History of modern hindi and Westernization of education
History of modern hindi and Westernization of education

History of modern Hindi and Westernization of education

शिक्षा का पश्चिमीकरण
आधुनिक हिंदी का इतिहास


अंग्रेजी राज्य की स्थापना और आर्थिक परिवर्तनों के संदर्भ में जीवन की नई समस्याएँ पैदा हुई। इन समस्याओं से जूझने के लिए नए दृष्टिकोणों की आवश्यकता पड़ी | कहना न होगा कि नई शिक्षा प्रणाली द्वारा जो ज्ञान-विज्ञान उपलब्ध हुआ उससे बहुत सहायता मिली । १६वीं शताब्दी के अन्त में इस देश को जिस पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के संपर्क में आना पड़ा वह भारत के ज्ञान-विज्ञान से प्रकृति में ही भिन्न था।

भारतीय ज्ञान गतानुगतिक और परंपराभुक्त हो चला था। पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान नए जीवन संदर्भों की ताजगी लिये हुए था। भारतीय ज्ञान-विज्ञान का लक्ष्य आध्यत्मिक और पारलौकिक था तो पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान का लक्ष्य भौतिक और इहलौकिक। इस देश की विधा वर्ग या जाति विशेष तक सीमित थी पर पाश्चात्य विद्या सर्वतुलभ थी। फिर भी ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में इस देश ने अभूतपूर्व प्रगति की थी। दर्शन, ज्योतिष, गणित, औषधि, विज्ञान, धर्मशाख्र, काव्यशास्त्र, व्याकरण आदि में इसकी जोड़ का कोई अन्य देश नहीं था।

पर अब उन्हीं को दुहराया जा रहा था, नई उद्भावनाओं का मार्ग अवरुद्ध हो चला था! वेदादि की आप्तता, वर्णाश्रम धर्म की श्रेष्ठठा, इहलौकिक के प्रति अनासक्ति भाव यथास्थति बनाये रखने के पक्षधर थे। नई परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता के आगे प्रश्न चिन्ह लग गया था।
मुसलमानों में भी उसी प्रकार की गतानुगतिकता घर कर गई थी। मैकाले ने दोनों की शिक्षा-पद्धतियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है– “हिन्दुओं और मुसलमानों की शिक्षा-पद्धतियों में बहुत कुछ समानता थी।”

वे उस भाषा में शिक्षा देते थे जो जनता की भाषा नहीं थी। उनकी शिक्षा का मूलस्नोत धर्म था और उसकी आप्तता अपरिवर्तनीय थी। वे नए अभिनिवेश और परिवर्तन के विरुद्ध थे–“इस प्रकार की शिक्षा-पद्धति अपने धर्म के प्रति कट्टरता की भावना ही पैदा कर सकती थी।
इनके द्वारा स्वतंत्र व्यक्तिव और विवेक सम्मत (रेशनल) वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण संभव नहीं था।

आधुनिक शिक्षा-पद्धति का समारंभ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। आधुनिक होने की दिशा में यह एक गत्यातक प्रयल माना जायगा। आधुनिक शिक्षा प्रणाली के प्रसार में मुख्यतः तीन शक्तियों का योगदान है–१. ईसाई मिशन, २. अंग्रेज सरकार और ३. व्यक्तिगत प्रयास | ब्रिटिश राज्य की स्थापना के पूर्व ईसाई मिशन, दक्षिण भारत में, धर्म-प्रचार के कार्य में लगे हुए थे। नई शिक्षा से उनका कोई संबंध नहीं था।

प्लासी युद्ध के बाद सन्‌ 1758 में डेनिश मिशन कलकत्ता आया। परन्तु इसका क्रिया-कलाप भी सीमित रहा। 1893 में मिशनरियों का दूसरा महत्त्वपूर्ण दल कलकत्ते पहुँचा। कैरे और उनके दो सहयोगियों ने, जो उस मिशन से सम्बद्ध थे, नए बंगाल के निर्माण में महत्त्व की भूमिका निभाई।
बंगला गद्य की नींव डालने वाले लोगों में कैरे भी है। सन्‌ 1813 में कंपनी ने एक नया चार्टर स्वीकृत किया। इसके अनुसार शिक्षा आदि उपयोगी काम के लिए अनुदान देने की व्यवस्था की गई। इस चार्टर के बाद आने वाले मिशनरियों में अलेक्जेंडः डफ का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है।
कंपनी के अधिकारियों पर डफ का विशेष प्रभाव था। डफ धर्म-प्रचार का कार्य अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार द्वारा करना चाहता था।

डफ को धर्म-प्रचार के कार्य में तो सफलता प्रायः नहीं ही मिली पर इसी बहाने अंग्रेजी शिक्षा देने वाले बहुत से स्कूल-कालेज खुल गए। इंसाई मिशनरियों ने जो कुछ कार्य किया उसके पीछे न तो कोई आध्यालिक प्रेरणा थी न अनुग्रह की भावना | वे ईसाई धर्म-प्रयार में लगे हुए थे।
अपने धर्म के प्रचारार्थ उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्मों पर निस्संकोच आक्रमण किया, उनकी निन्दा की। प्रत्येक मिशन स्कूल में ईसाई धर्म की शिक्षा अनियार्य थी।

उनका विश्वास था कि प्रत्येक अध्यापक विज्ञान और गणित पढ़ाते हुए प्रकारान्तर से भारतीय धर्मों को तोड़ने में मदद करता है। पर आँकड़ों से जाहिर है कि बहुत कम लोग ईसाई धर्म की श्रेष्ठता से प्रभावित होकर उसमें दीक्षित हुए। जिन लोगों ने उस धर्म को स्वीकार किया उन लोगों को प्रेरणा देने वाली वस्तु धर्म की श्रे्ठठा नहीं, अर्थ की श्रेष्ठठा थी। फिर भी मिशनरियों के अपने काम ने भी भारतीय भाषाओं को गद्यशैली दी।

भारतीय भाषाओं (हिन्दी, बेंगला, मराठी, गुजराती आदि) की गद्यशैली अत्यंत आरंभिक स्थिति में थी। जनता में धर्म के प्रधारार्थ मिशनरियों को उसकी जरूरत महसूस हुई।
कैरे, ब्राउन, नेवलिन, स्किनर, बैले आदि ने भारतीय भाषाओं में बाइविल का अनुवाद किया। स्कूलों में पढ़ाने के लिए उन्हें पाठ्य पुस्तकें भी लिखनी पड़ी। भारतीय धर्म, पुराण आदि को भी उन्होंने विवरणात्मक गद्य में प्रस्तुत किया। ख्री शिक्षा के प्रसार में भी उनका महत्त्वपूर्ण योग है।
सरकारी प्रयास अपनी विकृतियों के बावजूद मिशनरियों ने लोगों को अंग्रेजी शिक्षा की ओर आकृष्टकिया। कई दृष्टियों से इसकी उपयोगिता सिद्ध हो रही थी।

इस भाषा के माध्यम से अंग्रेज व्यापारियों से विचार-विनिमय में सुविधा होती थी। अंग्रेजी जानने बाले लोगों को विदेशी फर्मों और कंपनी के प्रशासन में नीकरी पाना सरल था। १७६५ से १८१३ ई० तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ भी नहीं किया | किंतु वारेन हेस्टिंग्न को मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए कलकत्ता मदरसा (१७८०) खोलना पड़ा।

इसी प्रकार बनारस के रेजीडेंट ने सन्‌ १७६१ में बनारस संस्कृत कालेज की नींब डाली। कलककत्ते का फोर्ट विलियम कालेज (१८०१) मुख्यतः कंपनी के सिविल सर्वेट्स को अंग्रेजी शिक्षा देने के लिए खोला गया। किन्तु यहाँ के अध्यापकों से देशी भाषा में पादूय.. पुस्तकें, कोश और व्याकरण तैयार करने का काम भी लिया गया। इस कालेज की मुख्य देन यह है कि इसके द्वारा भारतीय भाषाओं में गद्य-लेखन को प्रोत्साहन मिला।

कलकत्ता मदरसा और बनारस संस्कृत कालेज की स्थापना से अंग्रेज विद्वान प्राध्य भाषा में अभिरुचि लेने लगे। विलियम जोन्स ने संस्कृत के लिए बहुत कुछ किया। पर संस्कृत और अरबवी-फारसी की शिक्षा का रोजी-रोटी से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था। इसलिए प्रगतिशील विचारक इसके पक्ष में नहीं थे। किंतु युद्धों में उलझे रहने के कारण १८२३ तक कंपनी इस दिशा में कुछ नहीं कर सकी। सन्‌ १८२३ में कंपनी ने कलकत्ते में एक लोक-शिक्षा-समिति संघटित की |

लोक-शिक्षा के सम्बन्ध में इस समिति को सुझाव देना था। इस समिति में दो विचारधाराओं के लोग थे। एच०एच० बिल्सन और एच० टी० प्रिन्सप प्राष्य भाषाओं के समर्थक थे। इन्होंने कलकत्ता के मदरसे और बनारस के संस्कृत कालेज का पुनर्गठन किया। १६८२४ में कलकत्ता एजूकेशन प्रेस की स्थापना हुई। इस प्रेस से संस्कृत और अरबी की पुस्तकें छपने लगीं।

पर थेंथम के शिष्य जेम्स मिल के निर्देशन में काम करने वाले डाइरेक्टर कोर्ट के लोग और ईसाई मिशनरियों में विशप हरबर और अलेक्जेंडर डफ जैसे व्यक्ति थे।राजा राममोहन राय ने लार्ड एम्हर्स्ट को पत्र लिखते हुए कलकत्ता संस्कृत कालेज की स्थापना का विरोध किया। उन्होंने लिखा कि व्याकरण की वारीकियों और वेदान्त, मीमांसा, न्याय को कंठस्थ करने में नवयुवकों के एक दर्जन वर्ष नष्ट करना अच्छा नहीं है। इससे वे समाज के अच्छे सदस्य नहीं बन सकते।

इन विषयों के स्थान पर उन्हें प्राकृतिक विज्ञान, रसायनशाख्र, गणित आदि की उपयोगी शिक्षा देनी चाहिए। सन्‌ १८३४ में जब मैकाले भारत पहुँचा तो प्राच्य शिक्षा विरोधियों को काफी बल मिला ।
मैकाले संस्कृत कालेज और अरबी-फारसी मदरसों के विरुद्ध धा। उसका सुझाव था कि इनको बन्द कर दिया जाय। अंग्रेजी भाषा की प्रशंसा में उसने लिखा है–” हमारी भाषा पश्चिमी भाषाओं में सर्वोत्तम है।

जिसे इस भाषा का ज्ञान प्राप्त है उसे संसार के अपार ज्ञान भंडार की उपलब्ध हो सकती है। बहुत कुछ संभावना है कि यह पूर्व के समुद्रों की वाणिज्य भाषा बन जाय।” लार्ड वेन्टिंक ने मैकाले का प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया। संस्कृत और अरबी-फारसी को दिए जाने वाले अनुदान तो बन्द नहीं किए गए पर प्राच्य विद्या के विधार्थियों को जो छात्रवृत्ति मिलती थी वह समाप्त कर दी गई और संस्कृत-अरबी-फारसी की पुस्तकों का छपना रोक दिया गया।

आकलैण्ड को यह स्थिति स्वीकार नहीं थी। उसने संस्कृत-अरबी-फारसी पुस्तकों का छपना जारी कर दिया। पर वेन्टिंक की पाश्चात्य शिक्षा की संस्तुति उसे ज्यों की त्यों मान्य थी। इस समय दो प्रश्न प्रमुख रूप से सामने आए–शिक्षा का माध्यम और जनता में शिक्षा का प्रचार-प्रसार ये दोनों प्रश्न देश की संस्कृति, राजनीति और समाज के साथ व्यापक रूप से जुड़े हुए थे।

शिक्षा के माध्यम के संबंध में तीन विकल्प थे–पहला यह कि माध्यमिक और विश्वविद्यालय की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो, दूसरा यह कि संस्कृत, अरबवी-फारसी हो और तीसरा यह कि योलचाल की भाषा देंगला, हिन्दी, मराठी, गुजराती, उर्दू आदि हो। चार्ल्स ग्रांट पहले मत के समर्थक ये। मैकाले ने बोलचाल- की भाषा को शिक्षा-माध्यम के रूप में असमर्थ घोषित किया। संस्कृत-अरबी के विषय में उसने जो कुछ कहा उससे उसका अज्ञान प्रकट होता है।

जो भी हो अंग्रेजी भाषा शिक्षा-माध्यम के रूप में स्वीकार कर ली गई।बोलचाल की भाषा को शिक्षा का माध्यम न स्वीकार करने का निर्णय अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण कहा जायगा। अंग्रेजों में भी विल्सन और शेक्सपियर जैसे व्यक्तियों ने देशी भाषाओं की उपयोगिता का समर्थन किया। शिक्षा समिति के एक भारतीय सदस्य जगन्नाथ सेठ ने १८४७ में अपने विचार प्रकट करते हुए जो कुछ लिखा है वह अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है- -“‘ यदि हमारा उद्देश्य भारतीय जनता का ज्ञानवर्धन और उनके मस्तिष्क का परिष्कार करना है तो हमें उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देनी चाहिए।

ख्री-शिक्षा के लिए और दूसरा कौन उपाय हो सकता है ? मैं अंग्रेजी के अध्ययन को हतोत्साहित नहीं करना चाहता। किन्तु मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह शिक्षा भारतीय जनता के अभिगम के बाहर है।
पर अंग्रेज अधिकारियों पर इसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा और अंग्रेजी भाषा उच्च शिक्षा का माध्यम स्वीकार कर ली गई। प्रायः दलील दी जाती है कि अंग्रेजी शिक्षा के फलस्वरूप देश में एकता की भावना पैदा हुई, जीवन की समस्याओं के सम्बन्ध में लोगों ने नए ढंग से सोचना आरम्भ किया।

राष्ट्रीय आकांक्षाओं को जागरित करने में इसे बहुत श्रेय दिया जाता है। प्रश्न यह है कि देशी भाषाओं के माध्यम से शिक्षा देने से क्या इन उद्देश्यों की पूर्ति न होती ? वस्तुतः यदि अंग्रेज अधिकारियों ने देशी भाषा का माध्यम अपनाया होता तो राष्ट्रीयया की भावना और भी जल्दी उत्पन्न होती।
शिक्षा के इतना अधिक फैल जने पर भी इस देश का आधुनिकीकरण नहीं हो पाया। अधिकांश लोग निरक्षर और जाहिल हैं। आज भी जनता की जहालत का फायदा उठाकर कभी धर्म के नाम पर कभी जाति के नाम पर पढ़े-लिखे लोग अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।

पर उस समय इस शिक्षा के माध्यम से जिस वीद्धिक मध्य वर्ग का उदय हुआ उसके आदर्श ऊँचे धे। आगे चलकर उन्होंने इसका उपयोग राष्ट्रीय सांस्कृतिक विचारों के प्रसार में किया। सन्‌ १८४३ में कम्पनी के आज्ञापत्र का नवीनीकरण होने वाला था। ब्रिटिश संसद्‌ ने भारत में स्थायी शिक्षा-नीति निर्धारित करने के सिलसिले में एक संसदीय समिति वना दी। इसके फलस्वरूप सन्‌ १८९४ में वुड घोषणा-पत्र प्रकाशित हुआ।

कुछ लोगों का कहना है कि इस घोषणा-पत्र को जॉन स्टुअर्ट मिल ने तैयार किया था। इसके अनुसार जन-समूह को शिक्षित करने का प्रयल प्रारम्भ हुआ, विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई और प्रायमिक और माध्यमिक शिक्षा को भी प्रोत्माहन मिला। प्रत्येक प्रांत में शिक्षा-विभाग स्थापित किए गए जिससे शिक्षा को एक सामान्य स्तर पर प्रतिष्ठित करने में सुविधा हुई।

उत्तर भारत में शिक्षा

बंगाल की तरह उत्तर भारत में लोग अंग्रेजी शिक्षा की ओर उन्मुख नहीं हुए। पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध (आज का उत्तर प्रदेश) बहुत बाद में अंग्रेजी राज्य में मिलाया गया। कलकत्ता विदेशी व्यापारियों का केन्द्र धा। व्यावसायिक फर्मों और प्रशासकीय दफ्तरों में नीकरी पाने की वहाँ सुविधा थी। बंगाल के बाहर ये सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। ईसाई मिशनरियों के साथ सम्बन्ध होने के कारण लोग अंग्रेजी शिक्षा को शंका की दृष्टि से देखते थे।

बिहार में इसके प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाई पड़ा। बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर की एक विज्ञप्ति (१८५८) से पता चलता है कि पटना के स्कूलों के इंस्पेक्टर जनरल के कार्यलिय को वहाँ के लोग शैतान का दफ्तर खाना कहते थे। उत्तर प्रदेश में अनेक अंग्रेजी स्कूल-कालेजों के खोले जाने के बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई। शिक्षा में पिछड़े रहने के कारण उत्तर भारत के सांस्कृतिक विकास में भी गत्यावरोध आया, जिसे दूर करने में समय लगा।

नवीन शिक्षा-पद्धति का लेखा-जोखा लगाने पर इसमें कई अन्तर्विरोध दिखाई पड़ते हैं। सच तो यह है कि अंग्रेजों को अपने दफ्तरों के लिए देशी बाबुओं की आवश्यकता थी जिससे उनका व्यवसाय और प्रशासन निर्वाध चल सके। ईसाई मिशनरी शिक्षा के माध्यम से लोगों को ईसाई बनाकर पुण्य लूटने के चक्कर में थे। इस देश के उत्साही व्यक्तियों की दृष्टि में भी सामान्यतः रोजी रोटी का सवाल ही प्रमुख था।

साम्राज्यवादियों से यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि वे उपनिवेशों की कल्याण-कामना से कोई काम करेंगे। यह कहना कि इस शिक्षा-पद्धति के कारण ही राष्ट्रीय भावना का उदय हुआ कम भ्रांतिपूर्ण नहीं है। इस शिक्षा-पद्धति के अभाव में भी राष्ट्रीय भावना का उदय होता ही। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कौन-सी पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त की थी ? कांग्रेस की स्थापना के पूर्व उनकी रचनाओं में देश-काल की अनेक समस्याएँ मुखरित हुई हैं।

इस शिक्षा प्रणाली के कारण छोटा-सा युद्धिजीवी मध्य वर्ग जरूर पैदा हुआ पर अधिकांश लोग निरक्षर रह गए। फिर भी इससे एक तरह का धर्मनिरपेक्ष दृश्कोण बना जो मध्यकालीन धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होने के कारण तर्क-सम्मत और इहलीकिक हो सका। वैयक्तिक स्वतन्त्रता इसकी दूसरी उल्लेखनीय देन है। आश्रमधर्मी घेरेवन्दी से बाहर निकल कर व्यक्ति के अपने निर्णय को अहमियत मिली । मध्यकालीन धार्मिक कथाओं को विश्वसनीय बनाने और आधुनिक युग की समस्याओं से जोड़ने के मूल में यही प्रवृत्ति क्रियाशील थी।

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