपने पतियों की बहुत बड़ी प्रेरणा रही है । 


प्रेम के महत्व का प्रतिपादन इन कृतियों में स्थान-स्थान पर मिलता है। ह प्रेम पवित्र, लोकोपकारी और ठदात्त है। इसके संबंध में कवि का कहना गंध-विहीन फूल हैं जैसे

बंद्रे चंद्रेका हीन,

यों ही फ़ौका है मनुष्य का

जीवन प्रेम-विहीन ।

प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है,

प्रेम अश्ंक अशोक,

ईश्वर का अतिनिंव प्रेम है,

प्रेम हृदय-आलोक ।

त्रिपाठी जी प्रकृति-प्रेमी जीव थे । उनके इस प्रकृति-प्रेम का परिचय इन खंड-काव्यों से भी मिलता है। ‘मिलन’ के दम्पति संसार के कोलाहल से दूर वन में कुटी बनाकर रहते हैं । लोक-सेवा करने के उपरांत वे फिर उसी बन की ओर लौट जाते हैं। ‘पथिक’ में दक्षिण भारत के प्राकृतिक वैभव का चित्रण है-विशेष रूप से समुद्र की विशालता और गरिमा का।


 ्वण’ में कवि ने हिमालय और काश्मीर के दर्शन कराये हैं। अपने पात्रों का स्वभाव ठसने ऐसा रखा है कि वे देश के एक कोने से दूसरे कोने तक घूमकर उसका परिचय प्राप्त करते हैं। इस बहाने पर्वतों, वनों, झरनों, नदियों, झीलों, खेतों, ठद्यानों और पश्चियों का वर्णन स्वतः हो गया है । दो चित्र देखिए–

(1)

प्रतिक्षेण. नूतन वेश बनाकर रंग-विरंग. निराला ।

रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद माला ।

नीचे नील सम्रद्र मनोहर ऊपर नील गयन हैँ ।

घन पर बैठ ग्रीच में विचरू यही चाहता मन हैँ।

निकल रहा है जलनिधि-तल पर दिनकर-बिंब अधूरा 

कमला के कंचन-मंदिर का मानों कांत कँगूरा 

लाने को निज पृुण्य-भूमि पर लक्ष्मी की असवारी ।

रलाकर ने निर्मित कर दी, स्वर्ण सड़क अति प्यारी ।

(2)

इंद्र-पनृ्क॒ खेला करता है

झरनों से हिलमिलकर  दिन- पर, |

तृत्त नहीं होते हैं दृग यह

दृश्य देख अनिमेष अवनि प्र,

होगा है इस नील झील में

श्यामा का आगमन सुखद अति,

‘ जलक्रीड़ा. करते. हैं. तारे

लहरें लेता है… रजनीपति ।

प्रकृति की सुषमा के दर्शन से कवि का हृदय उदात्त भावनाओं से पूर्ण हो जाता है और उसके अन्तर में आध्यात्मिक भावों का स्फुरण होने लगता है । प्रकृति की व्यापक क्रीड़ा में उसे परम तत्व का आभास मिलने लगता है, अतः ‘स्वण’ के दूसरे सर्ग की कुछ पंक्तियों पर रहस्यवाद का प्रभाव समझना चाहिए | 


उदाहरण के लिए इन पंक्तियों को लीजिए-

घन में किस प्रियक्म से चफला

करती है विनोद हँस-हंस कर ?

किसके लिए उवा उठती है

प्रतिदित कर जुगार मनोहर?

मंजु मोतियों से प्रभात में

तृण का मरकत सा सुन्दर कर,

भरकर कौन बढ़ा करता है

किसके स्वागत को. प्रतिवासर

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की कृपा से हिंदी में एक शब्द चल पड़ा है- स्वच्छ॑दतावाद | यह शब्द अंग्रेजी के ‘रोमांटिसिज्म का अनुवाद है। अंग्रेजी साहित्य में रोमाँटिक-युग 1780 से 1832 तक माना जाता है | इसके प्रमुख कवि हैं-वर्ड्सवर्थ, कॉलरिज, बायरन, शेली, कीट्स । 


रोमांटिसिज्म की मुख्य विशेषता है कल्पना का विस्तार | इसके अंतर्गत ऐसी प्रवृत्तियाँ आती हैं जैसे प्रकृति के प्रति आसक्ति, मानवता के प्रति प्रेम, सृष्टि के क्रिया-कलापों के प्रति रहस्य की भावना, विद्रोह की वृत्ति, सौंदर्य और प्रेम के प्रति सूक्ष्म दृष्टि एवं आदर्शवाद का पालन | 


खड़ी बोली में इनमें से कुछ प्रवृत्तियाँ श्रीधप पाठक की कविता में लक्षित हुई । रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में तो ये सभी प्रवृत्तियाँ कम अधिक मात्रा में पायी जाती हैं । इन्हें सबसे अधिक दृढ़ता से अपनाया श्री सुमित्रानंदन पंत ने । श्रीधर पाठक और रामनरेश त्रिपाठी ने एक प्रकार से छायावाद के लिए भूमि तैयार डी । यही कारण है कि इन दोनों की गणना स्वच्छंदतावाद के प्रवर्तकों में होती।

“त्रिपाठी जी के खंड-काव्यों में कल्पना और भावुकता का अद्भुत योग पाया जाता है । ये उदात्त भावनाओं के पुंज हैं। वीर, करुण, श्रृंगार और शांत रस के ये अनुपम झरने हैं। पराधीन देश के नवयुवकों को जागरण का संदेश देने और नवजीवन का संचार करने में ये रचनाएँ सदैव समर्थ रहेंगी। 

इनकी गणना सदाचार और देश-प्रेम का संचार करने वाली सफल कृतियों में होनी चाहिए । त्रिपाठी जी के तीनों खंड-काव्यों का एक ऐतिहासिक महत्व है। खेद की बात है कि इस महत्त्व को असंदिग्ध रूप से अभी तक किसी ने स्वीकार नहीं किया ।

‘म्रानसी’ इनकी स्फुट कविताओं का संकलन है। इसमें कुछ कविताएं तो उन्हीं विषयों पर है जिन्हें इन्होंने अपने खंड-काव्यों में मार्मिक कथाओं के चारों ओर गृंथा है जैसे प्रेम, प्रकृति, अध्यात्म और राष्ट्रीय । पर इन विषयों की कुछ नयी प्रवृत्तियों इसमें उभरी हैं । प्रबन्ध-काव्यों की अपनी एक सीमा होती है । वह सीमा स्फुट रचनाओं में टूट जाती है। 

अध्यात्म के अंतर्गत कुछ रचनाएं ऐसी हैं जिन्हें शुद्ध प्रार्थना कहा जा सकता है जैसे-हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए । एक समय था जब गाँवों की पाठशालाओं में इस प्रार्थना की धूम थी। अन्य रचनाओं में अध्यात्म और मानवता की सीमा-रेखाओं को मिला दिया गया है | कवि की दृष्टि से मानव-जाति की सेवा ही सच्ची ठफासना है | ईश्वर के इस उद्देश्य को जो नहीं समझता, उसकी पूजा व्यर्थ हो जाती है-


में दूँढ़गा तुझे था जब कुज्ज और बन में।

तू खोजता मुझे था तब दीन के कतन में॥

। आह वन किसी की मुझको एकारता था।

था तुल्ले बुलाग संगीत में, भजन में॥

बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू।

आँखें लगी थीं मेरी तब मान और धन में ॥

तू रूप है किस में, सौंदर्य है सुमन में।

तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में ॥

तू ज्ञान हिंदुओं में, ईमान, मुस्लिमों में।

तू प्रेम क्रिश्चियन में, है सत्य तू सुजन में॥

त्रिपाठी जी प्रतिभा न जानें क्यों फुटकर रचनाओं में वैसी नहीं खिल पायी जैसी प्रबन्ध के क्षेत्र में, यही कारण है कि इस संग्रह. की जिन कविताओं में कला- तत्व प्रमुख हो ठठा है, उनका समन्वित प्रभाव काफी गहरा पड़ता है। विधवा का दर्पण” और “पाँच सूचनाएँ, ऐसी ही दो आख्यान-परक रचनाएं हैं। पहली रचना में दर्पण के माध्यम से उस दुखिया की कहानी सुनायी गयी है जिसका पति राष्ट्रपति की पुकार पर देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे देता है। 


दूसरी रचना में सुखदास और काल के बीच वह प्रसिद्ध वार्तालाप चलता है जिससे जीवन के वास्तविक लक्ष्य पर प्रकाश पड़ता हैं। सामान्य विषयों पर इनकी सूझ बहुत अच्छी है | ऐसे विषयों में मनुष्य नारी, मित्र, आँख, आँसू आदि हम ले सकते हैं। मनुष्य के संबंध में इनकी धारणा देखिए-

बक-सा छली है कोई, गाय-सा सरल कोई,

चूहे-सा चतुर कोई, मूढ़ कोई खसतसा।

काक-सा कुटिल, मधुमक्खी-सा कृपण कोई,

मोर-सा गुमानी, कोई लोभी मधुकर-सा ।

धान-सा खुशामदी, कबूकर-सा प्रेमी कोई,

स्वार-सा है भीर, कोई वीर है बबर-सा।

कैसा है विचित्र यह मानव-समाज, कोई.

तेज तविकली-सा, कोई सुस्त अजा-सा ।

इनकी विचार-प्रधान रचनाएँ जीवन के सामान्य अनुभव को व्यक्त करती है  इनमें से बहुत-सी उपदेश-परक हो गयी है | मध्यकालीन कवियों के समान इन्होंने भी बहुत-से नीति के बचन कहे हैं जिनमें से कुछ तो प्रभावशाली बन पड़े हैं, पर कुछ सूक्तिमात्र बनकर रह गए हैं। 


इनमें से कुछ तो संस्कृत के श्लोकों का अनुवाद प्रात्र हैं जैसे-

(1)

स्थान- प्रष्ट कुलकामिनी, ब्राह्मण, सचिव, नरेश ।

ये शोभा पाते नहीं, नर, नख, रद, कुृच, केश ।

(2)

जल न पतन स्कक्‍्यं करती नदी,

फल न पादप हैं चखते स्वयं ।

जलद सस्य स्वयं चरते नहीं, ‘

सुजन-वैभव अन्य-हितार्थ है ।

फुटकर रचनाओं में जो नयी प्रवृत्ति उभरी है, वह है हास्य-व्यंग्य की । त्रिपाठी जी विनोदी व्यक्ति थे | पर्वत-प्रदेश के दिव्य सौंदर्य से वे अभिभूत हुए थे, इसका प्रमाण उनका स्वण खंड-काव्य है। पर वह एक कवि की स्वण-दृष्टि थी । 


जब उन्होंने भावुकता को परे फेंक वहाँ के दृश्यों को खुली आँखों से देखा तो जीवन का यथार्थ कुछ और ही रुप में दिखाई दिया । “कश्मीर” और “मसूरी’ शीर्षक रचनाएँ उनकी इसी यृत्ति की परिचायिका है। आधुनिक सभ्यता की विषमता से उत्पन्न वहाँ के जीवन का चित्रण उन्होंने बिना हिचक के किया है । 

“काश्मीर’ के व्यापारी का यह चित्र देखिए-

रौबदार चेहरा, खिजाबदार मूँछ और

आँखे चतुराडमरी, कान बहुश्गु॒त हैं।

बातें पूछने से सीधा उत्त कभी न देते,

पर मुँह देख-देख हँसते बहुत हैं।

बहरे नहीं हैं, पर गहरे बड़े हैं,

मनमोहने की तरकीब जानते अयुत हैँ ।

कारमीर आबे, तब भूल नहीं जावे,

यहाँ लाला जी भी देखने की चीज अद्भुत है ।

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